Monday, 13 July 2009

समझौता गमों से ... कर ही लेना चाहिए

ब्‍लाग जगत में डेढ महीने से चल रही अनियमितता शायद अब समाप्‍त हो जाए , पूरे जून और आधे जुलाई भर में मात्र पांच पोस्‍ट लिख पायी , वो भी नाम के लिए ही। बहुत उम्‍मीद है कि अब पुन: पहले की तरह ही अधिक से अधिक पोस्‍टों को पढने, अपने विचार देने के साथ ही साथ अपना पोस्‍ट डालने की भी कोशिश करूगी। पर इस दौरान इंटरनेट से जुडे मेरे सारे क्रियाकलाप बंद रहें , आपलोगों से किसी दूसरे क्षेत्र में अपनी व्‍यस्‍तता का बहाना भी बनाती रही , पर ऐसा नहीं था , कहीं व्‍यस्‍त नहीं थी मैं। दरअसल पिछले महीने हुई मेरी जिंदगी के एक महत्‍वपूर्ण फैसले के पक्ष में न होने से मेरा मन ही कहीं भी नहीं लग पा रहा था। अपने जीवन के 45 वर्षों की उम्र तक मैने खुद को एक एक सीढी उपर ही चढते पाया था , इसलिए मेरा मन एक छोटी सी हार को भी स्‍वीकार कर पाने की स्थिति में न था। ऐसा नहीं कि मुझे जीवन में सबकुछ मिला हो , पर जो भी मिला , वह अनायास तौर पर मिला था और जो न मिला , उसके लिए कभी मेहनत भी तो न की थी , सो क्‍या मलाल होता। पर खासकर उस कार्यक्रम में फैसला मेरे विपक्ष में हो , जिसके लिए मैने ही नहीं , पूरे परिवार ने वर्षों मेहनत की हो और अंतिम क्षणो तक विजय की पूरी उम्‍मीद बनीं हो , कष्‍ट होना तो स्‍वाभाविक है। सारे विशेषज्ञ गवाह हैं कि हमारे पूरे कार्यक्रम में कहीं कोई खामी नहीं थी। खैर , दिल , दिमाग या आत्‍मा स्‍वीकारे या नहीं , इस दुनिया में रहना है तो दुनिया के दिए फैसले को मानना हमारी मजबूरी ही तो होती है। क्‍यूंकि कहने को तो हमारे लिए सारी व्‍यवस्‍था है , पर सच तो यह है कि लोग आज भी भाग्‍य भरोसे ही है। 99 प्रतिशत लोगों का भाग्‍य सामान्‍य होता है , इसलिए भले ही सबकुछ सामन्‍य सा महसूस हो , पर जिस 1 प्रतिशत को भाग्‍य की मार सहनी पडती है , वही इसका महत्‍व समझ पाता है।


आप सभी अवश्‍य सोचेंगे कि ग्रह , नक्षत्र और भाग्‍य तो सदा से मेरे अध्‍ययन के विषय रहे हैं , तो मुझे इसका अंदेशा अवश्‍य रहा होगा , हां जरूर था । पर मैं अपनी सावधानी से ग्रहों के प्रभाव को कम करने की पूरी कोशिश में लगी थी। कहावत यह भी है कि भाग्‍य गडबड हो तो पहले बुद्धि भ्रष्‍ट हो जाती है , लोग कुछ उल्‍टा पुल्‍टा करते हैं , इस कारण इस दौरान मैं कोई नया काम भी नहीं कर रही थी , सबकुछ पूर्ववत् ही चल रहा था। फिर अचानक बिल्‍कुल उल्‍टी परिस्थिति की उम्‍मीद मैं कैसे कर सकती थी । मेरे आलेखों से आपने अवश्‍य महसूस किया होगा कि मैं कर्म को हमेशा महत्‍वपूर्ण मानती आयी हूं , अभी तक लोगों को कर्म प्रधान सलाह ही दिया है । मैं मानती आ रही थी कि फल देने में ग्रह पांच दस प्रतिशत तक अच्‍छा या बुरा असर दिखा सकते हैं। हां , जब योग्‍यता की कमी हो तो कभी कभी संयोग उपस्थित कर मनोनुकूल लक्ष्‍य को पूरा करने में ग्रह मददगार हो जाते हैं । पर अपने जीवन में हमेशा ग्रहों के शुभ प्रभाव को अनुभव करने और सकारात्‍मक दृष्टिकोण रखने के कारण कभी यह अहसास नहीं हो पाया था कि जब ग्रह संयोग उपस्थित कर मनोनुकूल काम करवाने में मददगार हो सकते हैं , तो भला दुर्योग उपस्थित कर लक्ष्‍य के विपरीत परिस्थिति को जन्‍म क्‍यूं नहीं दे सकते ?


