सकारात्मक का मतलब क्या होता है, सकारात्मक और नकारात्मक सोच क्या है, सकारात्मक सोच कैसे बनाये, सकारात्मक सोच के फायदे क्या हैं, सकारात्मक सोच के उपाय क्या कर सकते हैं, खुद को, दिमाग को पॉजिटिव कैसे रखें - कुल मिलाकर इस ब्लॉग में पॉजिटिव थिंकिंग टिप्स यानि सकारात्मक सोच पर निबंध और सकारात्मक दृष्टिकोण मिलेगा आपको !
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Thursday, 8 March 2012
Monday, 14 September 2009
आज हिन्दी दिवस के मौके पर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से मेरा प्रश्न
जब मेरा बडा पुत्र आठवीं पास करने के बाद नवीं कक्षा में गया , उसने हमारे सामने हिन्दी छोडकर संस्कृत पढने की अपनी इच्छा जाहिर की। हमारे कारण पूछने पर उसने बताया कि बोर्ड की परीक्षा में हिन्दी में उतने नंबर नहीं आ सकते , जितने कि संस्कृत में आएंगे। जहां सभी बच्चे संस्कृत के कारण परीक्षाफल में अधिक प्रतिशत ला रहे हों और सभी विद्यालयों में ग्यारहवी में प्रवेश के लिए बोर्ड के नंबर ही देखे जाते हों , इसलिए उसकी बात को न मानना उसकी पढाई के साथ खिलवाड करना होता। हमलोगों ने उसे हिन्दी छोडकर संस्कृत पढने की सलाह दी । दसवीं के बोर्ड में अन्य विषयों के साथ उसे अंग्रेजी और संस्कृत पढनी पडी। पुन: छोटे बेटे के लिए हमें हिन्दी को छोडने का ही निर्णय लेना पडा।
ऐसा इसलिए नहीं कि हिन्दी रोचक विषय नहीं है , वरन् इसलिए कि हिन्दी में नंबर नहीं लाए जा सकते । अब भाषा तो भाषा होती है , हिन्दी हो या अंग्रेजी , गुजराती हो या बंगाली। सबमें कोर्स तो एक जैसे होने चाहिए , नंबर एक जैसे आने चाहिए। इस बात की ओर मेरा ध्यान काफी दिनों से था कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को हिन्दी के पाठ्यक्रम में सुधार लाना चाहिए , जब बोर्ड की परीक्षाओं में संस्कृत में 100 में 100 लाया जा सकता है , अंग्रेजी में 100 में 100 लाया जा सकता है , तो फिर हिन्दी में 100 में 100 क्यूं नहीं लाया जा सकता ? लाया जा सकता है तो फिर अंग्रेजी या संस्कृत की तुलना में हिन्दी का परिणाम खराब क्यूं होता है ? पर जब यह आलेख लिख रही हूं ,दसवीं बोर्ड की परीक्षाएं ही समाप्त कर दी गयी हैं , इसलिए इस बात का अब कोई औचित्य नहीं।
वैसे अंग्रेजी से मेरी कोई दुश्मनी नहीं , वर्तमान समय के वैश्वीकरण को देखते हुए यह अवश्य कहा जा सकता है कि अंग्रेजी की पढाई करना या करवाना कोई अपराध नहीं , अंग्रेजी की जानकारी से हमारे सामने ज्ञान का भंडार खुला होता है , हर क्षेत्र में कैरियर में आगे बढने में सुविधा होती है । मैं मानती हूं कि हर व्यक्ति को समय के अनुसार ही काम करना चाहिए , सिर्फ आदर्शो पर चलकर अपना नुकसान करने से कोई फायदा नहीं । पर जब हम खुद इतने मजबूत हो चुके हों कि दूसरी भाषा पर आश्रिति समाप्त हो जाए तो हमें अपनी भाषा की उन्नति के लिए काम करना ही चाहिए , सिर्फ हिन्दी दिवस मना लेने से कुछ भी नहीं होनेवाला।
पर इस दिशा में आनेवाली पीढी को सही ढंग से तैयार न कर पाने में मुझे केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई)का भी कम दोष दिखाई नहीं देता। हिन्दुस्तान की अपनी भाषा हिन्दी को भी 12वीं कक्षा तक अनिवार्य विषय के रूप में न पढाया जाना मुझे तो सही नहीं लगता है। आज के सभी बच्चे 12वीं कक्षा तक विज्ञान , कला या कामर्स विषय के साथ अंग्रेजी की पढाई तो करते हैं , पर यदि अधिक रूचि न हो तो अपनी मातृभाषा को वह सिर्फ आठवीं तक या अधिकतम दसवीं तक ही पढ पाते हैं । आज हिन्दी दिवस के मौके पर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से मेरा प्रश्न यही है कि क्या हिन्दी उनकी उपेक्षा का शिकार नहीं हो रही ? क्या हिन्दीभाषी प्रदेशों के बच्चों को 12वीं तक हिन्दी के एक अनिवार्य पेपर नहीं होने चाहिए ? क्या अन्य भाषाओं के विद्यार्थियों को भी अपनी मातृभाषा के अलावे हिन्दी नहीं पढाया जाना चाहिए ?
