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Wednesday, 6 May 2020

मिथ्या भ्रम

Andhvishwas story in hindi

मिथ्या भ्रम 


मुझे परंपरागत मान्‍यताएं बहुत पसंद है , क्‍यूंकि उससे सामान्‍य तौर पर कुछ नुकसान नहीं दिखाई पडता तथा ध्‍यान देने पर उसमें अनेक अच्‍छी बातें छुपी महसूस होती हैं। पर कभी कभी समाज में प्रचलित कुछ ऐसे अंधविश्‍वासों को भी शामिल देखती हूं , जिससे किसी का नुकसान हो रहा हो , तो वह मुझे बुरा लगता है। इसी सोंच में मैने एक कहानी ‘मिथ्‍याभ्रम’ लिखी थी  , यह एक सत्‍य घटना पर आधारित है , जो आपको पढवा रही हूं। इसके अलावे मेरी दो कहानियां ‘एक झूठ’और ‘पहला विरोध’साहित्‍य शिल्‍पी में पहले प्रकाशित हो चुकी हैं , जिसे कभी समय निकालकर अवश्‍य पढें। तो लीजिए ‘मिथ्‍याभ्रम’ को पढना शुरू कीजिए ......

‘क्‍या हुआ, ट्रेन क्‍यूं रूक गयी ?’ रानी ने उनींदी आंखों को खोलते हुए पूछा। ’अरे, तुम सो गयी क्‍या ? देखती नहीं , बोकारो आ गया।‘ बोकारो का नाम सुनते ही वह चौंककर उठी। तीन दिनों तक बैठे बैठे कमर में दर्द सा हो रहा था। कब से इंतजार कर रही थी वह , अपने गांव पहुंचने का , इंतजार करते करते तुरंत ही आंख लग गयी थी। अब मंजिल काफी नजदीक आ गयी थी। उसने अपने कपडे समेटे , मोनू को संभाला और सीट पर एक नजर डालती हुई ट्रेन से उतरने के लिए क्‍यू में खडी हो गयी।

andhvishwas story in hindi

दस वर्षों बाद वह मद्रास से वापस आ रही थी। गांव आने का कोई बहाना इतने दिनों तक नहीं मिल रहा था। गांव का मकान भी इतने दिनों से सूना पडा था। अपने अपने रोजगार के सिलसिले में सब बाहर ही जम गए थे। पर इस बार चाचाजी की जिद ने उन सबके लिए गांव का रास्‍ता खोल ही दिया था। वे अपने लडके की शादी गांव से ही करेंगे। सबके पीछे वह सामानों को लेकर ट्रेन से उतर पडी। एक टैक्‍सी ली और गांव के रास्‍ते पर बढ चली।

टैक्‍सी जितनी ही तेजी से अपने मंजिल की ओर जा रही थी , उतनी ही तेजी से वह अतीत की ओर। मद्रास के महानगरीय जीवन को जीती हुई वह अबतक जिस गांव को लगभग भूल ही चली थी , वह अचानक उसकी आंखों के सामने सजीव हो उठा था। घटनाएं चलचित्र के समान चलती जा रही थी। उछलते कूदते , उधम मचाते उनके कदम .. कभी बाग बगीचे में तो कभी खेल के मैदानों में। अपना लम्‍बा चौडा आंगन भी उन्‍हें धमाचौकडी में मदद ही कर देता था।


खेलने का कोई साधन नहीं , फिर भी खेल में इतनी विविधता। जो मन में आया , वही खेल लिया। खेल के लिए कार्यक्रम बनाने में उसकी बडी भूमिका रहती। वास्‍तविक जीवन में जो भी होते देखती , खेल के स्‍थान पर उतार लेती थी। घर के कुर्सी , बेंच , खाट और चौकी को गाडी बनाकर यात्रा का आनंद लेने का खेल बच्‍चों को खूब भाता था। कोई टिकट बेचता , कोई ड्राइवर बनता , तो कोई यात्री। रूट की तो कोई चिंता ही नहीं थी , उनकी मनमौजी गाडी कहीं से कहीं पहुंच सकती थी।

