Friday, 21 January 2011

एक झूठ ( कहानी ) ..... संगीता पुरी


जब ब्‍लॉग जगत में आयी थी तो मैने सिर्फ 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' नाम का अपना ब्‍लॉग बनाया था और उसमें  ज्‍योतिषीय लेख ही  पोस्‍ट किया करती थी। डायरी में कुछ पुरानी कहानियां लिखी पडी थी , ज्‍योतिषीय ब्‍लॉग में उसे पोस्‍ट करना अच्‍छा नहीं लगा। एक दिन साहित्‍य शिल्‍पी पर निगाह पडी तो उन्‍हें ही अपनी सारी कहानियां प्रकाशित होने के लिए भेजती गयी। 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' बनाने के बाद कई बार इच्‍छा हुई कि मैं अपनी कहानियों को इसमें पोस्‍ट कर दूं , पर किसी न किसी कारणवश टालती रही। आज मेरे जीवन की पहली कहानी ' एक झूठ' आप सबों के समक्ष प्रस्‍तुत है .....

अनेक प्रकार की चिन्ताओं में डूबी, मन के उथल पुथल को शांत करने की असफल चेष्टा में वह उस रास्ते में चलती ही जा रही थी, जो उसके लिए नितांत अपरिचित था। इस रास्ते में चलते लोग, रास्ते के दोनो ओर बनी गगन चुंबी इमारतें , यत्र तत्र दिखाई देते पुराने घने ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, अपरिमित रोशनी देते स्ट्रीट लाइट के बडे बडे खम्भे सभी अपरिचित होते हुए भी उसके कदमों को रोकने में असमर्थ थे। यूं तो वह इस शहर में पहले भी आ चुकी थी, पर वह इस शहर का कौन सा हिस्सा था , उसे बिल्कुल भी याद न था। शीत ऋतु की इस प्यारी सी गोधूलि बेला का रूप देखकर वह तो दंग ही रह गयी थी। इस बेला में गाँव में जहां सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा रहता है , मनुष्य तो मनुष्य पशुपक्षी और अन्य जीव जंतु भी अपने अपने घर में दुबके पडे होते हैं , यहां दीपावली की सी रौनक नजर आ रही थी। 


रोशनी की ओर जैसे ही उसके कदम बढे , उसने अपने आपको एक खूबसूरत सजे धजे बाजार में पाया। बाजार में फैला प्रकाश इस बेला मे भी लोगों को काम करने का संदेश दे रहा था। हर ओर ग्राहको की भीड थी। कई राशन खरीद रहे थे , तो कई सब्जियां , कई बरतन तो कई खिलौने , कई कपडे तो कई गहनें। कुछ औरतें सौंदर्य प्रसाधन खरीदनें में व्यस्त थी। लेकिन इस भीड भरे वातावरण में उसे सिर्फ अपनी ही चिंता थी। वह करे तो करे क्या? जाए तो जाए कहां? कुछ न सोच पाने के बावजूद वह चलती ही जा रही थी। उसके कदम एक पल को भी रूके न थे। उसने अनुमान किया, मेले से बस स्टैंड और बस स्टैंड से इस बाजार तक आने में उसने चार पांच किमी की दूरी तय कर ली थी। उसके कदम बोझिल हो गए थे, पर एक आध घंटे विश्राम के लिए वह कोई भी जगह निश्चित नहीं कर पा रही थी। ऐसी वैसी जगह बैठ जाए, तो लोगों की संदेहात्मक दृष्टि का सामना करना पड सकता है। इसी से बचने के लिए वह चेहरे पर भय की भी रेखा आने नहीं देना चाहती थी, पर परेशानी के भाव चेहरे पर बार बार उपस्थि‍त होकर उसके आत्म‍विश्वास को कम करने का पूरा प्रयास कर रहे थे। 