ऐसा इसलिए नहीं कि हिन्दी रोचक विषय नहीं है , वरन् इसलिए कि हिन्दी में नंबर नहीं लाए जा सकते । अब भाषा तो भाषा होती है , हिन्दी हो या अंग्रेजी , गुजराती हो या बंगाली। सबमें कोर्स तो एक जैसे होने चाहिए , नंबर एक जैसे आने चाहिए। इस बात की ओर मेरा ध्यान काफी दिनों से था कि केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को हिन्दी के पाठ्यक्रम में सुधार लाना चाहिए , जब बोर्ड की परीक्षाओं में संस्कृत में 100 में 100 लाया जा सकता है , अंग्रेजी में 100 में 100 लाया जा सकता है , तो फिर हिन्दी में 100 में 100 क्यूं नहीं लाया जा सकता ? लाया जा सकता है तो फिर अंग्रेजी या संस्कृत की तुलना में हिन्दी का परिणाम खराब क्यूं होता है ? पर जब यह आलेख लिख रही हूं ,दसवीं बोर्ड की परीक्षाएं ही समाप्त कर दी गयी हैं , इसलिए इस बात का अब कोई औचित्य नहीं।
वैसे अंग्रेजी से मेरी कोई दुश्मनी नहीं , वर्तमान समय के वैश्वीकरण को देखते हुए यह अवश्य कहा जा सकता है कि अंग्रेजी की पढाई करना या करवाना कोई अपराध नहीं , अंग्रेजी की जानकारी से हमारे सामने ज्ञान का भंडार खुला होता है , हर क्षेत्र में कैरियर में आगे बढने में सुविधा होती है । मैं मानती हूं कि हर व्यक्ति को समय के अनुसार ही काम करना चाहिए , सिर्फ आदर्शो पर चलकर अपना नुकसान करने से कोई फायदा नहीं । पर जब हम खुद इतने मजबूत हो चुके हों कि दूसरी भाषा पर आश्रिति समाप्त हो जाए तो हमें अपनी भाषा की उन्नति के लिए काम करना ही चाहिए , सिर्फ हिन्दी दिवस मना लेने से कुछ भी नहीं होनेवाला।
पर इस दिशा में आनेवाली पीढी को सही ढंग से तैयार न कर पाने में मुझे केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई)का भी कम दोष दिखाई नहीं देता। हिन्दुस्तान की अपनी भाषा हिन्दी को भी 12वीं कक्षा तक अनिवार्य विषय के रूप में न पढाया जाना मुझे तो सही नहीं लगता है। आज के सभी बच्चे 12वीं कक्षा तक विज्ञान , कला या कामर्स विषय के साथ अंग्रेजी की पढाई तो करते हैं , पर यदि अधिक रूचि न हो तो अपनी मातृभाषा को वह सिर्फ आठवीं तक या अधिकतम दसवीं तक ही पढ पाते हैं । आज हिन्दी दिवस के मौके पर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से मेरा प्रश्न यही है कि क्या हिन्दी उनकी उपेक्षा का शिकार नहीं हो रही ? क्या हिन्दीभाषी प्रदेशों के बच्चों को 12वीं तक हिन्दी के एक अनिवार्य पेपर नहीं होने चाहिए ? क्या अन्य भाषाओं के विद्यार्थियों को भी अपनी मातृभाषा के अलावे हिन्दी नहीं पढाया जाना चाहिए ?
