Monday, 30 March 2009

धर्म के पालन में भी धर्म संकट ?????

जी हां , कभी कभी धर्म के पालन में भी धर्म संकट उठ खडा होता है। ऐसा तब होता है जब पुस्‍तकों में लिखे या परंपरागत तौर पर चलते आ रहे धर्म का हमारे अंदर के धर्म से टकराव होता है। अंदर का धर्म यदि स्‍वार्थ से लिप्‍त हो तो इच्‍छा के बावजूद भी हममें इतनी हिम्‍मत नहीं होती कि हम सार्वजनिक तौर पर परंपरागत रूप से चलते आ रहे धर्म का विरोध कर सकें , पर यदि हमारा आंतरिक धर्म परोपकार की भावना या किसी अच्‍छे उद्देश्‍य पर आधारित होता है, तो हमें नियमों के विपक्ष में उठ खडा होने की शक्ति मिल जाती है। ऐसी हालत में समाज के अन्‍य जनों के सहयोग से भी हम विरोध के स्‍वर को मजबूत कर पाते हैं। इससे कुछ परंपरावादी लोगों को अवश्‍य तकलीफ हो जाती है , पर हम लाचार होते हैं।

इस संदर्भ में मैं दो घटनाओं का उल्‍लेख करना चाहूंगी। पहली घटना मेरे जन्‍म के छह महीनें बाद मेरा मुंडन करवाने के वक्‍त की है । हमारे परिवार के सभी बच्‍चों का मुंडन बोकारो और रामगढ के मध्‍य दामोदर नदी के तट पर एक प्रसिद्ध धर्मस्‍थान रजरप्‍पा में स्थित मां छिन्‍नमस्तिका देवीकी पूजा के बाद ही की जाती आ रही है। पूजा के लिए एक बकरे की बलि देने की भी प्रथा है। मेरे मम्‍मी और पापा बलि प्रथा के घोर विरोधी , पर परिवार के दूसरे बच्‍चों के मामलों में तो दखलअंदाजी कर नहीं सकते थे , ईश्‍वर न करे , पर कोई अनहोनी हो गयी , तो कौन बर्दाश्‍त करेगा इनके सिद्धांतों को , इसलिए आंखे मूंदे अपने स्‍वभाव के विपरीत कार्य को होते देखते रहे। पर जैसे ही उनकी पहली संतान यानि मेरे मुंडन की बारी आयी , उन्‍होने ऐलान कर दिया कि वे देवी मां की पूजा फल, फूल और कपडे से करेंगे, पर इस कार्यक्रम में बकरे की बलि नहीं देंगे। घरवाले परेशान , नियम विरूद्ध काम करें और कोई विपत्ति आ जाए तो क्‍या होगा ? कितने दिनो तक घर का माहौल ही बिगडा रहा , पर मेरे मम्‍मी पापा को इस मामले में समझौता नहीं करना था , सो उन्‍होने नहीं किया । फिर मेरे दादाजी तो काफी हिम्‍मतवर थे ही , उनका सहयोग मिल गया। देवी देवता की कौन कहे , भूत प्रेत तक के नाम से वे नहीं डरते थे , उनकी हिम्‍मत का बखान किसी अगले पोस्‍ट में करूंगी । बाकी घरवाले भी विश्‍वास में आ गए और बिना बलि के ही मेरा मुंडन हो गया। क्‍या मुंडन के बाद सबकुछ सामान्‍य ही रहा , जानने के लिए मेरी अगली पोस्‍ट कल पढें।
दूसरी घटना तब की है , जब विवाह के पश्‍चात पहली बार अपने पति के साथ मै अपने गांव पहुंची थी। चूंकि हमारे गांव में नवविवाहिताओं को पति के साथ पूरे गांव के मंदिरों में जाकर देवताओं के दर्शन करने की प्रथा चल रही है , इसलिए हमलोगों को भी ले जाया गया। वैज्ञानिक दृष्टिकोण युक्‍त स्‍वभाव होने के बावजूद सभी देवी देवताओं के आगे हाथ जोडने में तो हमें कोई दिक्‍कत नहीं है। मान लें , वो भगवान न भी हो , सामान्‍य व्‍यक्ति ही हो , धर्मशास्‍त्रों में उनके बारे में यूं ही बखान कर दिया गया हो , पर हमारे पूर्वज तो हैं , कुछ असाधारण गुणों से युक्‍त होने के कारण ही इतने दिनों से उनकी पूजा की जा रही है , हम भी कर लें तो कोई अनर्थ तो नहीं होगा। पर आगे एक सती मंदिर आया , इसमें हमारे ही अपने परिवार की एक सती की पूजा की जाती है , मैने तो बचपन से सती जी की इतनी कहानियां सुनी है , शादी विवाह या अन्‍य अवसरों पर उनके गाने भी गाए जाते हैं ,पति के मरने के बाद उनकी चिता पर बैठने के लिए बिना भय के उन्‍होने अपना पूरा श्रृंगार खुद किया था , पर कोई उन्‍हे शीशे की चूडियां लाकर नहीं दे सके थे , न जाने कितने दिन हो गए इस बात के ,पर इसी अफसोस में आजतक हमारे परिवार में शीशे की चूडियां तक नहीं पहनी जाती है। इतनी इज्‍जत के साथ उनकी पूजा होते देखा था , इसलिए सती प्रथा को दूर करने के राजा राम मोहन राय के अथक प्रयासों को पुस्‍तकों में पढने के बावजूद मेरे दिमाग में उक्‍त सती जी या अपने परिवार की गलत मानसिकता के लिए कोई सवाल न था। पर इन्‍होने तो यहां हाथ जोडने से साफ इंकार कर दिया ‘यहां हाथ जोडने का मतलब सती प्रथा को बढावा देना है’ उनकी इस बात से घर की बूढी महिलाएं परेशान , ये किसी को दुखी नहीं करना चाहते थे , पर परिस्थितियां ही ऐसी आ गयी थी। धर्म पालन में ऐसा ही धर्म संकट खडा हो जाता है कभी कभी।