अत्यधिक जिद का क्या नतीजा होता है, यह आज ही उसने जाना था। बचपन से अभी तक माता पिता और अन्ये परिवार जनों द्वारा मिलनेवाला लाड-प्यार इसे इस हद तक जिददी बना देगा, किसी ने सोचा भी न था। मनमौजी बच्चे भी समय के साथ साथ सुधर ही जाते हैं , ऐसी ही सोच के कारण माता पिता ने उसे फटकारा भी न था। यही कारण है कि उसकी जिद की प्रवृत्ति बढती ही जा रही थी। उसे याद है, उसके माता पिता ने कितनी ही बार उसे समझाया था ‘ बेटे , तुम लडकी हो। हमारा समाज लडके और लडकियों को भेदभाव वाली नजर से देखता है। तुम अपनी आदतें सुधार लो। यह जिदद करने की तुम्हारी आदत अच्छी नहीं।‘ किन्तु उसके दिमाग में तो बचपन से बैठायी गयी बातें ही गूंजती रहती थी ‘तुम मेरे लिए बेटा से कम नहीं हो’ पिताजी बचपन में ये बातें गर्व से कहा करते, जब वह लडकियों की तरह गुडियों और घरौंदो से न खेलकर लडको की तरह ही बंदूको एवं मशीनरी सामग्रियों को तोडकर खेला करती थी। उस समय तो पिताजी उसकी पीठ थपथपाकर कहा करते थे ‘ यह हमारा नाम रोशन करेगी’ पिताजी की इसी शाबाशी के कारण ही तो उसने अपने को कभी लडकी समझा ही नहीं। वह बडे होने के बाद भी लडको की तरह ही खेल में व्यस्त रहती।


उसके साथ पिताजी के इस व्यवहार का कारण भी स्पष्ट था। पिताजी और माँ के विवाह के तुरंत बाद ही माँ के गर्भ में आए उसे तीन माह भी नहीं हुए थे कि माँ की तबियत असामान्य हो गयी थी। बहुत मुश्किल से दवाइयों, टानिको, फल मेवों और छह महीने के उचित देखभाल के बाद ही मां की जान बची थी और बडे आपरेशन से ही उसका जन्म हो पाया था। जन्म के बाद भी कई तरह की उलझनें उपस्थित हो गयी थी, जिसके कारण डाक्टर ने दूसरा बच्चा न होने के लिए मां और पिताजी को सख्त हिदायत दे दी थी। उसके जन्म के पांच छ: महीनें बाद ही मां सामान्य हो सकी थी। उस समय तक पिताजी ने उसकी देख रेख में कोई कसर नहीं छोडी थी। यूं तो उसके लिए बाई की भी व्यवस्था की गयी थी पर अपने को संतुष्ट करने के लिए पिताजी बहुत से काम खुद ही किया करते थे। इसके लिए उन्हें आफिस से भी इतनी छुटिटयां लेनी पडी थी कि उनकी नौकरी पर भी संकट आ गया था, पर शीघ्र ही न सिर्फ नौकरी ही बची, वरन बहुत जल्द प्रोमोशन के साथ अपने गांव में ही स्थानांतरण भी हो गया। इस दैवी कृपा का सारा श्रेय उसे ही दिया गया और एक वर्ष तक इतने कष्ट देने के बावजूद उसे ’लक्ष्मी’ संबोधन से संयुक्त किया गया। लेकिन पुत्र न हो पाने की कसक ने भरतीय मानसिकता से संयुक्त मां पिताजी को उसे बेटे की तरह पालने को मजबूर कर दिया और वह बेटी होते हुए भी बेटा बन गयी। 

