Friday, 4 January 2013

दामिनी को सच्‍ची श्रद्धांजलि कैसे मिले ??


पुराने वर्ष को विदा करने और नए वर्ष का स्‍वागत करने के , व्‍यतीत किए गए वर्ष का मूल्‍यांकण करने और नए वर्ष के लिए अपने कार्यक्रम बनाने यानि हर व्‍यक्ति के लिए महत्‍वपूर्ण दिसंबर के उत्‍तरार्द्ध और जनवरी के पूवार्द्ध में पड रही कडाके की ठंड के मध्‍य देश एक अलग ही आग में जल रहा है । एक दुष्‍कर्म के एवज में अपराधियों को फांसी मिलने की मांग पर जनता अटल है , और सरकार अपनी जिद पर । पर सारी घटनाओं को देखने सुनने और चिंतन करने के बाद चाहकर भी इतने दिनों तक अपने विचारों को सुनियोजित ढंग से लिख पाने में सफल न हो सकी। क्‍यो‍कि मेरा सारा ध्‍यान संकेन्‍द्रण अपने सॉफ्टवेयर में एक एक्‍सटेंशन करने में बना हुआ था , जिसकी जानकारी ज्‍योतिषप्रेमियों को मेरे ज्‍योतिष वाले ब्‍लॉग से मिल जाएगी , मुझे यहां चर्चा करने की जरूरत नहीं है , क्‍योंकि इससे मुख्‍य मुद्दे से भटकने का भय है।

वैसे बहुत खुशी की बात है कि 23 वर्षीया बच्‍ची दामिनी को इंसाफ दिलाने के लिए सारा देश एक साथ उठ खडा हुआ है। वैसे ऐसी घटना कोई पहली बार हमारे देश में नहीं हुर्इ है , प्रतिदिन अखबारों में ऐसी घटनाएं नजर में आ ही जाती हैं , शारिरीक और भावनात्‍मक तौर पर कमजोर होने का फायदा कभी कोई उठा ही लेता है। पुराने जमाने में तो बच्चियां अभिभावकों के आसपास उनकी देख रेख में रहा करती थी । पर आज युग बदल चुका है , बचे भी तो वे कैसे ? शिक्षा दीक्षा काम काज सब उनके लिए भी आवश्‍यक है , पहले की महिलाओं की तरह चादर बुरके में घर आंगन में कैद तो नहीं रह सकती। हजारों महिलाएं अपने साथ हो रहे अन्‍याय को आज भी बेबसी से देख रही हैं।

इसका मुख्‍य कारण यह है कि हमारे समाज में आजतक ऐसी व्‍यवस्‍था है कि इस मामले में शिकारी को नहीं शिकार को ही सजा दी जाती है। यही कारण है कि आजतक लडकियों की जीवनशैली को इस कदर बनाया जाता रहा कि वे किसी के शिकार होने से बचे। यदि कभी किसी खास परिस्थिति में उनके साथ कोई हादसा हो भी गया तो इस बात को पचाना लडकियों या उसके परिवार वालों की मजबूरी होती है। दुनिया भर में प्रत्‍येक समाज और राष्‍ट्र में अपराध के हिसाब से दिया दोषी को दंड दिए जाने का नियम है। पर हमारे यहां आजतक ऐसे अपराध करने वाले समाज में सर उठाकर घूमते हैं। पर तरह तरह के सवालों , तानों से मासूम लडकियों का जीवन बेकार हो जाता है । इसलिए आजतक प्रत्‍येक गांव शहरों में ऐसे मुद्दों को अभिभावकों द्वारा ढंककर ही रखा जाता है। यहां तक कि ऐसी अपराधों की जानकारी बच्चियों या घर की महिलाओं तक ही सीमित रह जाती है , घर के पुरूषों तक को ऐसे अपराधों का पता नहीं चल पाता।  बच्चियों  , उनके अभिभावकों की चुप्पियों का बलात्‍कारी नाजायज फायदा उठा रहे हैं।