Saturday, 28 March 2009

आइए , थोडा ही सही , मातृ ऋण को चुकता करने की कोशिश तो करें

कल की नीरज नाम के उक्‍त व्‍यक्ति की टिप्‍पणी से बनी मेरी परेशानी को दूर करने में और हौसला बढाने में आप सब पाठकों का जो सहयोग मिला , उसके लिए बहुत बहुत धन्‍यवाद। आइए , आज ज्‍योतिष की चर्चा न कर एक खास मुद्दे पर चर्चा करें। इतनी बडी जनसंख्‍या का बोझ उठाती , भोजन , वस्‍त्र , आवास जैसी मूल आवश्‍यकताओं के साथ ही साथ अन्‍य हर प्रकार की जरूरत को पूरा करती धरती माता के अहसान को याद करें। आजतक धरती माता हमारी सारी जरूरत इसलिए पूरी कर पा रही है , क्‍योंकि वह समर्थ है। पर सोंचकर देखें , उस दिन के बारे में , जब यह असमर्थ हो जाए , जिस दिशा में जाने की सिर्फ शुरूआत ही नहीं हुई , बहुत दूर तक का सफर तय किया जा चुका है। अपनी आंचल और गर्भ में हमारे लिए हर सुख सुविधा को समेटे हरी भरी धरती माता खूबसूरत रूप ही आज खोता जा रहा है।


बीसवीं सदी के अंधाधुंध जनसंख्‍या वृद्धि की आवश्‍यकताओं को पूरी करने के क्रम में हो या विकास की अंधी दौड के लालच में , कल कारखानों की संख्‍या के बढने से पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पडना स्‍वाभाविक है। पृथ्‍वी के बढते हुए तापमान से हिम पिघलते जा रहे हें , जलस्‍तर नीचे आता जा रहा है , समुद्र तल बढता जा रहा है। साधनों के अंधाधुंध दोहन से धरती माता की सुंदरता तो समाप्‍त हुई ही है , उसके सामर्थ्‍य पर भी बुरा प्रभाव पड रहा है और माता ही जब सामर्थ्‍यहीन हो जाए तो उसे मजबूरीवश ही सही , उसे बच्‍चों को रोता बिलखता छोडना ही होगा। हम कल्‍पना भी नहीं कर सकते कि वह दिन कितना भयावह होगा।