लेकिन गाँव के माहौल में जहां लडकियाँ थोडी बडी होने के बाद ही घरेलू बनकर कामकाज करना आरंभ कर देतीं हैं, पढाई के साथ साथ अपने को सिलाई, बुनाई, कढाई, पेण्टिंग्स एवं अन्यं स्त्रियोचित कलाओं में दक्ष बनाने की चेष्टा में लग जाती हैं, छठी कक्षा में पहुंचने और 10 वर्ष की उम्र पार करने के बाद भी कन्या सुलभ चेष्टाओं को उसमें न विकसित होता देख उसकी मां परेशान थी। जब वह अपने को लडकी मानने को तैयार ही नहीं होती, तो मां प्यार से उसे कई तरह की बातें समझाना शुरू करती, पर उसके कानों में जूं भी न रेंगती थी।


सचिन तेंदुलकर की वह फैन थी। पिछले ही वर्ष उसके इस शहर में आने की सूचना उसकी कक्षा के अन्य छात्रों को मिली। जिस गेस्ट हाउस में उसके ठहरने का इंतजाम हुआ था, उसके एक कर्मचारी उसकी दोस्त के नजदीकी रिश्तेदार थे। कक्षा की कई छात्राओं ने सचिन से मिलने का प्रोग्राम बनाया। वह कहां पीछे रहनेवाली थी, झट उसमें शामिल हो गयी। 10 बजे उसके स्कूल की घंटी बजती थी। उसी समय गांव से शहर जाने के लिए एक बस खुलती थी। शाम 4 बजे उसका स्कू्ल बंद होता था, उसी समय शहर से बस गांव पहुंच जाती थी। गांव का सरकारी स्कूल था, बच्चों के लिए एक दो दिनों तक अनुपस्थित रहना आम बात थी। उस दिन नियत समय पर सभी जमा हुई, गांव से शहर पहुंची, बस स्टैंड से गेस्ट हाउस। कल्पना तो थी कि सचिन से ढेर सारी बातें करेंगी, पर सिर्फ आटोग्राफ से ही संतुष्ट होना पडा। वापस बस में पहुंची, फिर गांव, घर बस्ता लेकर इस प्रकार आयी मानो स्कू्ल से ही वापस आयी हो। पर मां को पता नहीं कैसे खबर लग चुकी थी, उन्होने समझाना शुरू किया और वह आदतन एक कान से सुनती और दूसरे कान से निकालती चली गयी। आज जब उसे शहर से गांव वापस जाने के लिए बस नहीं मिली , तब उसे पता चला कि उसने गांव से शहर वापस आकर कितनी बडी गलती की है। और कुछ सहेलियां रहती, तो कोई उपाय भी हो सकता था, पर अकेले एक लडकी………………।


आज लडकी होने के अहसास मात्र से मन में उपजा भय सारे वातावरण को डरावना बना रहा था। हुआ यूं कि कल उसकी दो तीन सहेलियां शहर में लगे मेले को देखने आयी थी। उन्होने मेले की इतनी तारीफ की कि उसका मन भी मेले को देखने के लिए उत्कंठित हो उठा। उसने कई सहेलियों को पूछा, पर उसका साथ देने को कोई भी तैयार नहीं हुई। शहर जाना और वहां से लौटना तो बिल्कुल ही आसान है, पिछली बार उसने यह महसूस किया था, इसलिए आज सुबह स्कूल में अपना बस्ता सहेलियों को सौंपकर वह झट से शहर जाने वाली बस में बैठ गयी थी। लडकियों ने उसे अकेले शहर जाने से मना भी किया, पर उसके दिमाग में जो बातें आ गयी, उसे पूरा करने की जिद ने उसे शहर जानेवाली बस में अकेले ही बैठा दिया। पाकेट खर्च के दो सौ रूपए उसके पास थे, जो मेले देखने के लिए काफी थे। लौटती बस में वापस आने के लिए जब वह स्टैंरड पहुंची, तो मालूम हुआ, बस बारात के लिए बुकिंग में चली गयी है। गांव के लिए और कोई दूसरी गाडी नहीं थी, यह जानकर उसके पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गयी। 