तब सरकार की ओर से परिवार नियोजन का कार्यक्रम जोरों पर था। भला उनके खेल में यह कैसे शामिल न होता। कुर्सी पर डाक्‍टर , बेंच पर उसके सहायक और खाट चौकी पर लेटे हुए मरीज । चाकू की जगह चम्‍मच , पेट काटा , आपरेशन किया , फटाफट घाव ठीक , एक के बाद एक मरीज का आपरेशन। भले ही अस्‍पताल के डाक्‍टर साहब का लक्ष्‍य पूरा न हुआ हो , पर उन्‍होने तो लक्ष्‍य से अधिक काम कर डाला था।

इसी तरह गांव में एक महायज्ञ का आयोजन हुआ। यज्ञ के कार्यक्रम को एक दिन ही देख लेना उनके लिए काफी था। अपने आंगन में यज्ञ का मंडप तैयार बीच में हवन कुंड और चारो ओर परिक्रमा के लिए जगह । मुहल्‍ले के सारे बच्‍चे हाथ जोडे हवनकुंड की परिक्रमा कर रहे थे और ‘श्रीराम , जयराम , जय जय राम , जय जय विघ्‍न हरण हनुमान’ के जयघोष से आंगन गूंज रहा था। कितना स्‍वस्‍थ माहौल था , बच्‍चे भी खुश रहते थे और अभिभावक भी।

लेकिन इसी क्रम में उसे एक बच्‍चे दीपू की याद अचानक आ गयी। जब सारे बच्‍चे खेल रहे होते , वह एक किनारे खडा उनका मुंह तक रहा होता। ‘दीपू , तुम भी आ जाओ’ उसे बुलाती , तो धीरे धीरे चलकर उनके खेल में शामिल होता। पर दीपू को शामिल करके खेलना शुरू करते ही तुरंत रानी को कुछ याद आ जाता और वह दौडकर घर के एक खास कमरे में जाती। उसका अनुमान बिल्‍कुल सही होता। दीपू की मम्‍मी उस कमरे में फरही बना रही होती। अपनी कला में पारंगत वह छोटे छोटे चावल को मिट्टी के बरतन में रखे गरम रेत में तल तलकर निकाल रही होती।

उसकी दिलचस्‍पी चावल के फरही में कम होती , इसलिए वह अंदर जाकर चने निकाल लाती। ’काकी, इन चनों को तल दो ना’ वह उनसे आग्रह करती। ’इतनी जल्‍दी तलने से ये कठोर हो जाएंगे और इन्‍हे खाने में तुम्‍हारे दांत टूट जाएंगे, थोडी देर सब्र करो।‘ वह चने में थोडे नमक , हल्‍दी और पानी डालकर उसे भीगने को रख देती। अब भला उसका खेल में मन लग सकता था। हर एक दो मिनट में अंदर आती और फिर निराश होकर बाहर आती , लेकिन कुछ ही देर में उसे सब्र का सोंधा नमकीन फल मिल जाता और चने के भुंजे को सारे बच्‍चे मिलकर खाते। इस तरह शायद ही कभी दीपू को उनके साथ खेलने का मौका मिल पाया हो।

टैक्‍सी अब उसके गांव के काफी करीब आ चुकी थी। रबी के फसल खेतों में लहलहा रहे थे। बहुत कुछ पहले जैसा ही दिखाई पड रहा था। शीघ्र ही गांव का ब्‍लाक , मिड्ल स्‍कूल , बस स्‍टैंड , गांव का बाजार , सब क्रम से आते और देखते ही देखते आंखो से ओझल भी होते जा रहे थे। थोडी ही देर में उसका मुहल्‍ला भी शुरू हो गया था। बडे पापा का मकान , रमेश की दुकान , हरिमंदिर , शिवमंदिर , सबको देखकर खुशी का ठिकाना न था।