आजतक हमने अपनी पृथ्‍वी मां को कुछ दिया नहीं है , देना भी नहीं था , सिर्फ इसे नष्‍ट भ्रष्‍ट होने से बचाए रखना था , वो भी नहीं कर पाए हमलोग। कल से ही रचना जी और अरविंद मिश्रा जी ने कई ब्‍लोगों के माध्‍यम से ‘धरती प्रहर’ में अपना वोट धरती के पक्ष में देने की अपील की है। वैसे अभी तक इस दिशा में किया जानेवाला प्रयास काफी कम है और हमें मालूम है कि इससे पूरी सदी में बिगाडे गए पर्यावरण को बनाने में सफलता नहीं मिलेगी। फिर भी आइए , थोडा ही सही , मातृऋण को चुकता करने की दिशा में कम से कम प्रयास तो किया जाए। आज धरती माता के पक्ष में मतदान करने के लिए साढे आठ बजे से साढे नौ बजे तक अपने घर के बिजली के मेन स्विच को ही आफ कर दें और एक घंटे बिना बिजली के बिताकर धरती माता के प्रति अपनी कृतज्ञता जाहिर करें।

Thursday, 26 March 2009

धर्म गलत कैसे हो सकता है ?


धर्म गलत कैसे हो सकता है ? आज उसे गलत ढंग से परिभाषित किया जा रहा है। धर्म का अर्थ है धारण करने योग्य व्यवहार , जिससे पूरी मानव जाति का शारीरिक , आर्थिक , मानसिक और पारिवारिक .... और इन सबसे अधिक नैतिक विकास हो सके , भले ही उसके लिए दुनिया को थोड़ा भय , दबाब या लालच दिया जाए। लेकिन यह तो मानना ही होगा कि कोई भी विश्वास कभी ज्यादती के आधार पर नहीं हो सकती। यह सर्वदेशीय या सर्वकालिक भी नही हो सकता। इसलिए दूसरे देश या काल में भले ही किसी धर्म का महत्व कम हो जाए , जिस युग और जिस देश में इनके नियमों की संहिता तैयार होती है , यह काफी लोकप्रिय होता है। किसी भी देश में साधन और साध्‍य के मध्‍य तालमेल बनाने में समाज हमेशा दबाब में होता है और इस दबाब से बचाने के लिए किसी तरह का विकल्प तैयार किया जाए , तो वह इसे अपनाने को पूर्ण तैयार होता है , इसे ही धर्म कहकर पुकारा जाता है। कालांतर में इसमें कुछ ढकोसले , कुछ अंधविश्वास , कुछ तुच्छता स्वयमेव उपस्थित होते चले जाते हैं , जिसको समय के साथ शुद्ध किया जाना भी उतना ही आवश्‍यक है।