एक परिचित सा चेहरा नजर आते ही उसकी विचारों की तंद्रा भंग हुई। परेशानी के कारण वह उन्हें पहचान भी नहीं पा रही थी, पर उन्हें बार बार अपनी ओर देखता देख अपने दिमाग पर जोर डाला। अचानक ही उसे याद आया, उसने हाथ जोड नमस्ते की और कहा ‘आप जायसवाल जी हैं न। मै घनश्यासमदास जी की पुत्री किरण’ ‘हां हां’ उन्होने अभिवादन का जवाब देते हुए पूछा ‘तुम यहां कैसे?’ शाम के साढे सात बजे थोडे परिचित व्यक्ति को देखकर उसके खुशी की सीमा न रही। इतनी देर में तो उसने बाजार का कई चक्कर लगा लिया था। उसने जल्दी जल्दी अपनी सारी कहानी सुना दी। जायसवालजी के चेहरे पर जाने कितने भाव चढते उतरते नजर आए, जो कि उसकी समझ से परे थे। उन्होने स्कूटर स्टार्ट की, उसे बैठाया और अपने घर की ओर चले। सारे रास्ते उन्होने कोई बातचीत भी नहीं की। शायद उसके कारनामों से उन्हें दुख पहुंचा हो, पर उसे इसकी कोई परवाह नहीं थी। ये उसे अपने घर ले जा रहे हैं, वहां उनके घरवालों के साथ उसे रात बिताने को जगह मिल जाएगी, सुबह ही वह वापस अपने घर चली जाएगी, उसकी अपनी सारी परेशानी छूमंतर हो गयी। 


उसे अब चिंता थी तो सिर्फ अपने मां पिताजी की। जब उसकी सहेलियां उसका बस्ता ले जाकर उन्हें देंगी और कहेंगी कि वह मेला देखने अकेले ही गयी है, मां पिताजी को मालूम होगा कि बस आज लौटकर वापस नहीं आएगी, तो वे कहां ढूढेंगे उसे? मां पिताजी के बारे में सोंचते ही वह परेशान हो गयी। गांव में फोन की सुविधा होती तो फोन ही कर देती उन्हें। मां पिताजी रात कैसे व्यतीत कर पाएंगे, वह तो उनके यहां जाकर आराम से खा पीकर सो जाएगी। मन ही मन माफी मांगकर उसने अपने आप को शांत किया। पश्चाताप के आंसू गालों पर लुढक पडें। 

छोटा छोटा परिचय भी कभी कभी कितना काम आता है, वह आज ही महसूस कर रही थी। ये जायसवालजी पिताजी के किसी दोस्त के रिश्तेदार थे। उन्होने अपने रिश्ते दार से पिताजी की कुछ कविताएं मांगकर पढी थी। वे पिताजी के लेखन से काफी प्रभावित हुए थे। बाद में उन्होने अखबार में प्रकाशित पिताजी की कविताओं को काट काटकर संकलित भी किया था। एक बार फुर्सत में वे पिताजी से मिलने उसके घर पर भी आए थे। उस दिन जब वह स्कूल से घर लौटी थी, बैठक में ही इनको पाया था। पिताजी ने उनका उससे परिचय करवाया था। फिर चाय नाश्ते वगैरह लेकर एक दो बार बैठक में वह पहुंची तो नजर उनके गंभीर चेहरे पर पडी थी। चेहरे में वही गांभीर्य आज भी नजर आ रहा था, जबकि उम्र 35 के अंदर की ही थी। वे इसी शहर में रहते थे। अचानक स्कूटर बंद हुआ और वह उतर गयी। उन्होने स्कूटर गैरेज में रखा और सीढियों से अपने फलैट की ओर बढें।


