Friday, 5 February 2010

अंतहीन कष्‍टों का जीवन झेलने का मजबूर एक दंपत्ति

पिछले दिनों अपनी एक पोस्‍ट में  मैने बताया था कि लेखक का नजरिया ही किसी कहानी को सुखात्‍मक या दुखात्‍मक बनाता है। जीवन के सुखभरे समय में जब कहानी का अंत कर दिया जाता है , तो उसे सुखात्‍मक और जीवन के दुखभरे समय में कहानी का अंत कर दिया जाता है , तो नो दुखात्‍मक बनता है। पर जीवन में कभी कभी किसी के जीवन का अंतिम समय अंतहीन कष्‍टों का बन जाता है , उसे सुखात्‍मक बनाया ही नहीं जा सकता। इसी सिलसिले में मैने  इस पोस्‍ट में मैने उस महिला की चर्चा की थी , जिसे अपने जीवन में सर्वाधिक कष्‍टप्रद जीवन झेलते देखा है । मैने जिनलोगों के जीवन को निकट से देखा है , उसमें दूसरे नंबर पर एक दंपत्ति को रखा जा सकता है।



उक्‍त दंपत्ति भी गांव के ही सही , पर अच्‍छे गृहस्‍थ परिवार के थे , उनके दो बेटे और तीन बेटियां थी। दोनों में से किसी को कोई बुरी आदत नहीं थी, पर किसी न किसी बीमारी या कुछ अन्‍य खर्च की वजह से धीरे धीरे सारे जमीन बिकते चले गए और जबतक बच्‍चे बडे हुए , वे लोग काफी गरीबी का जीवन गुजार रहे थे। गांव में रहते हुए लडकियों को मिडिल पास ही करवाया था , पर दोनो काफी सुंदर थी। सरकारी नौकरी कर रहे एक स्‍मार्ट लडके को उनकी बडी बेटी पसंद आ गयी। बिना दहेज के लडके ने अपनी ओर से पूरा खर्च और व्‍यवस्‍था करते हुए उससे ब्‍याह रचाया ही , दो चार वर्षों बाद एक संभ्रांत परिवार के अन्‍य लडके को ढूंढकर अपनी साली की शादी करवा दी। वह अपने ससुरालवालों को हर संभव मदद भी किया करता था। उसके बाद उनका जीवन कुछ राहत भरा हो गया।

दोनो बेटियों के तीन तीन बच्‍चे हुए , पर बेटियों के रंग रूप की तरह उनका भाग्‍य सुंदर न रहा। राजी खुशी कुछ दिन ही वे खुशी से रह पाए होंगे कि छोटे छोटे तीन बच्‍चों को छोडकर बडे दामाद चल बसे। बडी बेटी पर मुसीबत का पहाड टूट पडा , बेटी के ससुराल वाले बहू के नौकरी के पक्ष में नहीं थे , क्‍यूंकि वह उतनी पढी लिखी नहीं थी। उसे कंपनी में पति के जगह पर चपरासी की ही नौकरी मिल सकती थी , जो उनकी प्रतिष्‍ठा का प्रश्‍न बन रहा था। ससुरालवालों के दबाब में नौकरी दमाद के छोटे भाई को दे दी गयी। धीरे धीरे इस कष्‍ट से उन्‍होने समझौता किया और नाति नातिनों और अन्‍य बच्‍चों से भरे पूरे घर को देखकर ही खुश होते रहे। छोटे दामाद की आर्थिक स्थिति उतनी अच्‍छी न थी , इसलिए छोटी बेटी की ओर से भी चिंता बनी ही रही।