यदि हिन्‍दु धर्म की ओर ध्‍यान दें , तो यहां गुरू सिर्फ आध्‍यात्मिक मामलों के ही गुरू नहीं , हर विषय के अध्‍येता हुआ करते थे। वे वैज्ञानिक भी थे और दार्शनिक भी और उनके द्वारा जो भी नियम बनाए गए , वे समूचे मानव जाति के कल्‍याण के लिए थे। अतिवृष्टि और अनावृष्टि की मार से बर्वाद हुए फसल की क्षतिपूर्ति के लिए यदि समय समय पर फलाहार के बहाने बनाए गए तो गलत क्‍या था ? पर्व त्‍यौहारों पर लाखों की भीड को नदी में स्‍नान कराने और नदी के तल से सबों को एक एक मुट्ठी मिट्टी निकालने के क्रम में नदियों की गहराई को बचाया जाता रहा तो इसमें गलत क्‍या था ? तात्‍कालीक फल न प्रदान करने वाले पीपल और बट के पेडों के नष्‍ट होने के भय को देखते हुए और उसके दूरगामी फल को देखते हुए उन्‍हें धर्म से जोडा गया तो गलत क्‍या था ? संबंधों का निर्वाह सही ढंग से हो सके , इसके लिए एक बंधन बनाए गए तो इसमें गलत क्‍या था ? चूहा, उल्लू, गरुड़, हाथी, सिंह , सबको भगवान का वाहन मानने के क्रम में पशुओं से भी प्रेम करने की पवृत्ति बनायी गयी , तो इसमें गलत क्‍या था ? पुराने त्‍यौहारों पर गौर किया जाए तो पाएंगे कि इसके नियमों का पालन करने में एक एक वस्‍तु की जरूरत पडती है , जिन्‍हें मानने के क्रम में समाज के विभिन्‍न वर्गों के मध्‍य परस्‍पर गजब का लेन देन होता है और त्‍यौहार के बहाने ही सही , पर वर्षभर लोगों को जरूरत पडनेवाली हर प्रकार की सामग्री हर घर में पहुंच जाती है ।


वास्‍तव में, किसी भी बात की सही व्‍याख्‍या तभी की जा सकती है , जब उस विषय विशेष का गंभीर अध्‍ययन किया गया हो। पुराने सभी नियम पुराने युग की जीवनशैली के अनुरूप थे , आज उनका महत्‍व कम दिखाई पड सकता है , पर उसमें सुधार की पूरी गुजाइश है। मैं विचारों से उसे ही धार्मिक मानती हूं , जिसके अंदर वे सभी गुण हों , जो धारण किए जाने चाहिए। मैं परमशक्ति में विश्‍वास रखती हूं , बाह्याडंबरों में नहीं, एक ज्‍योतिषी होने के बावजूद पूजा पाठ में बहुत समय जाया करने पर भी मेरा विश्‍वास नहीं और न ही परंपरागत रीति रिवाजों को ही हूबहू मानती हूं। एक भगवान पर या प्रकृति के नियमों पर विश्‍वास रखो तो कितना भी दुख विपत्ति आ जाए , असीम शांति मिलती है। हमेशा लगता है, भगवान या प्रकृति हमारे साथ हैं । वैसे इस बात पर भी विश्‍वास रखना चाहिए कि काम प्रकृति के नियमानुसार ही होते हैं , लाख भगवान की पूजा कर लो, कुछ बदलने वाला नहीं , पर इस बहाने शांति ही मिलती है तो कम बडी बात नहीं।


आज कुछ लोगों और कई संस्थाओ का लक्ष्य धर्म के नाम पर फैले अंधविश्वास , पुरातनपंथ , ढकोसलों को समाप्त करना है , यह तो बहुत ही अच्छी बात है , क्योंकि हमारा लक्ष्य भी यही है। लेकिन हर व्यक्ति या पूरे समाज को किसी भी मामले में एक विकल्प की तलाश रहती है। झाड़.फूंक को तब मान्यता मिलनी बंद हो गयी , जब इलाज के लिए लोगों को एलोपैथी के रूप में एक वैज्ञानिक पद्धति मिली। यदि ये संस्थाएं आज के युग के अनुरूप समाज , प्रकृति और अन्‍य हर प्रकार के विकास के लिए आवश्‍यक कुछ नियमों की संहिता तैयार करें , जो सारे मानव जाति के कल्याण के लिए हो , तो भला जनता उसे क्यो नहीं मानेगी ? दो.चार लोगों के नियम विरूद्ध होने या अधार्मिक होने से युग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता , किन्तु यदि उन्हें देख सारी जनता अधर्म के राह पर चल पड़े , नैतिक विकास या मानवीय मूल्‍यों से अधिक महत्व अपने शारीरिक , मानसिक , आर्थिक और पारिवारिक विकास को दे , तो सुख.शांति का अंत होना ही है। इसके कारण आनेवाले समय में मानवजाति चैन से नही जी पाएगी। ऐसे में आज भी जरूरत है धर्म की ही सही परिभाषा रचने की और उसके अनुरूप जनता से क्रियाकलापों को अंजाम दिलवाने की। यदि इसमें ये संस्थाएं कामयाब हुईं , तो मानव जाति का उत्थान निश्चित है।