Tuesday, 14 April 2009
कैमरे भी मेरे साथ सौतेला व्यवहार करते हैं
आज चंद्रशेखर हाडा जी ने अपने ब्लागमें मेरी कैरीकेचर बनायी। अजय कु झा जी ने बिल्कुल सही कहा , उनकी तूलिका का जवाब नहीं , बहुत अच्छी फोटो उतार लेते हें वे। अन्य लोगों को भी यह अच्छी लगी , बहुत बहुत धन्यवाद उनका । पर घूमते घामते श्यामल सुमन जी भी वहां पहुंचे , कैरीकेचर तो उन्हे अच्छी लगी ,पर वे शायद चेहरे पर वो भाव ढूंढ रहे थे , जो रांची ब्लागर मीट में उन्होने मेरे चेहरे पर देखा था। इसलिए थोडी निराशा तो स्वाभाविक ही थी। पर हाडा जी की क्या गलती ? उन्हें मेरे प्रोफाइल में जो फोटो मिली , उसी के भाव को तो वे उतार सकेंगे। अपने प्रोफाइल में ऐसी फोटो लगाने का इल्जाम आप मुझपर भी न लगाए तो अच्छा रहेगा , क्योंकि मैं तो हमेशा से परेशान हूं , कैमरे के इस सौतेले व्यवहार से।
जब मैट्रिक या इंटर के फार्म भरने के लिए पहली बार पासपोर्ट साइज का फोटो लेकर घर लौटी तो भाई ने उसे देखते ही मेरा मजाक बना दिया ‘ये तुम्हारी फोटो है या स्नेहलता दीदी की’ स्नेहलता दीदी हमारी टीचर थी , जिनका चेहरा काफी चौडा और भारी था। मेरा स्नेहलता दीदी जैसा फोटो निकालने का सारा इल्जाम गांव के स्टूडियो , उसके कैमरे और फोटोग्राफर पर ही लगा , मैं तो बच गयी। लेकिन बीए और एमए के समय शहर के स्टूडियो के द्वारा भी मेरा फोटो अच्छा नहीं आ सका तो इल्जाम मेरे खुद के चेहरे पर लगना ही था, यह बिल्कुल भी फोटोजनिक नहीं। जब रिश्ते के लिए फोटो भेजने की बारी आयी तो घरवाले परेशान, एक तो बेटी खूबसूरत नहीं , उपर से जितनी हो , उतना भी फोटो मे दिखाई न पडे , उनका परेशान होना स्वाभाविक था। रामगढ , रांची , हजारीबाग और धनबाद हर जगह के स्टूडियो में फोटो खिंचवायी गयी , पर कोई फायदा नहीं , कोई भी फोटो रिश्ते के लिए भेजने लायक नहीं था। तब घरवाले बिना फोटो के ही रिश्ते के लिए गए और सीधा मुझे देख लेने का ही निमंत्रण दे डाला। खैर, बिना फोटो के ही किसी तरह शादी हो गयी। इसलिए मेरे यहां कभी आए तो शादी का एलबम दिखाने की जिद न करें तो अच्छा रहेगा। वैसे फोटो अच्छी न आने का एक फायदा यह है कि बाजार में कितने भी अच्छे कैमरे क्यों न मिल रहे हों , लेने को जी नहीं ललचता और पैसे बच जाते हैं।
इसलिए अपने ब्लागर प्रोफाइल में फोटो डालने में भी मैं डेढ वर्षों से आनाकानी ही कर रही थी , पर बच्चों के जिद पर मैने डाल दिया। पर शायद मेरी फोटो मुझसे काफी अलग थी , तभी तो रांची ब्लाग मीट में मुझे देखकर सब चौंके । और किसी ने तो पहले कुछ नहीं कहा , पर शैलेश भारतवासी जी अपने को बिल्कुल नहीं रोक पाए। उन्होने तुरंत सवाल दाग ही दिया ‘आपने अपनी प्रोफाइल में वैसी फोटो क्यों लगा रखी है’ , अब मैं उन्हें क्या समझाती