Saturday, 7 August 2010

कुछ दिनों तक तो हमें चार सौ बीस में रहने को बाध्‍य होना पडा !!

पिछले इस और इस आलेख के माध्‍यम से क्रमश: आपको जानकारी हुई कि किन परिस्थितियों में हमने अपने बच्‍चों का बोकारो के स्‍कूल में एडमिशन कराया और हमें एक महीने तक चास में विपरीत परिस्थितियों में रहने को बाध्‍य होना पडा। घर लौटने पर गर्मी की छुट्टियों के 45 दिनों में से एक महीने हमने पूरी निश्चिंति से गुजारे , पर 31 वें दिन से पुन: तनाव ने घेरना शुरू कर दिया था , क्‍यूंकि कहीं भी बात बनती नहीं दिख रही थी। लेकिन उसके बाद काफी गंभीरता से पुन: मकान के लिए दौड धूप करने की शुरूआत की। पर देखते ही देखते 42वां दिन भी पहुंच गया और हमारी बात कहीं भी न बनी।

दो तीन दिन बाद स्‍कूल खुलने थे और इतनी जल्‍दी तो हम हार नहीं मान सकते थे , पर चास के गुजरात कॉलोनी जाने के लिए हम बिल्‍कुल तैयार न थे। ऐसी हालत में हमने मजबूरी में बी एस एल कॉलोनी में किसी मकान का जुगाड होने तक अपने बजट के बाहर कॉपरेटिव कॉलोनी में घर लेना चाहा, जहां बी एस एल की ओर से नियमित पानी और बिजली की सप्‍लाई की जाती है। पर यहां भी मकान खाली हो तब तो मिले।  घूमते घूमते सिर्फ एक जगह 'TO LET' का बोर्ड टंगा मिला , हमने उस फ्लैट की किसी खामी पर ध्‍यान न देते हुए हां कर दी। बिजली और पानी की सुविधा के बाद बाकी असुविधाएं गौण होती हैं, इसका हमें पता चल गया था। हां , 1998 में 2500 रूपए का किराया , पानी के लिए दो सौ रूपए और 4 रू प्रति यूनिट की दर से बिजली का भुगतान हमारे बजट से बाहर था और इसे लंबे समय तक चलाने के लिए कुछ अतिरिक्‍त आय की व्‍यवस्‍था करनी पडती। हमने अपने पुराने मकान मालिक को एक महीने रहने का तीन महीने का किराया सौंपा और वहां से सामान यहां ले आए।  

18 जून से हमलोगों ने उस फ्लैट में रहना और 20 जून से बच्‍चों ने स्‍कूल जाना शुरू कर दिया। दो कमरे बडे बडे थे , पर डाइनिंग रूम को सभी कमरो , रसोई और बाथरूम को जोडनेवाला गलियारा मात्र कहा जा सकता था। गंदगी हद से अधिक , खासकर किचन की खिडकियों का तो पूछे ही मत। नए किरायेदार के आने से पूर्व मकानमालिक दीवालों पर तो रंगरोगन करवाते हैं , पर खिडकियों को यूंही छोड देते हैं , जिसका फल हमें भुगतना पड रहा था। पूरे घर की साफ सफाई में हमें 10 दिन लग गए , इस बार हमलोग कुछ और सामान लेकर आए थे , घर धीरे धीरे व्‍यवस्थित होने लगा था। बाथरूम का पानी कभी कभी डाइनिंग में अवश्‍य चला जाता था , पर इसे अनदेखा करके हम चैन की सांस लेने लगे थे।

हमें बाद में मालूम हुआ कि यह फ्लैट मुझे इतनी जल्‍दी सामान्‍य परिस्थितियों में नहीं मिला था , वो इसलिए मिला था , क्‍यूंकि लोग इसमें रहना पसंद नहीं करते थे ,  इसका नंबर 420 जो था। मकानमालिक ने बाद में स्‍पष्‍ट किया कि प्‍लॉट एलॉट होने के वक्‍त भी कम प्‍वाइंट होने के बाद भी उन्‍हें यह प्‍लॉट आसानी से मिल गया था , क्‍यूंकि अधिक प्‍वाइंटवाले लोग प्‍लॉट नं 420 को लेकर अपनी छवि को खराब नहीं करना चाहते थे। भला हो उन कुछ नंबरों का , जिसे आमतौर पर लोग प्रयोग नहीं करना चाहते और वह नंबर मुसीबत में पडे लोगों की मदद कर देता है। ऐसी परिस्थिति में ही मुझे भी 420 में रहने का मौका मिल गया , पर मात्र 18 दिनों तक ही वहां रह पायी , आखिर क्‍या हुआ आगे ?? इसे जानने के लिए अगली कडी को पढना न भूलें।

9 comments:

हास्यफुहार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

हास्यफुहार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Neeraj Rohilla said...

संगीता जी,
अगली कडी का बेसब्री से इन्तजार है। हमें भी वो दिन याद आ गये जब अपने पिताजी की नौकरी के चलते हर तीसरे साल सामान पैक करके नये शहर जाने की तैयारी रहती थी।

बी एस पाबला said...

ओह! चार सौ बीसी के वो दिन :-)

रोचक प्रसंग

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

:):) ४२० नम्बर काम कर गया ....रोचक ....

संजीव गौतम said...

ये सब इंसानी दिमाग के फितूर हैं। किसी-किसी जगह किसी के यहां जाने के लिए कोई दिन शुभ होता है कहीं वही दिन अशुभ। खैर अगली कड़ी का इंतजार रहेगा।

veerubhai said...

sANGEETAA JI ,wHEN IT COMES TO ACCOMODATION PARTICULARLY IN A METROPOLITAN CENTAR LIKE DELHI SR COMMISSIONED OFFIERS HAVE ALSO TO WEIGHT THEIR TURN.tHIS COUNTRY BELONGS TO BUREUCRATS AND COORUPT POLITIAINS .THEY ARE THE VVIPS THE REST ARE HANDICAPS .
I EMPETHIZE YOUR DEEP FELT OBSERVATIONS .
VEERUBHAI
4C,ANURADHA ,NEPIAR ROAD ,NOFRA ,COLABA ,NAVY NAGAR ,MUMBAI -400-005
09350986685/09167361634

ललित शर्मा said...

मुझे तो नहीं लगता कि नम्बरों से कुछ फ़र्क पड़ता होगा। कई होटलों में तो 13नम्बर का रुम ही नहीं होता। उसे 12 ए कर देते हैं। फ़िर सीधा 14, लोगों के मन में जमे अंधविश्वास को दूर करना मुस्किल है।

इंतजार है अगली कड़ी का

Udan Tashtari said...

हा हा!! चार सौ बीसी तो अट्ठारह दिनों की भी बहुत होती है...खैर, सुनेंगे जरुर कि आगे क्या हुआ. :)

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