धर्म का दिखावा करनेवाले पाखंडी , धोखेबाज और कपटी लोगों के प्रभाव में जनता कुछ दिनों के लिए भले ही बेवकूफ बन जाए , किन्तु फिर जल्‍द ही उनकी पोल अवश्य खुल जाती है , जबकि महात्मा गांधी , मदर टेरेसा , ईसा मसीह , स्वामी दयानंद , स्वामी विवेकानंद , गौतम बुद्ध , महावीर , गुरू नानक , चैतन्य महाप्रभु जैसे अनेकानेक व्‍यक्तित्‍व धर्माचरण के द्वारा युगों.युगों तक पूजे जा रहे हैं। फिर धर्म को गलत कैसे और क्यों समझा जाए ?

Sunday, 15 March 2009

‘सब सारहन एके तेरी देखा हथिन’

मेरे पापाजी ने अपने विद्यार्थी जीवन का , जब वे हाई स्‍कूल में पढ रहे थे , एक संस्‍मरण सुनाया था । कक्षा लगने ही वाली थी , सभी विद्यार्थी अपनी अपनी कक्षा में बैठ चुके थे। गेट बंद हो चुका था और कुछ छात्र देर होने के कारण जल्‍दी जल्‍दी गेट के बगल की सीढियों से एक एक कर अंदर जाने की कोशिश कर रहे थे । चाहे जिस उद्देश्‍य से भी एक बूढा स्‍कूल जा रहा हो , सीढी को जाम कर देने की वजह से कुछ बच्‍चे परेशान थे और उनमे से किसी शैतान बच्‍चे ने उस बूढे को कुछ कहकर चिढा दिया। चिढाकर वह तेजी से अपनी कक्षा की ओर बढ गया। बूढे ने गुस्‍से में तमतमाते हुए हेडमास्‍टर साहब के पास जाकर शिकायत की । हेडमास्‍टर साहब भी लडके को उसकी करनी का फल चखाना चाहते थे , पर समस्‍या थी , उस लडके को पहचानने की । बूढे ने कक्षा की ओर इशारा करते हुए बताया कि वह उसी कक्षा में गया है और देखने पर वे पहचान जाएंगे। मास्‍टर साहब ने तुरंत उस कक्षा के सारे बच्‍चों को बाहर निकालकर उन्‍हें एक कतार में खडा करवाया और उस बूढे से बच्‍चे को पहचानने को कहा। बूढे ने एक बार नहीं , दो या तीन बार चक्‍कर लगाते हुए कतार में खडे सबके चेहरों को गौर से देखा , पर यूनिफार्म में देखे उस बच्‍चे को इतने सारे यूनिफार्म वाले बच्‍चों के बीच पहचान पाना आसान न था। सफल न होने पर उस बूढे ने यहां बोली जानेवाली भाषा 'खोरठा' में भुनभुनाते हुए कहा ‘सब सारहन एके तेरी देखा हथिन’ यानि ‘सब साले एक ही तरह के दिखते हैं’