छोटे शहरों में भी आजकल जगह की कमी के कारण मकान मालिकों ने पैसे कमाने का एक अच्छा तरीका ढूंढ निकाला है। वे एक बडी इमारत में एक एक कमरे रसोई और बाथरूम को अलग अलग करते हुए फलैट बनाकर किराए पर लगा देते हैं। इससे उन्हें एक अच्छी रकम किराए के रूप में मिल जाती है। तीनमंजिला तीस फलैटों वाली इमारत थी ये। सबसे उपरी मंजिल पर सीढियां खत्म होते ही जायसवाल जी का दरवाजा आ गया। उन्होने जेब से चाबी निकाला और दरवाजा खोलने लगे। देखते ही उसके होश उड गए। ‘घर पर और कोई नहीं है क्या’ उसके मुंह से अनायास ही ये शब्द निकले। अंदर आने के बाद उन्होने कहा ‘पांच वर्ष पहले ही मेरी शादी हुई थी, पर तीन चार महीने बाद ही पत्नी मायके चली गयी। कुछ ही दिनों में मेरा उससे तलाक हो गया।‘ कारण पूछने पर उन्होने स्पष्ट कहा ‘उसे मेरे चरित्र पर संदेह था’ उसकी नजर घडी पर पडी। 8 बज रहे थे। वे बाजार से लाए सामानों को लेकर रसोई में चले गए। चाय बनाया और एक प्‍याला उसे भी थमा दी। शाम से ही वह इतनी परेशान थी कि चाय उसे अमृत की तरह लग रहा था, पर जायसवाल जी के घर में किसी और को न देखकर उसका मन पुन: अशांत हो गया। ये क्या, 'आकाश से गिरे खजूर पर अटके' वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। उसका मन हुआ, जाकर कुछ मदद करे उनकी, पर हिम्मत रसोई में जाने की न हुई। अकेले उनके साथ रात कैसे व्यतीत करेगी, सोच सोचकर मन परेशान था।


वैसे तो उसकी उम्र काफी कम थी, अभी अभी उसने अपना तेरहवाँ जन्मदिन मनाया था, पर मां पिताजी और परिवार जनों के प्यार दुलार और खिलाने पिलाने की विशेष व्‍यवस्था से उसके स्वस्थ शरीर में इतना निखार आ गया था कि देखनेवालों को उसकी उम्र का सही अंदाजा भी नहीं लग सकता था। अपनी सारी सहेलियों की तुलना में वह काफी बडी दिखाई देती थी। इधर एक दो वर्षों में शरीर की बढोत्तरी के साथ साथ दिमाग में भी बहुत सारी बातें आ गयीं थीं। कुछ पिक्चर, कुछ घटनाएं, कुछ सखी-सहेलियो और कुछ कहानियों से युवावस्था, सेक्स, स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में काफी कुछ समझ में आ गया था। हालांकि जायसवाल जी उसके सामने काफी बुजुर्ग थे और उसने उनकी आंखो में ऐसा कुछ भी नहीं देखा था कि उन पर शक किया जाए, पर उनकी पत्नी, उसने इनके चरित्र पर शक क्यो किया, फिर इतने दिनो से ये क्वारें क्यो बैठे हैं, मन में ऊल-जुलूल बाते घूम रही थी। कई घटनाओं में एकांत मिलने पर मर्दों को सीमाओं का उल्लंघन करते उसने पाया था। मर्दों की उम्र के बारे में भी कहना बहुत मुश्किल है, क्योंकि गांव के एक अंकल, जिनकी उम्र किसी भी हालत में 35 से कम की नहीं होगी, उसके साथ पढनेवाली लडकियों को इस निगाह से देखते हें कि उन लोगों ने उस रास्ते से गुजरना ही छोड दिया है। दिन तो फिर भी किसी के साथ व्यतीत किया जा सकता है, पर रात इस एक कमरेवाले स्थान में एक अजनबी पुरूष के साथ………..उसे मां की समझायी हुई बातें याद आने लगीं। लडकियों की सबसे कीमती चीज का अर्थ अब समझ में आ गया था। इज्जत खोने के बाद सही में जिंदगी नर्क ही हो जाती होगी, वह क्या करे अब? कैसे बचाए अपने आपको? 