पर धीरे धीरे समय आराम से व्‍यतीत होता गया और शहर में रह रहे सभी नाती नातिने पढलिखकर अच्‍छे अच्‍छे जगहों पर पहुंच गए। छोटी बेटी का विवाह भी किसी तरह मिलजुलकर कर ही दिया गया , इस तरह उनका अपना सारा कष्‍ट जाता रहा। इन तीनो बेटियों के अलावे उनके दो बेटे थे , जिसमें से एक अपाहिज था , इसलिए उन्‍हें उससे कोई उम्‍मीद तो थी नहीं। एक बडे बेटे के सहारे जिंदगी की बाकी गाडी खींचने को वे तैयार थे। असुविधाओं के मध्‍य बेटा अच्‍छी तरह पढाई तो नहीं कर सका था, कोई व्‍यवसाय शुरू करने के लिए पूंजी का भी अभाव था , इसलिए उसे एक सेठ के यहां काम करने को भेज दिया गया। बचपन से अपनी स्थिति को कमजोर देख रहा बेटा बहुत ही महत्‍वाकांक्षी होता जा रहा था। इसलिए उसने सेठ के यहां बहुत मन लगाकर पूरी जबाबदेही से काम करना शुरू किया , जिसके कारण शीघ्र ही वह अपने मालिक का प्‍यारा बन गया।

मालिक करोडपति थे , अच्‍छा खासा फर्म था उनका , बेटे को हर तरह की सुविधा दी गयी थी। उसके स्‍थायित्‍व और व्‍यवहार को देखते हुए उसका विवाह भी हो गया और एक बिटिया रानी ने जन्‍म भी ले लिया। जीवन भर के कष्‍ट के बाद उक्‍त दंपत्ति के जीवन की गाडी एक बार‍ फिर सही दिशा में मुड गयी थी , जिसे देखकर वे लोग कुछ शांति का अनुभव कर रहे थे , पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। बिटिया रानी एक वर्ष की भी नहीं होगी कि एक रात दुकान से घर लौटते वक्‍त किसी के द्वारा अपने मालिक पर चलायी गयी गोली का शिकार वह बन गया था और तत्‍काल घटनास्‍थल पर ही उसने दम तोड दिया था। भले ही अपनी जान देकर मालिक को बचाकर उसने नमक की कीमत चुका दी हो , पर माता के दूध की कीमत न चुका सका था। उसके माता पिता एक बार फिर अपनी विधवा बहू और अनाथ पोती को अपने अंतहीन आंसुओं के साथ संभालने को मजबूर थे। जहां छोटी मोटी समस्‍या में हम सब इतने परेशान हो जाते हैं , उन्‍होने जीवनभर इतनी तकलीफ कैसे झेली होगी और आगे भी झेलने को बाध्‍य हैं !!

7 comments:

Kulwant Happy said...

बेहद दुख दायक सफर। कुछ लोगों का दर्द से नाता ताउम्र नहीं टूटता। दर्द की लम्बी रात खत्म नहीं होती, और खुशी का सवेरा आता नहीं। लेखक के हाथ में कहानी को क्या मोड़ देना है, लेकिन सब से बड़ा लिखारी क्या मोड़ देकर छोड़ कहानी को पता नहीं। नीली छत वाला।

निर्मला कपिला said...

संगीता जी बहुत दुखदायी कहानी है। जिसे न पूछो वही सुखी है। मार्मिक गाथा है धन्यवाद

Vivek Rastogi said...

सत्य कथन हम अपनी छोटी समस्या को इतना बड़ा करके सोचने लगते हैं, जबकि इस दुनिया में बहुत बड़ी बड़ी समस्याएँ हैं और जिन्हें हैं वो तो किसी से शिकायत भी नहीं कर सकते।

बहुत ही बढिया आलेख..

Udan Tashtari said...

मार्मिक गाथा.

Mithilesh dubey said...

जितनी बार आपको पढता हूँ सोचने पर विवश हो जाता हूँ कि इस तरह की मार्मिक रचना कैसे लिख पाती हैं आप ।

पी.सी.गोदियाल said...

दुखद !पता नहीं कौन से जन्म कर्मो का ....

Mired Mirage said...

हाँ, किसी किसी का भाग्य उसके साथ बहुत खिलवाड़ करता है.तब मेहनत सफ़लता की कुंजी है आदि बातें अर्थहीन हो जाती हैं.
घुघूती बासूती

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