Sunday, 18 April 2010

मान्‍यताएं कब अंधविश्‍वास बन जाती हैं ??

सुपाच्‍य होने के कारण लोग यात्रा में दही खाकर निकला करते थे , माना जाने लगा कि दही की यात्रा अच्‍छी होती है।
देर से पचने के कारण यात्रा में कटहल की सब्‍जी का बहिष्‍कार किया जाता था , माना जाने लगा कि कटहल की यात्रा खराब होती है।
समय के साथ दही को शुभ माना जाने लगा और मान्‍यता बन गयी कि कुछ भी खाकर निकलो , यात्रा के वक्‍त छोटे से चम्‍मच से भी दही अवश्‍य खा लिया जाए तो यात्रा शुभ होगी।
यहां तक तो ठीक था , पर मान्‍यता धीरे धीरे अंधविश्‍वास बन गयी , जब गाडीवान् ने अपनी गाडी में कटहल को रखने से भी मना कर दिया , क्‍यूंकि इसकी यात्रा खराब होती है , कहीं गाडी का एक्‍सीडेंट न हो जाए !!

18 comments:

Udan Tashtari said...

ऐसे ही मान्यताऐं अन्धविश्वास का रुप ले लेती होंगी.

honesty project democracy said...

AISE HI LIKHTE RAHIYE KABHI N KABHI TO LOGON KE SAMAJH MAIN WASTWIKTA AA HI JAYEGI.PRYAS AUR PRSTUTI ACHCHHI HAI.

tulsibhai said...

" manyta ..jo aage jaker andhvishwash ban jaati hai "

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

दिलीप said...

sach kaha sangeeta ji...
aapki post padh ke aur kai manyaten dimaag me aa gayi jo ab andhvishwaas ban chuki hain...
na jaane kab hamara samaaj in sabse baahar aa payega...

http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

महफूज़ अली said...

Bilkul sahi kaha aapne.....

वाणी गीत said...

बहुत सी मान्यताएं इसी तरह अंधविश्वास बनती गयी ...
सही ...!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

रूढ़ियों के उन्मूलन में
यह पोस्ट अवश्य सहायक सिद्ध होगी!

ajit gupta said...

ऐसी ही बहुत सी परम्‍पराएं हैं जो हमारे जीवन में रच बस गयी हैं।

Vivek Rastogi said...

ओह हमें तो यह पता ही नहीं था हम हमेशा उलट किया करते थे।

rashmi ravija said...

बिलकुल सही...ऐसी ही छोटी छोटी बातें , अंधविश्वास का रूप ले लेती हैं...बातों के मूल में लोग नहीं जाते बस...आँखें बंद कर के अनुसरण करने लगते हैं..

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही लिखा है यूँ ही अंधविश्वास बनते हैं ..

परमजीत बाली said...

सही लिखा आपने\

DR. ANWER JAMAL said...

nice post .

DR. ANWER JAMAL said...

appriciated .

दीपक 'मशाल' said...

Sameer ji ne hi kah di meri wali baat.

vinay said...

बहुत अच्छा चिन्तन,मान्यता और अन्धविशवास के मध्य बहुत ही,बारीक रेखा है,उचित शोध से ही,मान्यता और अन्धविशवास के बीच में अन्तर किया जा सकता है ।

कुमार संभव said...

बहुत दुःख होता है की आज के भारत में भी हम अन्धविश्वास से घिरे हुए हैं

चिट्ठाचर्चा said...

आपका ब्लॉग बहुत अच्छा है. आशा है हमारे चर्चा स्तम्भ से आपका हौसला बढेगा.

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