कि अभी तक के सारे कैमरे मेरे साथ सौतेला व्यवहार ही कर रहे हैं , मेरी चुप्पी पर उन्होने तो यही समझा होगा कि जानबूझकर लोगों द्वारा परेशान न किए जाने के भय से इन्होने अपनी उम्र से बडी लगनेवाली फोटो लगा रखी है। बाद में धीरे धीरे पारूल जी या अन्य लोगों ने भी बताया कि मेरी फोटो मुझसे बिल्कुल अलग है। फिर मेरी एक मित्र ने प्रोफाइल से मेरी फोटो हटवा ही दी थी , पर उस दिन रचना जी के कहने पर मैने पुन: उसे डाल दिया। एक मित्र का कहना है कि मैं जब तक ब्लागवाणी से अपनी फोटो न हटा लूं , वह मेरा ब्लाग नहीं पढेगी। पर मैने न तो ब्लागवाणी में अपनी फोटो डाली है और न हटाने के बारे में जानकारी है । अब वह मेरी पोस्ट न भी पढे तो मैं क्या कर सकती हूं। मुझे तो अभी भी सिर्फ इंतजार है , शायद भविष्य में कोई कैमरा आए , जो मेरे चेहरे की चमक और आत्मविश्वास को दिखाते हुए मेरी फोटो ले सके ।
जब मैट्रिक या इंटर के फार्म भरने के लिए पहली बार पासपोर्ट साइज का फोटो लेकर घर लौटी तो भाई ने उसे देखते ही मेरा मजाक बना दिया ‘ये तुम्हारी फोटो है या स्नेहलता दीदी की’ स्नेहलता दीदी हमारी टीचर थी , जिनका चेहरा काफी चौडा और भारी था। मेरा स्नेहलता दीदी जैसा फोटो निकालने का सारा इल्जाम गांव के स्टूडियो , उसके कैमरे और फोटोग्राफर पर ही लगा , मैं तो बच गयी। लेकिन बीए और एमए के समय शहर के स्टूडियो के द्वारा भी मेरा फोटो अच्छा नहीं आ सका तो इल्जाम मेरे खुद के चेहरे पर लगना ही था, यह बिल्कुल भी फोटोजनिक नहीं। जब रिश्ते के लिए फोटो भेजने की बारी आयी तो घरवाले परेशान, एक तो बेटी खूबसूरत नहीं , उपर से जितनी हो , उतना भी फोटो मे दिखाई न पडे , उनका परेशान होना स्वाभाविक था। रामगढ , रांची , हजारीबाग और धनबाद हर जगह के स्टूडियो में फोटो खिंचवायी गयी , पर कोई फायदा नहीं , कोई भी फोटो रिश्ते के लिए भेजने लायक नहीं था। तब घरवाले बिना फोटो के ही रिश्ते के लिए गए और सीधा मुझे देख लेने का ही निमंत्रण दे डाला। खैर, बिना फोटो के ही किसी तरह शादी हो गयी। इसलिए मेरे यहां कभी आए तो शादी का एलबम दिखाने की जिद न करें तो अच्छा रहेगा। वैसे फोटो अच्छी न आने का एक फायदा यह है कि बाजार में कितने भी अच्छे कैमरे क्यों न मिल रहे हों , लेने को जी नहीं ललचता और पैसे बच जाते हैं।
इसलिए अपने ब्लागर प्रोफाइल में फोटो डालने में भी मैं डेढ वर्षों से आनाकानी ही कर रही थी , पर बच्चों के जिद पर मैने डाल दिया। पर शायद मेरी फोटो मुझसे काफी अलग थी , तभी तो रांची ब्लाग मीट में मुझे देखकर सब चौंके । और किसी ने तो पहले कुछ नहीं कहा , पर शैलेश भारतवासी जी अपने को बिल्कुल नहीं रोक पाए। उन्होने तुरंत सवाल दाग ही दिया ‘आपने अपनी प्रोफाइल में वैसी फोटो क्यों लगा