भले ही मेरे अपने जीवन में असफलता की यह पहली घटना हो , पर ऐसा भी नहीं कि असफलताओं को मैने देखा भी नहीं है। बचपन में अपने परिवार में मैने असफलताओं की एक श्रृंखला को सामने पाया था। परिवार में पिताजी और उनके सभी भाई अपने अपने स्‍कूल कालेजों में टापर होने और अच्‍छी शिक्षा प्राप्‍त करने के बावजूद अपने अपने कैरियर में असफल रह गए थे। क्‍यूंकि गुण और ज्ञान तो बेकार नहीं जाता , अभी भी सभी अपने अपने क्षेत्र में विशेषज्ञता और मौलिकता के लिए चर्चित हैं , पर अपने सिद्धांतों पर अडिग रहनेवाले वे सभी सांसारिक जीवन में असफल तो माने ही जा सकते हैं। वे भले ही खुद की असफलता का कारण अपने भाग्‍य को बताएं , पर बडे होने पर मै इसे दिल से नहीं स्‍वीकार करती थी। गांव में पालन पोषण होने के कारण व्‍यावहारिक तौर पर कुछ खामियां उनमें थी , जिन्‍हें मै चुनचुनकर निकाला करती और उनकी असफलता का दोटूक विश्‍लेषण करती थी। यहां तक कि मेरे पास जो भी ज्‍योतिषीय सलाह लेने को आते , उन्‍हें भी मैं कर्म करने की ही फटकार लगाया करती थी । पर आज महसूस हो रहा है कितनी गलत थी मै ? आज तो मुझे यहां तक महसूस हो रहा है कि बुरे वक्‍त में भाग्‍य का पलडा कर्म से भी भारी हो जाता है।


दुनिया बडी विचित्र और रहस्‍यमय बातों से भरी पडी है,दूसरों को देखकर मनुष्‍य कुछ भी नहीं सीख सकता , जबतक उस परिस्थिति से स्‍वयं न गुजरे। इन डेढ महीनों ने मेरे जीवन दर्शन को ही बदल कर रख दिया है। ग्रह नक्षत्रों का पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव को विश्‍लेषित करने का ढंग भी बदल गया है । इतना निश्चित हो गया है कि ग्रहों , नक्षत्रों के प्रभाव को इतना हल्‍का भी नहीं लिया जाना चाहिए । इसके साथ ही साथ अन्‍य रहस्‍यमय शक्तियों और आध्‍यात्‍म को भी महत्‍व देने लगी हूं। ग्रहों के बुरे प्रभाव के कारण हो या अन्‍य किसी रहस्‍मय शक्ति का प्रभाव , मुझे जीवन में यह समझौता करना पडेगा , इसकी उम्‍मीद सपने में भी न थी। पर खैर, जीवन शायद समझौते का ही नाम है , यह समझौता करके मै निश्चिंत हो जाना चाहती हूं। दूर दराज मे जुगनू के समान जलती बुझती रोशनी बहुत आशाएं जगाती हैं , महसूस होता है , ये जैसे जैसे नजदीक आएंगी , इनकी रोशनी बढती जाएगी , जो भाग्‍य के ठीक होते ही पुन: मेरे जीवन को सुखमय बनाएगी। आखिर इसी प्रकार के विश्‍वास के सहारे तो दुनिया चलती आयी है , वरना कितने प्रतिशत लोग आज की परिस्थिति से संतुष्‍ट रहते हैं।

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