आज अचानक इस प्रसंग के याद आने का एक महत्‍वपूर्ण कारण है। कल अरविंद मिश्राजी ने अपने ब्‍लाग में इटली के प्रसिद्ध खगोलविज्ञानी Giovanni Virginio Schiaparelli की एक फोटोलगाकर पाठकों को उसे बूझने को दिया। मैने उनके बारे में कब पढा था , यह तो याद नहीं , पर मुझे यह फोटो बिल्‍कुल जानी पहचानी सी लगी। अभी कुछ दिन पहले जार्ज वेस्टिंगहाउस को पढ रही थी। मुझे ऐसा लगा कि ये जार्ज वेस्टिंगहाउस ही हैं , पर मैने अपनी याददाश्‍त के आधार पर इस पहेली का हल नहीं बताया। मैं गूगल के इमेज सर्च में गयी , वहां जार्ज वेस्टिंगहाउस का इमेज सर्च किया , उस इमेज को देखकर मैं आश्‍वस्‍त हुई और निश्चिंति से लिख दिया ‘जार्ज जार्ज वेस्टिंगहाउस हैं ये ...’ , पर बाद में जब अरविंद जी ने अपनी टिप्‍पणियों को प्रकाशित किया तो अधिकांश जगहों पर Giovanni Virginio Schiaparelli का नाम देखकर मैं चौंक गयी। जब गूगल के इमेज सर्च में उनको सर्च किया तो वही फोटो मिल गयी , जो अरविंद जी ने लगा रखी थी। उस बूढे की तरह मुझे भी कहना पड रहा है कि सब दाढी , मूंछ और बाल वाले एक ही तरह के दिखते हें। अब मुझे पता चला कि सिर्फ समयाभाव के कारण नहीं , वरन् अपनी पहचान को छुपाने के लिए भी हमारे ऋषिमुनियों से लेकर अभी हाल तक के दार्शनिकों , विचारकों को दाढी बाल बढाए रखने की आवश्‍यकता थी , ताकि कोई यदि उनके विचारों और दर्शनों से सहमत न भी हो तो उनका नुकसान न कर सकें। जब दाढी मूंछ और बाल से युक्‍त उनके चेहरे को पहचान ही नहीं पाएंगे तो भला नुकसान कैसे करेंगे ?

Friday, 13 March 2009

कम्‍प्‍यूटर के विशेषज्ञ और हिन्‍दी प्रेमी ... क्‍या एक जानकारी देगे मुझे ?

कंप्‍यूटर के विज्‍युअल बेसिक के प्रोग्रामिंग प्‍लेटफार्म पर 2002-2003 में मैने ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ के जन्‍मदाता श्री विद्यासागर महथा जी के 40 वर्षो के सतत् अध्‍ययन और मौलिक चिंतन द्वारा विकसित किए गए खुद के सिद्धांतों पर आधारित ‘प्रीडेस्‍टीनेशन’ नामक एक साफ्टवेयर विकसित किया था। नवीनतम सिद्धांतो और कई प्रकार के ग्राफों के फार्मूलों से युक्‍त यह साफ्टवेयर अभी तक सिर्फ हमारे ही कम्‍प्‍यूटर की शोभा बढा रही है , न तो इसे पेटेण्‍ट करवाया जा सका है और न ही यह बाजार में आ पायी है । अभी सबसे पहले तो इस नाम पर ही मुझे आपत्ति हो रही है , क्‍योंकि उस वक्‍त मेरे दिमाग में यही अंग्रेजी शब्‍द आया था , जो आज अपने साफ्टवेयर के लिए अनुकूल नहीं लग रहा है। वैसे इस साफ्टवेयर के लिए ‘प्रीडेस्‍टीनेशन’ शब्‍द के बदले इसके हिन्‍दी शब्‍द ‘प्रारब्‍ध’ या अन्‍य किसी शब्‍द का उपयोग किया जा सकता है , पर फिर भी आप सभी हिन्‍दी प्रेमियों से अनुरोध है कि इस साफ्टवेयर के लिए कोई उपयुक्‍त हिन्‍दी नाम सुझाएं।


