Saturday, 20 February 2010

एक ही गोत्र या अल्‍ल में विवाह क्‍यूं वर्जित माना जाता है ??

वैवाहिक मामलों के कई प्रकार के प्रश्‍न जैसे जन्‍मपत्री मिलान, विवाह की रीति , सात फेरे, विवाह में गोत्र का महत्‍व आदि हमारे मस्तिष्‍क में घूमते रहते हैं , जिनका सटीक जबाब हमारे पास नहीं होता। ऐसे ही कुछ प्रश्‍न 'अखिल भारतीय खत्री महासभा' द्वारा पूछे गए थे , जिनका मेरे पिताजी श्री विद्या सागर महथा जी के द्वारा दिया गया निम्‍न प्रकार जबाब मुझे एक पत्रिका मे मिला, जो आपके लिए पोस्‍ट कर रही हूं ............ 

प्रश्‍न .. जन्‍मपत्र मिलाने की प्रथा कब से चली ?
उत्‍तर .. वैदिक काल , श्री रामचंद्र जी के समय, महाभारत काल और प्राक् ऐतिहासिक काल में भी स्‍वयंवर ही हुआ करते थे, किंतु इतना निश्चित है कि स्‍वयंवर काल में वर और कन्‍या निश्चित तौर पर बालिग और समझदार हुआ करते थे। विवाह सुनिश्चित करने में परिवार के सदस्‍यों की तुलना में उनकी भूमिका निर्णायक हुआ करती थी। किंतु हजार दो हजार वर्षों में भारत में अनेक बार विदेशी हमले हुए , फलस्‍वरूप सामाजिक सांस्‍कृतिक परिस्थितियां बहुत अधिक प्रभावित हुईं। कई बार प्रतिष्‍ठा की रक्षा के क्रम में बाल विवाह का सिलसिला चला और संभवत: इन्‍हीं दिनों पात्र पात्राओं की चारित्रिक विशेषताओं की जानकारी हेतु कुंडली निर्माण की प्रथा चल पडी। जन्‍मपत्र मिलाने की प्रथा कब से चली , इसकी निश्चित तिथि का उल्‍लेख करना कठिन है।

प्रश्‍न .. जब हम जानते हैं कि जोडे ऊपर से ही बनकर आए हैं , तो फिर पत्री मिलाने के क्‍या लाभ हैं ?
उत्‍तर .. जन्‍मपत्री मिलाना , जो परंपरावश जारी है , मुझे बहुत वैाानिक नहीं लगती। इस कारण यह है कि सभी अन्‍य ग्रहों को नजरअंदाज करके सिर्फ चंद्रमा के नक्षत्र के आधार पर गुण का मिलान किया जाता है। किंतु सभी ग्रहों पर सयक् रूप से ध्‍यान दिया जाए , तो वर या कन्‍या की चारित्रिक विशेषताओं को जाना जा सकता है .. कुंडली मिलाने से यही लाभ है। जोडे ऊपर से बनकर आते हैं या नहीं , इसके बारे में भी प्रमाण तो नहीं दिया जा सकता। पर कुंडली मिलाने के बहाने दूरस्‍थ भविष्‍य की जानकारी होती है , हम जोडे का चयन कर सकते हैं , ऐसी बात नहीं है।

प्रश्‍न .. विवाह रात्रि में ही क्‍यूं होते हैं ? दिन में क्‍यूं नहीं किए जा सकते ?
उत्‍तर .. प्राय: हर युग में वरपक्ष अपने काफिले के साथ कन पक्ष के यहां जाता रहा है। वरपक्ष को सुबह से शाम तक कई प्रकार के लोकाचार को निबटाते हुए यातायात की सुविधा के अभाव में कन्‍या पक्ष के यहां देर से पहुंचते हैं। पुन: आर्य आतिथ्‍य सत्‍कार को सबसे बडा धर्म समझते रहे हैं , इस कारण देर होता जाना स्‍वाभाविक है। नक्षत्रों को साक्षी रखने के लिए भी विवाह प्राय: रात्रि में ही हुआ करता था। परिपाटी यही चलती आ रही है। पर साज सजावट में यह व्‍यय साध्‍य प्रतीत हो ख्‍ तो विवाह दिन में भी किए जा सकते हैं।

