Sunday, 15 March 2009

‘सब सारहन एके तेरी देखा हथिन’

मेरे पापाजी ने अपने विद्यार्थी जीवन का , जब वे हाई स्‍कूल में पढ रहे थे , एक संस्‍मरण सुनाया था । कक्षा लगने ही वाली थी , सभी विद्यार्थी अपनी अपनी कक्षा में बैठ चुके थे। गेट बंद हो चुका था और कुछ छात्र देर होने के कारण जल्‍दी जल्‍दी गेट के बगल की सीढियों से एक एक कर अंदर जाने की कोशिश कर रहे थे । चाहे जिस उद्देश्‍य से भी एक बूढा स्‍कूल जा रहा हो , सीढी को जाम कर देने की वजह से कुछ बच्‍चे परेशान थे और उनमे से किसी शैतान बच्‍चे ने उस बूढे को कुछ कहकर चिढा दिया। चिढाकर वह तेजी से अपनी कक्षा की ओर बढ गया। बूढे ने गुस्‍से में तमतमाते हुए हेडमास्‍टर साहब के पास जाकर शिकायत की । हेडमास्‍टर साहब भी लडके को उसकी करनी का फल चखाना चाहते थे , पर समस्‍या थी , उस लडके को पहचानने की । बूढे ने कक्षा की ओर इशारा करते हुए बताया कि वह उसी कक्षा में गया है और देखने पर वे पहचान जाएंगे। मास्‍टर साहब ने तुरंत उस कक्षा के सारे बच्‍चों को बाहर निकालकर उन्‍हें एक कतार में खडा करवाया और उस बूढे से बच्‍चे को पहचानने को कहा। बूढे ने एक बार नहीं , दो या तीन बार चक्‍कर लगाते हुए कतार में खडे सबके चेहरों को गौर से देखा , पर यूनिफार्म में देखे उस बच्‍चे को इतने सारे यूनिफार्म वाले बच्‍चों के बीच पहचान पाना आसान न था। सफल न होने पर उस बूढे ने यहां बोली जानेवाली भाषा 'खोरठा' में भुनभुनाते हुए कहा ‘सब सारहन एके तेरी देखा हथिन’ यानि ‘सब साले एक ही तरह के दिखते हैं’



आज अचानक इस प्रसंग के याद आने का एक महत्‍वपूर्ण कारण है। कल अरविंद मिश्राजी ने अपने ब्‍लाग में इटली के प्रसिद्ध खगोलविज्ञानी Giovanni Virginio Schiaparelli की एक फोटोलगाकर पाठकों को उसे बूझने को दिया। मैने उनके बारे में कब पढा था , यह तो याद नहीं , पर मुझे यह फोटो बिल्‍कुल जानी पहचानी सी लगी। अभी कुछ दिन पहले जार्ज वेस्टिंगहाउस को पढ रही थी। मुझे ऐसा लगा कि ये जार्ज वेस्टिंगहाउस ही हैं , पर मैने अपनी याददाश्‍त के आधार पर इस पहेली का हल नहीं बताया। मैं गूगल के इमेज सर्च में गयी , वहां जार्ज वेस्टिंगहाउस का इमेज सर्च किया , उस इमेज को देखकर मैं आश्‍वस्‍त हुई और निश्चिंति से लिख दिया ‘जार्ज जार्ज वेस्टिंगहाउस हैं ये ...’ , पर बाद में जब अरविंद जी ने अपनी टिप्‍पणियों को प्रकाशित किया तो अधिकांश जगहों पर Giovanni Virginio Schiaparelli का नाम देखकर मैं चौंक गयी। जब गूगल के इमेज सर्च में उनको सर्च किया तो वही फोटो मिल गयी , जो अरविंद जी ने लगा रखी थी। उस बूढे की तरह मुझे भी कहना पड रहा है कि सब दाढी , मूंछ और बाल वाले एक ही तरह के दिखते हें। अब मुझे पता चला कि सिर्फ समयाभाव के कारण नहीं , वरन् अपनी पहचान को छुपाने के लिए भी हमारे ऋषिमुनियों से लेकर अभी हाल तक के दार्शनिकों , विचारकों को दाढी बाल बढाए रखने की आवश्‍यकता थी , ताकि कोई यदि उनके विचारों और दर्शनों से सहमत न भी हो तो उनका नुकसान न कर सकें। जब दाढी मूंछ और बाल से युक्‍त उनके चेहरे को पहचान ही नहीं पाएंगे तो भला नुकसान कैसे करेंगे ?

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