उसने खिडकी से बाहर देखा। चारो ओर की बत्तियां बुझनी शुरू हो गयी थी। सामने झिलमिल करती एक बडी सी इमारत नजर आयी, चारो ओर रोशनी बिखेरती, यह तो कोई सिनेमाहाल नजर आ रहा है, उसने सोचा। सामने ही चमकदार अक्षरों में लिखा था ‘नीलकमल’ उसे जाना पहचाना सा महसूस हुआ। अरे, इसी सिनेमाहाल के बगल में तो एक चाचाजी रहते हैं। दो साल पहले एक स्कूल में प्रवेश के लिए परीक्षा देने जब वह शहर आयी थी, तो उनके घर में ही तो ठहरी थी। चाचाजी तो बहुत मिलनसार किस्म के थे ही और उनके बेटे बंटी और बेटी पिंकी सब दो दिनों में ही तो उनके दोस्त बन गए थे। उसका मन खुशी से झूम उठा। वह वहीं चली जाएगी। वहां वह आराम से रात व्यतीत कर सकेगी। उसे वहां कोई परेशानी भी नहीं होगी। उसने रसोई में जाकर जायसवालजी से कहा ‘मै अपने एक संबंधी, जो बगल में ही रहते हैं, के यहां जा रही हूं। वहां से सुबह अपने गांव चली जाउंगी।‘ मै छोड आउं‘ उन्होने पूछा। ‘नहीं, नहीं, मैं आराम से चली जाउंगी’ उसने निश्चिंत होकर कहा। वह बाहर निकलकर तेजी से चलती हुई उस सिनेमाहाल के मेन गेट पर पहुंच गयी। 


इवनिंग शो तुरंत ही छूटा था और नाइट शो की शुरूआत होने ही वाली थी। इसलिए उतनी रात गए भी सडक पर अच्छी चहल पहल थी और इसलिए उसे किंचित मात्र को भी भय नहीं हुआ। हाल के मेन गेट पर पहुंच जाने के बाद उसे चाचाजी के यहां जाने का रास्ता भी आसानी से मिल गया। गेट पर पहुंचते ही वह खुशी से पिंकी पिंकी चिल्लाने का दुस्साहस कर बैठी। पर यह क्या? एक मोटे और नाटे व्यक्ति ने दरवाजा खोला। ‘क्या है रे!‘ उस मोटे व्यक्ति ने पूछा। उसकी तो जबान ही नहीं खुल रही थी, पर हिम्मत जुटाकर पूछा ‘पिंकी है’ ‘यहां कोई पिंकी नहीं रहती। मै यहां छह महीनों से रह रहा हूं।‘ उसने जवाब दिया। बगल में चंदा आंटी रहती थी, उसे याद आया, उसने घंटी बजायी, अंकल आण्टी बाहर निकले। ‘आण्टी मै किरण, कल्याणपुर से आयी हूं। पिंकी की बहन’ आण्टीं ने दिमाग पर जोर डाला, पर दो वर्षों का अंतराल, मात्र एकाध घंटे की भेंट और उसके कद काठी में आया परिवर्तन , वह पहचान न सकी। ‘मै अकेली हूं। कृपया रात गुजारने की जगह दे दो’ उसने फिर विनती की। अंकल ने कहा ‘अरे चलो! घर बंद करो। शरीफ घर की लडकियां इतनी रात गए बाहर रहती हैं क्या? आजकल बदमाश लडकियों का गिरोह शहर आया हुआ है। शरीफ बनकर घरों में घुसकर चोरियां, डकैतियां करवाती हैं’ खट के साथ दरवाजा बंद हुआ, जिसकी चोट दिल और दिमाग दोनो को ही लगी। थकहारकर उसने वापस अपने कदम जायसवाल जी के फलैट की ओर बढाए। रात्रि के साढे नौ बज चुके थे। रास्ता अब सुनसान हो चुका था। सन्नाटा ही सन्नाटा नजर आ रहा था। अभी के हालात में सबसे सुरक्षित स्थान जायसवालजी का फलैट ही था, पर वहां भी तो………………….