प्रश्‍न.. गोत्र या अल्‍लों का क्‍या महत्‍व है ? एक ही गोत्र में विवाह क्‍यूं वर्जित है ?
उत्‍तर .. यूं तो पूरा भारतीय समाज पुरूष प्रधान है और हमारा खत्री समाज भी इससे भिन्‍न नहीं। जो समाज बहुत दिनों तक अपनी संस्‍कृति को ढोने की क्षमता रखता है , उसकी एक बडी विशेषता अपने पूर्वजों को याद रखने की होती है। सभी गोत्र का नामकरण ऋषियों के नाम पर आधृत हैं , इससे ये तो स्‍पष्‍ट है कि सभी गोत्र वाले अपने पूर्व पुरूषों में किसी अपने वंशज के ऋषि को याद करते हैं। उस महत्‍वपूर्ण व्‍यक्ति विशेष का जो अल्‍ल था , वही उस गोत्र का अल्‍ल कहलाता है। इसी प्रकार सभी व्‍यक्ति अपने गोत्र और अल्‍ल से लाभान्वित होते हैं। कालांतर में जब उसी गोत्र का कोई महत्‍वपूर्ण व्‍यक्ति किसी खिताब से नवाजा जाता है , तो गोत्र के अंतर्गत ही कई अल्‍ल आ जाते हैं। कुछ अल्‍ल कर्मानुसार भी जुडते चले जाते हैं। कभी एक गोत्र और एक अल्‍ल से एक ही वंश का बोध होता था , इसलिए परस्‍पर विवाह वर्जित था। पर इस समय एक ही गोत्र और अल्‍ल में लोगों की संख्‍या लाखों में है। अत: प्रमुख रक्‍तधारा की बात काल्‍पनिक हो जाती है। भले ही यह समाज पुरूष प्रधान हो , पा व्‍यावहारिक दृष्टि से देखा जाए , तो अर्द्धांगिनी के रूप में भिन्‍न भिन्‍न वंशजों की नारियां इतनी ही संख्‍या में सम्मिलित हो‍कर रक्‍त धारा , सभ्‍यता , संस्‍कृति सभी में महत्‍वपूर्ण परिवर्तन कर डालती है। अत: एक ही गोत्र और अल्‍ल में विवाह में कोई दिक्‍कत नहीं, बशर्तें दोनो के पूर्वज परिचित न हों।

प्रश्‍न .. क्‍या विवाह वैदिक रीति से ही होना चाहिए या आर्यसमाज रीति से भी ठीक है ?
उत्‍तर .. विवाह की दोनो रीतियों को मैं मानता हूं , दोनो की अपनी अपनी विशेषताएं हैं।

प्रश्‍न .. क्‍या विवाह में चार फेरे भी मान्‍य हैं ?
उत्‍तर .. दिनों का नामकरण भी उस समय तक विदित प्रमुख सात आकाशीय ग्रहों के आधार पर हुआ है। सप्‍तर्षि मंडल में सात सुविख्‍यात ऋषियों को साक्षी रखकर ही या ब्रह्म की भांति दाम्‍पत्‍य जीवन में पूर्णता सात ग्रहों की परिकल्‍पना का अनुकरण संभावित है , अत: सात फेरों में कोई कटौती मुझे उचित नहीं लगती।





आस्‍था तो अच्‍छी चीज है ... पर ये कैसे कैसे अंधविश्‍वास ( दूसरा भाग) ??

कल से ही मैं अपने देश में बेवजह फैले अंधविश्‍वास पर हमारे ब्‍लोगरों की निगाह की चर्चा कर रही हूं , इसी की दूसरी कडी आज प्रस्‍तुत है .......

ऋषिकेश खोङके "रुह" जी को सुनने में अजीब सा लग रहा है कि किसी के शरीर में देवी आ गयी है..सुनने मे अजीब लग सकता है की किसी के शरीर मे देवी  गई
 पर भारत मे ये आम बात है | आप भारत मे इस प्रकार की बातों को अंधविश्वास अथवा कुरितियाँ कह सकते है किन्तु मेरे लिये ये कहना जरा मुश्किल होगा | बात काफी पुरानी है और यादें भी धुंधली सी ही है पर आँखो के समक्ष एक चलचित्र है| अवसर है गौरी पूजन (महालक्ष्मी) का ,आरती चल रही है और धिरे- समापन की और है की अचानक काँपते हाथ-पैर , खुले हुवे बाल , झुमता शरीर और गले से निकलती अज्ञात आवाज़ के साथ मेरी माता | मै शायद देख कर डर गय होउन्गा | सहसा आवाज़ आती है "अरे अंगात देवी आली , पाया पडा" अर्थात शरीर मे देवी आयी है पैर पडो | एक - एक कर सभी लौग माँ के पैर पडने लगे | माँ सबको आशीर्वाद देती रही और कुछ आश्वासन भी जैसे "सगळ बर होईल, चिन्ता करु नको" अर्थात सब ठिक हो जायेगा चिन्ता मत करो इत्यादि |