रखी है’ , अब मैं उन्हें क्या समझाती कि अभी तक के सारे कैमरे मेरे साथ सौतेला व्यवहार ही कर रहे हैं , मेरी चुप्पी पर उन्होने तो यही समझा होगा कि जानबूझकर लोगों द्वारा परेशान न किए जाने के भय से इन्होने अपनी उम्र से बडी लगनेवाली फोटो लगा रखी है। बाद में धीरे धीरे पारूल जी या अन्य लोगों ने भी बताया कि मेरी फोटो मुझसे बिल्कुल अलग है। फिर मेरी एक मित्र ने प्रोफाइल से मेरी फोटो हटवा ही दी थी , पर उस दिन रचना जी के कहने पर मैने पुन: उसे डाल दिया। एक मित्र का कहना है कि मैं जब तक ब्लागवाणी से अपनी फोटो न हटा लूं , वह मेरा ब्लाग नहीं पढेगी। पर मैने न तो ब्लागवाणी में अपनी फोटो डाली है और न हटाने के बारे में जानकारी है । अब वह मेरी पोस्ट न भी पढे तो मैं क्या कर सकती हूं। मुझे तो अभी भी सिर्फ इंतजार है , शायद भविष्य में कोई कैमरा आए , जो मेरे चेहरे की चमक और आत्मविश्वास को दिखाते हुए मेरी फोटो ले सके ।
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Friday, 13 March 2009
कम्प्यूटर के विशेषज्ञ और हिन्दी प्रेमी ... क्या एक जानकारी देगे मुझे ?
कंप्यूटर के विज्युअल बेसिक के प्रोग्रामिंग प्लेटफार्म पर 2002-2003 में मैने ‘गत्यात्मक ज्योतिष’ के जन्मदाता श्री विद्यासागर महथा जी के 40 वर्षो के सतत् अध्ययन और मौलिक चिंतन द्वारा विकसित किए गए खुद के सिद्धांतों पर आधारित ‘प्रीडेस्टीनेशन’ नामक एक साफ्टवेयर विकसित किया था। नवीनतम सिद्धांतो और कई प्रकार के ग्राफों के फार्मूलों से युक्त यह साफ्टवेयर अभी तक सिर्फ हमारे ही कम्प्यूटर की शोभा बढा रही है , न तो इसे पेटेण्ट करवाया जा सका है और न ही यह बाजार में आ पायी है । अभी सबसे पहले तो इस नाम पर ही मुझे आपत्ति हो रही है , क्योंकि उस वक्त मेरे दिमाग में यही अंग्रेजी शब्द आया था , जो आज अपने साफ्टवेयर के लिए अनुकूल नहीं लग रहा है। वैसे इस साफ्टवेयर के लिए ‘प्रीडेस्टीनेशन’ शब्द के बदले इसके हिन्दी शब्द ‘प्रारब्ध’ या अन्य किसी शब्द का उपयोग किया जा सकता है , पर फिर भी आप सभी हिन्दी प्रेमियों से अनुरोध है कि इस साफ्टवेयर के लिए कोई उपयुक्त हिन्दी नाम सुझाएं।
इसे विकसित करने में गणित के सारे फामूर्लों के साथ ही साथ अन्य तरह के ग्राफ के फार्मूलों को डालने में मुझे अधिक मुश्किल नहीं हुई , पर हिन्दी में भविष्यवाणी के प्रोग्रामिंग करने की बारी आयी , तो मुझे काफी दिक्कतों का सामना करना पडा। उस समय कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करनेवाले ही सिर्फ मेरी समस्या को समझ सकते हैं। उस समय मैं कृतिदेव में हिन्दी लिखा करती थी , जिसे उस प्लेटफार्म पर लिखना संभव नहीं था। इसलिए मै माइक्रोसोफ्ट वर्ड पर हिन्दी लिखा करती और उसमें उद्धरण चिन्ह देकर उसे अपने साफ्टवेयर के कोड में डाल दिया करती थी। फिर भी ‘श्‘ और ‘ष्‘ जैसे कई अन्य शब्दों को लिखना कठिन होता था , क्योकि ‘ और “ शब्द उसके कोड में प्रयुक्त होते थे । ‘श्‘ और ‘ष्‘ जैसे शब्दों को मैने टेक्स्ट बाक्स में डालकर और उनका मूल्य लेकर अन्य जगहों पर प्रयुक्त कर दिया था और इस तरह इस समस्या का समाधान भी मुझे उस वक्त मिल गया था।