सोच सोच कर दिमाग और चलचलकर पांव थक गए थे। मेले में भी तो उसने कम शरारतें नहीं की थी। जिन जिन चीजों की प्रशंसा उसने अपनी सहेलियों से सुनी थी, सबकुछ देखा, खाया और आनंद लिया था। अब उसके शरीर को आराम की सख्त जरूरत थी, पर उस फलैट में भी उसे आराम नसीब होगा या नहीं, सोच कर मन परेशान था। इस भवंर से निकलने का रास्ता ढूंढने में उसका दिमाग तेजी से काम कर रहा था, पर कोई उपाय नजर ही नहीं आ रहा था। उसका दिल हुआ, जोर जोर से रोए, पर उसके आंसू पोछनेवाला भी कोई नहीं था। क्या ही अच्छा होता, अगर पिताजी यहां पहुंच गए होते। पिताजी की उपस्थिति में किसी की हिम्मत नहीं थी उसे नजर उठाकर भी देखने की। आज उसे पिताजी की बेइंतहा याद आ रही थी। काश, उसे ढूंढते हुए पिताजी यहां पहुंच जाते।


हां पिताजी, आजतक छोटी मोटी समस्या्ओं से ही उन्होने ही मुक्ति दिलायी है। ‘पिताजी तो पहुंच ही सकते हैं’, उसने सोंचा और उसके चेहरे पर चमक आ गयी। उसके कदम तेजी से जायसवाल जी के फलैट की ओर बढे। हाथों ने घंटी बजायी। दरवाजा खुला। जायसवालजी के आंखों में कई प्रश्न तैर रहे थे। ‘मेरे रिश्तेदार ने डेरा बदल लिया है। पर मैने वहां जाकर बहुत अच्छा किया। मुझे ढूंढते हुए पिताजी वहां पहुंच गए हैं। मुझे देखकर काफी खुश हुए। उनके पडोस में पिताजी का खाना बन रहा है। पिताजी जब पिछली बार यहां आए थे, तब उन्होने पिताजी की कविताएं सुनी थी। आज भी वहां ऐसी ही चर्चा चल रही है। पिताजी को मैने आपके फलैट के बारे में बता दिया है। उन्होनें मुझे यहां भेज दिया । वे यह जानकर बहुत खुश हुए कि मै आपके पास सुरक्षित पहुंच गयी।‘ इतना सारा झूठ एक सांस में अच्छी तरह बोलने के बाद उसके चेहरे का सारा तनाव दूर हो गया। उसने इतनी सफाई से झूठ बोला था कि जायसवाल जी भी अविश्वास न कर सके। उन्होंनें दो प्लेट में खाना निकाला। खुद भी खाए, उसे भी खिलाया। खाना खाने के बाद उसने एक लिहाफ मांगा और सोफे पर ही निश्चिंति से लुढक गयी।  

सुबह जब नींद खुलेगी, मालूम होगा, जायसवाल जी ने रात भर पिताजी का इंतजार किया है। दैनिक क्रियाकर्मो से निवृत होकर वह जल्द ही बाहर आटो पकडेगी और बस स्टैंड पहुंच जाएगी। मात्र एक झूठ से उसके दिमाग की सारी हलचल समाप्त हो गयी थी और दिमाग के अंदर बैठ गयी थी एक सबक, अब वह बडे बुजुर्गों के सीख का आदर करेगी। अपने घर सकुशल पहुंचने की कल्पना मात्र से उसकी सारी थकावट दूर हो गयी और वह कब नींद के आगोश में समा गयी, उसे मालूम भी न हो सका। 

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