शेफाली पांडे जी बालिका को माता के नाम पर पूजे जाते देखकर कहती हैं इन्हें इंसान ही बने रहने दिया जाए ग्रामीण इलाके में शिक्षण कार्य करने के कारण अक्सर मुझे वह देखने को मिलता है, जिसे देखकर यकीन करना मुश्किल होता है कि यह वही भारत देश है, जो दिन प्रतिदिन आधुनिक तकनीक से लेस होता जा रहा है,जिसकी  प्रतिभा और मेधा का लोहा सारा विश्व मान रहा है, जहाँ की स्त्री शक्ति दिन पर सशक्त होती जा रही है  लेकिन इसी  भारत के लाखों ग्रामीण इलाके अभी भी अंधविश्वास की गहरी चपेट में हैं, इन इलाकों से विद्यालय में आने वाली अधिसंख्य लडकियां कुपोषण, उपेक्षा, शारीरिक और मानसिक  प्रताड़ना का शिकार  होती  हैं, क्यूंकि ये एक अदद लड़के के इंतज़ार में जबरन पैदा हो जाती हैं, जिनके  इस दुनिया में आने पर कोई खुश नहीं हुआ था और यही  अनचाही लडकियां जब बड़ी हो जाती हैं, तो अक्सर खाली पेट स्कूल आने के कारण शारीरिक रूप   से कमजोरी के चलते   मामूली  सा  चक्कर आने पर यह समझ लेती हैं कि उनके शरीर में देवी  गयी है, हाथ पैरों के काँपने को वे अवतार आना समझ लेती हैं, मैं बहुत प्रयास करती हूँ कि बच्चों की इस गलतफहमी को दूर करुँ, मैं उन्हें समझाती   हूँ कि ये देवदेवता शहर के कॉन्वेंट या पब्लिक स्कूलों के बच्चों के शरीर में क्यूँ नहीं आते 

राजकुमार ग्‍वालानी जी भी पूछते हैं .... है कोई टोनही से मुक्ति दिलाने वाला
छत्तीसगढ़ का प्रचलित ज्यौहार हरेली कल है। इस त्यौहार को जहां किसान फसलों के त्यौहार के रूप में मानते हैं और अपने कृषि उपकरणों की पूजा करते हैं, वहीं यह भी मान्यता है कि यही वह दिन होता है जब वह शैतानी शक्ति जिसे सब टोनही कहते हैं विचरण करने के लिए निकलती है। इसी के साथ इस दिन को तांत्रिकों के लिए अहम दिन माना जाता है। इस दिन तांत्रिक तंत्र साधना करने का काम करते हैं। भले इसे अंधविश्वास कहा जाता है, लेकिन यह एक कटु सत्य है कि टोनही जैसी चीज का अस्तित्व होता है। ऐसा साफ तौर पर ग्रामीणों का कहना है। इनका कहना है कि अगर किसी को इसे देखना है तो वह छत्तीसगढ़  सकता है। वैसे ये देश के हर कोने में हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में इसके बारे में ज्यादा किस्से हैं। एक तरफ ग्रामीण टोनही के होने का दावा करते हैं तो दूसरी तरफ इसको अंध विश्वास बताया जाता है। ग्रामीण इसको अंध विश्वास बताने वालों से कहते हैं कि क्यों नहीं वे उन स्थानों पर जाने की हिम्मत करते हैं जहां पर टोनही के बारे में कहा जाता है कि वह विचरण करती है। अगर है कोई ऐसा बंदा जो टोनही से मुक्ति दिला सकता है तो वहां जाए और बताए कि टोनही हकीकत नहीं बल्कि महज अंधविश्वास है।