इसे विकसित करने में गणित के सारे फामूर्लों के साथ ही साथ अन्‍य तरह के ग्राफ के फार्मूलों को डालने में मुझे अधिक मुश्किल नहीं हुई , पर हिन्‍दी में भविष्‍यवाणी के प्रोग्रामिंग करने की बारी आयी , तो मुझे काफी दिक्‍कतों का सामना करना पडा। उस समय कंप्‍यूटर पर हिन्‍दी में काम करनेवाले ही सिर्फ मेरी समस्‍या को समझ सकते हैं। उस समय मैं कृतिदेव में हिन्‍दी लिखा करती थी , जिसे उस प्‍लेटफार्म पर लिखना संभव नहीं था। इसलिए मै माइक्रोसोफ्ट वर्ड पर हिन्‍दी लिखा करती और उसमें उद्धरण चिन्‍ह देकर उसे अपने साफ्टवेयर के कोड में डाल दिया करती थी। फिर भी ‘श्‍‘ और ‘ष्‍‘ जैसे कई अन्‍य शब्‍दों को लिखना कठिन होता था , क्‍योकि ‘ और “ शब्‍द उसके कोड में प्रयुक्‍त होते थे । ‘श्‍‘ और ‘ष्‍‘ जैसे शब्‍दों को मैने टेक्‍स्‍ट बाक्‍स में डालकर और उनका मूल्‍य लेकर अन्‍य जगहों पर प्रयुक्‍त कर दिया था और इस तरह इस समस्‍या का समाधान भी मुझे उस वक्‍त मिल गया था।


जैसा कि गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष की मान्‍यता है , यदि गणित सही हो तो समय के परिवर्तन के बाद भी ज्‍योतिष के गणित के क्षेत्र में तो कोई परिवर्तन करना आवश्‍यक नहीं होता , पर चूंकि भविष्‍यवाणियां सांकेतिक होती हैं , फलित के क्षेत्र में नए नए अनुभव जुडने से बाद कभी भी इस साफ्टवेयर की भविष्‍यवाणियों में किसी प्रकार के भी परिवर्तन करने की जरूरत पड सकती है , इस कारण मुझे अक्‍सर दिक्‍कतों का सामना करना पडता है। सारे शब्‍दों को कापी करके उसे माइक्रोसाफ्ट वर्ड में पेस्‍ट कर फिर उसमें सुधार कर विज्‍युअल बेसिक के कोड में जाकर पेस्‍ट करना पडता है। यह समस्‍या मेरे साथ हमेशा ही बनी रहेगी , क्‍योंकि ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिषीय अनुसंधान केन्‍द्र’ के अनुभवों को समय समय पर साफ्टवेयर में जोडना आवश्‍यक होगा।


मेरे ख्‍याल से यूनिकोड के विकास के साथ इस समस्‍या का हल निकल जाना चाहिए था। हालांकि इससे मेरा काम तो बहुत बढेगा , क्‍योंकि सारे शब्‍दों को फिर से यूनिकोड में टाइप करना पडेगा , पर अपने साफ्टवेयर के कोड में अंग्रेजी में लिखे उलूल जुलूल शब्‍दों में एक अंधे की तरह हिन्‍दी ढूंढने की समस्‍या से तो अवश्‍य ही छुटकारा मिल जाएगा। पर अभी तक मैं इंतजार ही कर रही हूं , कल भी मैने कोशिश करके देखा , उसमें यूनिकोड लिखने पर प्रश्‍नवाचक चिन्‍ह आ जाते हैं। मैं कम्‍प्‍यूटर के विशेषज्ञों से यह जानकारी चाहती हूं कि विज्‍युअल बेसिक के कोड में अभी तक यूनिकोड लिखने की सुविधा हुई है या नहीं ? यदि हुई है तो इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए क्‍या इसके नए संस्‍करण को इंस्‍टाल करना पडेगा ? या फिर उसके लिए सेटिंग में किसी बदलाव की आवश्‍यकता होगी ? यदि विज्‍युअल बेसिक के कोड में अभी तक यूनिकोड लिखने की सुविधा नहीं हुई है तो इसके लिए अभी मुझे कितने दिनों तक इंतजार करना पड सकता है ? मैं अपने पूरे साफ्टवेयर के हिन्‍दी की भविष्‍यवाणियों को यूनिकोड में बदलना चाहती हूं , ताकि यह साफ्टवेयर सिर्फ मेरे लिए ही नहीं , सभी उपयोगकर्ता के लिए सुविधाजनक बन सके।

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