जैसा कि गत्यात्मक ज्योतिष की मान्यता है , यदि गणित सही हो तो समय के परिवर्तन के बाद भी ज्योतिष के गणित के क्षेत्र में तो कोई परिवर्तन करना आवश्यक नहीं होता , पर चूंकि भविष्यवाणियां सांकेतिक होती हैं , फलित के क्षेत्र में नए नए अनुभव जुडने से बाद कभी भी इस साफ्टवेयर की भविष्यवाणियों में किसी प्रकार के भी परिवर्तन करने की जरूरत पड सकती है , इस कारण मुझे अक्सर दिक्कतों का सामना करना पडता है। सारे शब्दों को कापी करके उसे माइक्रोसाफ्ट वर्ड में पेस्ट कर फिर उसमें सुधार कर विज्युअल बेसिक के कोड में जाकर पेस्ट करना पडता है। यह समस्या मेरे साथ हमेशा ही बनी रहेगी , क्योंकि ‘गत्यात्मक ज्योतिषीय अनुसंधान केन्द्र’ के अनुभवों को समय समय पर साफ्टवेयर में जोडना आवश्यक होगा।
मेरे ख्याल से यूनिकोड के विकास के साथ इस समस्या का हल निकल जाना चाहिए था। हालांकि इससे मेरा काम तो बहुत बढेगा , क्योंकि सारे शब्दों को फिर से यूनिकोड में टाइप करना पडेगा , पर अपने साफ्टवेयर के कोड में अंग्रेजी में लिखे उलूल जुलूल शब्दों में एक अंधे की तरह हिन्दी ढूंढने की समस्या से तो अवश्य ही छुटकारा मिल जाएगा। पर अभी तक मैं इंतजार ही कर रही हूं , कल भी मैने कोशिश करके देखा , उसमें यूनिकोड लिखने पर प्रश्नवाचक चिन्ह आ जाते हैं। मैं कम्प्यूटर के विशेषज्ञों से यह जानकारी चाहती हूं कि विज्युअल बेसिक के कोड में अभी तक यूनिकोड लिखने की सुविधा हुई है या नहीं ? यदि हुई है तो इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए क्या इसके नए संस्करण को इंस्टाल करना पडेगा ? या फिर उसके लिए सेटिंग में किसी बदलाव की आवश्यकता होगी ? यदि विज्युअल बेसिक के कोड में अभी तक यूनिकोड लिखने की सुविधा नहीं हुई है तो इसके लिए अभी मुझे कितने दिनों तक इंतजार करना पड सकता है ? मैं अपने पूरे साफ्टवेयर के हिन्दी की भविष्यवाणियों को यूनिकोड में बदलना चाहती हूं , ताकि यह साफ्टवेयर सिर्फ मेरे लिए ही नहीं , सभी उपयोगकर्ता के लिए सुविधाजनक बन सके।