अंकुर जी लिखते हैं कि झारखंड के देवधर जिले के पालाजोरी इलाके में पत्थरघट्टी गांव में पांच महिलाओं को डायन बताकर सरेआम बेआबरू किया गया और उनकी निर्मम पिटाई की गई। मुस्लिम समुदाय की इन पांचों महिलाओं को  सिर्फ पीटा गया बल्कि निर्वस्त्र कर गांव में घुमाया गया और बाद उन्हें मैला खाने को मजबूर किया गया। संथाल परगना प्रमंडल के पुलिस उप महानिरीक्षक मुरारीलाल मीना ने बताया कि यह पूरी करतूत किसी बाबा की है जिसका प्रभाव पूरे इलाके में है। उनके मुताबिक पत्थरघट्टी गांव की ही पांच महिलाओं के बारे में यह अंधविश्वास है कि उन पर किसी मुवक्किल साहब का साया है और जब साया आता है तो ये महिलाएं उन लोगों की निशानदेही करती हैं जो डायन हों।


"मम्मी देखो कितनी छोटी फांक है!" वो  संतरा खा रही थी और एक छोटी सी फांक पर उसकी नज़र पड़ी.
"बेटा उसे फेंक दे."
"क्यों मम्मी?"
"क्योंकि ऐसी फांक खाने से.. तेरे पापा को भगवान् ले जाएगा."
"अरे ऐसा क्यों होगाकहाँ लिखा है ऐसाये भी कोई बात हुई कि छोटी फांक खाने से पापा .."
"अब है तो है..मत खा उसे."
उसने  फांक छोड़ दीआठ साल की थी वोअंधविश्वास से बहुत अधिक पाला नहीं पड़ा थामन नहीं मान रहा था पर जहां पापा कि ज़िन्दगी का सवाल था वहाँ रिस्क लेने की भी हिम्मत नहीं थी.
धीरे धीरे बड़ी हुईबहुत से ऐसे अंधविश्वासों की उसने  धज्जियां उड़ा दींबिल्ली रास्ता काट जाती तो वो और खुश होकर आगे बढतीनाखून काटने की याद उसी दिन आती जिस दिन मंगलवार होताशनिवार को दुनिया भर की शौपिंग करती (शनिवार को नयी चीज़ें खरीदने से मना किया जाता है खासकर धातु की पर उसकी  समस्या ये थी की पूरे सप्ताह में वही दिन होता था जब थोडा वक

इतना ही नहीं , अंधविश्‍वास के कारण सुबह गांव का नाम ही बदल दिया जाता है .. सिसवन में हर सुबह बसता है एक बेगूसराय सिसवन (सिवान): विज्ञान की तेज गति ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित टोटकों के आगे कभी-कभी धीमी लगती है। सिवान के सिसवन प्रखंड के घुरघाट गांव में ऐसा हीं दिखता है। यहां के लोग सुबह में अपने गांव का नाम नहीं बताते। इसके पीछे यह मान्यता है कि नाम बताने से उस दिन के लिए उनका भाग्य बिगड़ जाएगा। जरूरत पड़ने पर अगर सुबह में गांव का नाम बताना पड़े, तो ग्रामीण 'घुरघाट' के बदले 'बेगूसराय' कह काम चलाते हैं।
गांव में मान्यता है कि अगर प्रात:काल में ग्रामीण इसका नाम लें तो उनका बना काम भी बिगड़ जाएगा। ग्रामीणों के अनुसार इससे व्यवसाय में घाटा, दुर्घटना, मृत्यु या किसी अन्य परेशानी आदि से सामना होता है या इसके समाचार मिलते हैं। गांव के चंद्रिका लाल शर्मा के अनुसार इस कारण वे व्यवसाय में घाटा भोग चुके हैं। ग्रामीण संतोष शर्मा की मानें तो एक सुबह इस गांव का नाम लेने के कारण वे एक झूठे मुकदमें में फंस गए थे। 

जी हाँ, यह कोई कल्पना नहीं, शान्ति नगर, कायमगंज, फर्रूखाबाद, 0प्र0 की सत्य घटना है, जिसमें शान्ति नगर मोहल्ले के निवासी तेजवीर राठौर ने अपने 12 वर्षीय पुत्र को ठीक करने के लिए एक तांत्रिक को सौंप दिया था। वह तांत्रिक बच्चे को ठीक करने के नाम पर बंधक बनाकर चिमटी के उसके शरीर का मांस नोचता था और देवताओं को चढ़ाता था। गत तीन माह से बच्चा इस अत्याचार को सह रहा था। लेकिन एक दिन जैसे ही उसे मौका मिला, वह तात्रिक के घर से भाग निकला। बच्चे ने बताया कि मकान नं0 6, गली नं0 8, मोहल्ला कलवला, फिरोजाबाद, 0प्र0 का निवासी तांत्रिक नवमी के दिन उसकी बलि चढ़ाने वाला था।