गिने चुने मामलों में ही ऐसी बातें सार्वजनिक होती है , जब घरवालों के नहीं, बाहरवालों के नजर में ऐसी घटनाएं आ जाती हैं। इस वक्‍त भी घरवालों के द्वारा नहीं , बाहरी लोगों के नजर में आ जाने से ही बलात्‍कारियों के विरूद्ध ऐसी आवाज उठी है , लाखों दामिनियां अभी भी सबकुछ झेलती जा रही हैं। खैर दामिनी अब नहीं रही , इसलिए उसकी जिंदगी के बेकार होने का खतरा तो नहीं है । पर समाज को अपनी सोंच बदलने की आवश्‍यकता है , किसी निर्दोष को दोषी ठहराना कदापि उचित नहीं , यही अपराधियों की संख्‍या के बढने की मुख्‍य वजह है। यदि महिलाओं को यह विश्‍वास होता कि उनके साथ हुए हादसे के प्रति समाज संवेदनशील रहेगा , उसकी मदद करेगा , तो ऐसे अपराध नहीं बढते , इसलिए किसी तरह के आंदोलन से पहले समाज के लोगों को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्‍यकता है। समाज में ऐसी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए कि अपराधी को अपना चेहरा छुपाना पडे , न कि उनके द्वारा सतायी गयी शारीरिक मानसिक तौर पर परेशान युवतियों को। उन्‍हें ससम्‍मान जीने का हक चाहिए , बिना भेदभाव के नौकरी और शादी विवाह के अवसर मिले। तभी ऐसे अपराधों में कमी हो पाएगी और दामिनी को सच्‍ची श्रद्धांजलि यही होगी। 

9 comments:

Ramakant Singh said...

समाज में ऐसी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए कि अपराधी को अपना चेहरा छुपाना पडे , न कि उनके द्वारा सतायी गयी शारीरिक मानसिक तौर पर परेशान युवतियों को। उन्‍हें ससम्‍मान जीने का हक चाहिए , बिना भेदभाव के नौकरी और शादी विवाह के अवसर मिले। तभी ऐसे अपराधों में कमी हो पाएगी और दामिनी को सच्‍ची श्रद्धांजलि यही होगी।

IT IS A PART OF SOCIAL JUSTICE.

संध्या शर्मा said...

सहमत हूँ आपके विचारों से... दामिनी को सच्ची दामिनी को सच्‍ची श्रद्धांजलि यही होगी कि उसके जैसे हजारों दामिनियों को इस समाज में इज्जत से जीने का अधिकार मिले...

Ramakant Singh said...

जो बिट गया सो बीत गया सो बीत गया ना हो उसकी पुनरावृत्ति न हो इसके लिए सर्वकालिक , सर्वमान्य, सर्वग्राह्य , हल आवश्यक जो एक मात्र मौत की सजा कई उम्र का बंधन न ही जाती, धर्म वर्ग, समुदाय, रंग, देश . फुल एंड फ़ाइनल हेंग टिल डेथ ..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (06-01-2013) के चर्चा मंच-1116 (जनवरी की ठण्ड) पर भी होगी!
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कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि चर्चा में स्थान पाने वाले ब्लॉगर्स को मैं सूचना क्यों भेजता हूँ कि उनकी प्रविष्टि की चर्चा चर्चा मंच पर है। लेकिन तभी अन्तर्मन से आवाज आती है कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह सही कर रहा हूँ। क्योंकि इसका एक कारण तो यह है कि इससे लिंक सत्यापित हो जाते हैं और दूसरा कारण यह है कि किसी पत्रिका या साइट पर यदि किसी का लिंक लिया जाता है उसको सूचित करना व्यवस्थापक का कर्तव्य होता है।
सादर...!
नववर्ष की मंगलकामनाओं के साथ-
सूचनार्थ!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रचना दीक्षित said...

संवेदनहीनता को सबसे पहले अपने से झाड के अलग करना पड़ेगा. दूसरों के दर्द को अपना दर्द समझना होगा बिना किसी भेद भाव के.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

गंभीर समस्या पर सामयिक सटीक आलेख...बहुत बहुत बधाई...

आशा जोगळेकर said...

जारी रहे यह संघर्ष ।

कविता रावत said...

बढ़िया चिंतन ..

महेश कुमार वर्मा : Mahesh Kumar Verma said...

समाज में ऐसी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए कि अपराधी को अपना चेहरा छुपाना पडे , न कि उनके द्वारा सतायी गयी शारीरिक मानसिक तौर पर परेशान युवतियों को। उन्‍हें ससम्‍मान जीने का हक चाहिए , बिना भेदभाव के नौकरी और शादी विवाह के अवसर मिले। .......मैं इस बात से सहमत हूँ।

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