इसे विकसित करने में गणित के सारे फामूर्लों के साथ ही साथ अन्य तरह के ग्राफ के फार्मूलों को डालने में मुझे अधिक मुश्किल नहीं हुई , पर हिन्दी में भविष्यवाणी के प्रोग्रामिंग करने की बारी आयी , तो मुझे काफी दिक्कतों का सामना करना पडा। उस समय कंप्यूटर पर हिन्दी में काम करनेवाले ही सिर्फ मेरी समस्या को समझ सकते हैं। उस समय मैं कृतिदेव में हिन्दी लिखा करती थी , जिसे उस प्लेटफार्म पर लिखना संभव नहीं था। इसलिए मै माइक्रोसोफ्ट वर्ड पर हिन्दी लिखा करती और उसमें उद्धरण चिन्ह देकर उसे अपने साफ्टवेयर के कोड में डाल दिया करती थी। फिर भी ‘श्‘ और ‘ष्‘ जैसे कई अन्य शब्दों को लिखना कठिन होता था , क्योकि ‘ और “ शब्द उसके कोड में प्रयुक्त होते थे । ‘श्‘ और ‘ष्‘ जैसे शब्दों को मैने टेक्स्ट बाक्स में डालकर और उनका मूल्य लेकर अन्य जगहों पर प्रयुक्त कर दिया था और इस तरह इस समस्या का समाधान भी मुझे उस वक्त मिल गया था।
जैसा कि गत्यात्मक ज्योतिष की मान्यता है , यदि गणित सही हो तो समय के परिवर्तन के बाद भी ज्योतिष के गणित के क्षेत्र में तो कोई परिवर्तन करना आवश्यक नहीं होता , पर चूंकि भविष्यवाणियां सांकेतिक होती हैं , फलित के क्षेत्र में नए नए अनुभव जुडने से बाद कभी भी इस साफ्टवेयर की भविष्यवाणियों में किसी प्रकार के भी परिवर्तन करने की जरूरत पड सकती है , इस कारण मुझे अक्सर दिक्कतों का सामना करना पडता है। सारे शब्दों को कापी करके उसे माइक्रोसाफ्ट वर्ड में पेस्ट कर फिर उसमें सुधार कर विज्युअल बेसिक के कोड में जाकर पेस्ट करना पडता है। यह समस्या मेरे साथ हमेशा ही बनी रहेगी , क्योंकि ‘गत्यात्मक ज्योतिषीय अनुसंधान केन्द्र’ के अनुभवों को समय समय पर साफ्टवेयर में जोडना आवश्यक होगा।
मेरे ख्याल से यूनिकोड के विकास के साथ इस समस्या का हल निकल जाना चाहिए था। हालांकि इससे मेरा काम तो बहुत बढेगा , क्योंकि सारे शब्दों को फिर से यूनिकोड में टाइप करना पडेगा , पर अपने साफ्टवेयर के कोड में अंग्रेजी में लिखे उलूल जुलूल शब्दों में एक अंधे की तरह हिन्दी ढूंढने की समस्या से तो अवश्य ही छुटकारा मिल जाएगा। पर अभी तक मैं इंतजार ही कर रही हूं , कल भी मैने कोशिश करके देखा , उसमें यूनिकोड लिखने पर प्रश्नवाचक चिन्ह आ जाते हैं। मैं कम्प्यूटर के विशेषज्ञों से यह जानकारी चाहती हूं कि विज्युअल बेसिक के कोड में अभी तक यूनिकोड लिखने की सुविधा हुई है या नहीं ? यदि हुई है तो इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए क्या इसके नए संस्करण को इंस्टाल करना पडेगा ? या फिर उसके लिए सेटिंग में किसी बदलाव की आवश्यकता होगी ? यदि विज्युअल बेसिक के कोड में अभी तक यूनिकोड लिखने की सुविधा नहीं हुई है तो इसके लिए अभी मुझे कितने दिनों तक इंतजार करना पड सकता है ? मैं अपने पूरे साफ्टवेयर के हिन्दी की भविष्यवाणियों को यूनिकोड में बदलना चाहती हूं , ताकि यह साफ्टवेयर सिर्फ मेरे लिए ही नहीं , सभी उपयोगकर्ता के लिए सुविधाजनक बन सके।
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