इसके अतिरिक्त लखीमपुर खीरी में एक किसान द्वारा अपनी संतान की भलाई के लिए पड़ोस की लड़की की बलि चढ़ाने का मामला, गाँव पूरे कुर्मिन, मजरे सेमरी रनापुर, थाना ऊंचाहार, रायबरेली, 0प्र0 में एक तांत्रिक के कहने पर जिन्न उतारने के नाम पर एक युवक द्वारा अपनी सगी भागी को पटक-पटक कर मार डालने की घटनाएं भी अभी हमारे दिमाग में गूँज रही हैं। इसके अलावा इसी सप्ताह में लखनऊ की मोहनलालगंज तहसील के गौरा गाँव में फैले दिमागी बुखार को ठीक कराने के लिए झाड़ फूँक का सहारा लिये जाने की घटना भी पढ़ने सुनने में आ ही रही हैं, जबकि वहाँ पर दिमागी बुखार के कारण पहले ही दो औरतों की मृत्यु हो चुकी है।

विवेक रस्‍तोगी जी (ये कल्‍पतरू वाले नहीं हैं) चिंतित हैं कि किसी तांत्रिक के सुझाव पर, अमीर बनने के लिए अपनी ही सिर्फ 11 साल की मासूम बेटी से बलात्कार करने, और फिर सालों तक करते रहने की यह खबर कुछ ज्यादा ही विचलित कर देती है अंतस को... सोचकर देखिए, कोई भी बच्चा कैसी भी परेशानी का सामना करते हुए स्वाभाविक रूप से सबसे पहले मां या बाप की गोद में सहारा तलाश करने के लिए भागता है, लेकिन ऐसे मां-बाप हों तो क्या करे वह मासूम...?
एक बेटी के साथ सालों तक यह घिनौना कृत्य होते रहने के बावजूद जब अमीरी ने घर में दस्तक नहीं दी, तो भी उनकी आंखें नहीं खुलीं और दूसरी बेटी के साथ भी वही सब किया गया... और यही नहीं, इस बार मां-बाप ने तांत्रिक को अपनी 15-वर्षीय बेटी की इज़्ज़त से खेलने दिया... इतना अंधविश्वास... तरक्की करते हुए कहां से कहां  गया हिन्दुस्तान, लेकिन लगता है कि अंधविश्वास की जड़ें मजबूत होती चली जा रही हैं...

अयबज खान जी कहते हैं कि राजस्थान के प्रतापगढ़ में भेरूलाल नाम के एक शख्स को सपना आया, जिसमें उसने एक घोड़ा और उसके पैरों के निशान देखे। सपने में उसके देवता रामदेव ने उसे गांव में मंदिर बनाने का आदेश भी दिया। भेरूलाल ने सुबह उठते ही गांववालों को इस सपने के बारे में ख़बर दी, सपने के मुताबिक उसे गांव में ही एक छोटा सा घोड़ा और उसके पैरों के निशान भी मिल गये।
बस फिर क्या था, भेरूलाल और गांव वाले फटाफट मंदिर बनाने में जुट गये। लेकिन जैसे ही ये ख़बर जंगल में आग की तरह फैली, सरकारी अमला भी गांव में पहुंच गया। लेकिन गांव वाले जिद पर अड़े थे, कि मंदिर तो ज़रूर बनाएंगे, आखिर भगवान खुद उनके द्वार पर जो आये हैं। लेकिन उस भेरुलाल को ये कौन समझाए, कि जिस सपने की बात वो कर रहा है, वो है तो ठेठ देसी, लेकिन उसके तार चाईना से जुड़े हैं। अब इन नासमझो को कौन समझाए, कि भईया ये एक छोटा सा प्लास्टिक का घो़ड़ा है, जो बच्चों के खेलने के काम आता है। और तो और उस घोड़े के पेट पर लिखा भी है मेड इन चाईना.. आगे और भी संग्रह है , जिसे आप अगली कडी में पढ सकेंगे।



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