Thursday, 26 March 2009

धर्म गलत कैसे हो सकता है ?


धर्म गलत कैसे हो सकता है ? आज उसे गलत ढंग से परिभाषित किया जा रहा है। धर्म का अर्थ है धारण करने योग्य व्यवहार , जिससे पूरी मानव जाति का शारीरिक , आर्थिक , मानसिक और पारिवारिक .... और इन सबसे अधिक नैतिक विकास हो सके , भले ही उसके लिए दुनिया को थोड़ा भय , दबाब या लालच दिया जाए। लेकिन यह तो मानना ही होगा कि कोई भी विश्वास कभी ज्यादती के आधार पर नहीं हो सकती। यह सर्वदेशीय या सर्वकालिक भी नही हो सकता। इसलिए दूसरे देश या काल में भले ही किसी धर्म का महत्व कम हो जाए , जिस युग और जिस देश में इनके नियमों की संहिता तैयार होती है , यह काफी लोकप्रिय होता है। किसी भी देश में साधन और साध्‍य के मध्‍य तालमेल बनाने में समाज हमेशा दबाब में होता है और इस दबाब से बचाने के लिए किसी तरह का विकल्प तैयार किया जाए , तो वह इसे अपनाने को पूर्ण तैयार होता है , इसे ही धर्म कहकर पुकारा जाता है। कालांतर में इसमें कुछ ढकोसले , कुछ अंधविश्वास , कुछ तुच्छता स्वयमेव उपस्थित होते चले जाते हैं , जिसको समय के साथ शुद्ध किया जाना भी उतना ही आवश्‍यक है।



यदि हिन्‍दु धर्म की ओर ध्‍यान दें , तो यहां गुरू सिर्फ आध्‍यात्मिक मामलों के ही गुरू नहीं , हर विषय के अध्‍येता हुआ करते थे। वे वैज्ञानिक भी थे और दार्शनिक भी और उनके द्वारा जो भी नियम बनाए गए , वे समूचे मानव जाति के कल्‍याण के लिए थे। अतिवृष्टि और अनावृष्टि की मार से बर्वाद हुए फसल की क्षतिपूर्ति के लिए यदि समय समय पर फलाहार के बहाने बनाए गए तो गलत क्‍या था ? पर्व त्‍यौहारों पर लाखों की भीड को नदी में स्‍नान कराने और नदी के तल से सबों को एक एक मुट्ठी मिट्टी निकालने के क्रम में नदियों की गहराई को बचाया जाता रहा तो इसमें गलत क्‍या था ? तात्‍कालीक फल न प्रदान करने वाले पीपल और बट के पेडों के नष्‍ट होने के भय को देखते हुए और उसके दूरगामी फल को देखते हुए उन्‍हें धर्म से जोडा गया तो गलत क्‍या था ? संबंधों का निर्वाह सही ढंग से हो सके , इसके लिए एक बंधन बनाए गए तो इसमें गलत क्‍या था ? चूहा, उल्लू, गरुड़, हाथी, सिंह , सबको भगवान का वाहन मानने के क्रम में पशुओं से भी प्रेम करने की पवृत्ति बनायी गयी , तो इसमें गलत क्‍या था ? पुराने त्‍यौहारों पर गौर किया जाए तो पाएंगे कि इसके नियमों का पालन करने में एक एक वस्‍तु की जरूरत पडती है , जिन्‍हें मानने के क्रम में समाज के विभिन्‍न वर्गों के मध्‍य परस्‍पर गजब का लेन देन होता है और त्‍यौहार के बहाने ही सही , पर वर्षभर लोगों को जरूरत पडनेवाली हर प्रकार की सामग्री हर घर में पहुंच जाती है ।


वास्‍तव में, किसी भी बात की सही व्‍याख्‍या तभी की जा सकती है , जब उस विषय विशेष का गंभीर अध्‍ययन किया गया हो। पुराने सभी नियम पुराने युग की जीवनशैली के अनुरूप थे , आज उनका महत्‍व कम दिखाई पड सकता है , पर उसमें सुधार की पूरी गुजाइश है। मैं विचारों से उसे ही धार्मिक मानती हूं , जिसके अंदर वे सभी गुण हों , जो धारण किए जाने चाहिए। मैं परमशक्ति में विश्‍वास रखती हूं , बाह्याडंबरों में नहीं, एक ज्‍योतिषी होने के बावजूद पूजा पाठ में बहुत समय जाया करने पर भी मेरा विश्‍वास नहीं और न ही परंपरागत रीति रिवाजों को ही हूबहू मानती हूं। एक भगवान पर या प्रकृति के नियमों पर विश्‍वास रखो तो कितना भी दुख विपत्ति आ जाए , असीम शांति मिलती है। हमेशा लगता है, भगवान या प्रकृति हमारे साथ हैं । वैसे इस बात पर भी विश्‍वास रखना चाहिए कि काम प्रकृति के नियमानुसार ही होते हैं , लाख भगवान की पूजा कर लो, कुछ बदलने वाला नहीं , पर इस बहाने शांति ही मिलती है तो कम बडी बात नहीं।


आज कुछ लोगों और कई संस्थाओ का लक्ष्य धर्म के नाम पर फैले अंधविश्वास , पुरातनपंथ , ढकोसलों को समाप्त करना है , यह तो बहुत ही अच्छी बात है , क्योंकि हमारा लक्ष्य भी यही है। लेकिन हर व्यक्ति या पूरे समाज को किसी भी मामले में एक विकल्प की तलाश रहती है। झाड़.फूंक को तब मान्यता मिलनी बंद हो गयी , जब इलाज के लिए लोगों को एलोपैथी के रूप में एक वैज्ञानिक पद्धति मिली। यदि ये संस्थाएं आज के युग के अनुरूप समाज , प्रकृति और अन्‍य हर प्रकार के विकास के लिए आवश्‍यक कुछ नियमों की संहिता तैयार करें , जो सारे मानव जाति के कल्याण के लिए हो , तो भला जनता उसे क्यो नहीं मानेगी ? दो.चार लोगों के नियम विरूद्ध होने या अधार्मिक होने से युग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता , किन्तु यदि उन्हें देख सारी जनता अधर्म के राह पर चल पड़े , नैतिक विकास या मानवीय मूल्‍यों से अधिक महत्व अपने शारीरिक , मानसिक , आर्थिक और पारिवारिक विकास को दे , तो सुख.शांति का अंत होना ही है। इसके कारण आनेवाले समय में मानवजाति चैन से नही जी पाएगी। ऐसे में आज भी जरूरत है धर्म की ही सही परिभाषा रचने की और उसके अनुरूप जनता से क्रियाकलापों को अंजाम दिलवाने की। यदि इसमें ये संस्थाएं कामयाब हुईं , तो मानव जाति का उत्थान निश्चित है।



धर्म का दिखावा करनेवाले पाखंडी , धोखेबाज और कपटी लोगों के प्रभाव में जनता कुछ दिनों के लिए भले ही बेवकूफ बन जाए , किन्तु फिर जल्‍द ही उनकी पोल अवश्य खुल जाती है , जबकि महात्मा गांधी , मदर टेरेसा , ईसा मसीह , स्वामी दयानंद , स्वामी विवेकानंद , गौतम बुद्ध , महावीर , गुरू नानक , चैतन्य महाप्रभु जैसे अनेकानेक व्‍यक्तित्‍व धर्माचरण के द्वारा युगों.युगों तक पूजे जा रहे हैं। फिर धर्म को गलत कैसे और क्यों समझा जाए ?

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