पर एक स्‍थान पर अचानक तीनमंजिला इमारत को देखकर उसके तो होश उड गए। यह मकान पहले तो नहीं था। फिर उसे दीपू की याद आ गयी। इसी जगह तो दीपू का छोटा सा दो कमरों का खपरैल घर था , जिसके बाहरवाले छोटे से कमरे को ड्राइंग , डाइनिंग या किचन कुछ भी कहा जा सकता था तथा उसी प्रकार अंदरवाले को बेडरूम , ड्रेसिंग रूम या स्‍टोर। यहां पर इस मकान के बनने का अर्थ यही था कि दीपू के पापा ने अपनी जमीन किसी और को बेच दी , क्‍यूंकि इतनी जल्‍दी उनकी सामर्थ्‍य तीनमंजिला मकान बनाने की नहीं हो सकती थी।

घर पहुंचने से ठीक पहले उसका मन बहुत चिंतित हो गया था। पता नहीं वे लोग अब किस हालत में होंगे । दीपू के पापा तो बेरोजगार थे , उसकी मम्‍मी ही दिनभर भूखी , प्‍यासी , अपने भूख को तीन चार कप चाय पीकर शांत करती हुई लोगों के घरों में फरही बनाती अपने परिवार की गाडी को खींच रही थी। बृहस्‍पतिवार को वे भी बैठ जाती थी , क्‍यूंकि गांव में इस दिन चूल्‍हे पर मिट्टी के बरतन चढाना अशुभ माना जाता है। कहते हैं , ऐसा करने से लक्ष्‍मी घर से दूर हो जाती है , धन संपत्ति की हानि होती है।

 एक दिन बैठ जाना दीपू की मम्‍मी के लिए बडी हानि थी। कुछ दिनों तक उन्‍होने इसे झेला , पर बाद में एक रास्‍ता निकाल लिया। अब वे बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाती मिलती , जो उनके घर से सप्‍ताहभर की बिक्री के लिए काफी होता। ’काकी , तुम अपने घर में बृहस्‍पतिवार को मिट्टी के बर्तन क्‍यू चढाती हो ? ‘ वह अक्‍सर उनसे पूछती। उनके पास जबाब होता ‘ बेटे , मुझे घरवालों के पेट भरने की चिंता है , मेरे पास कौन सी धन संपत्ति है , जिसे बचाने के लिए मुझे नियम का पालन करना पडे’ तब उसका बाल मस्तिष्‍क उनकी इन बातों को समझने में असमर्थ था।

पर अभी उसका वयस्‍क वैज्ञानिक मस्तिष्‍क दुविधा में पड गया था। ’क्‍या जरूरत थी , दीपू के मम्‍मी को बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाने की , लक्ष्‍मी सदा के लिए रूठ गयी , जमीन भी बेचना पड गया , अपनी जमीन बेचने के बाद न जाने वे किस हाल में होंगी , दीपू भी न जाने कहां भटक रहा होगा’ सोंचसोंचकर उसका मन परेशान हो गया था। टैक्‍सी के रूकते ही वे लोग घर के अंदर गए , परसों ही शादी थी , लगभग सारे रिश्‍तेदार आ चुके थे , इसलिए काफी चहल पहल थी। मिलने जुलने और बातचीत के सिलसिले में तीन चार घंटे कैसे व्‍यतीत हो गए , पता भी न चला।

अब थोडी ही देर में रस्‍मों की शुरूआत होने वाली थी। चूंकि घर में रानी ही सबसे बडी लडकी थी , उसे ही गांव के सभी घरों में औरतों को रस्‍म में सम्मिलित होने के लिए न्‍योता दे आने की जबाबदेही मिली। वह दाई के साथ इस काम को करने के लिए निकली। सबों के घर तो जाने पहचाने थे , पर सारे लोगों में से कुछ आसानी से पहचान में आ रहे थे , तो कुछ को पहचानने के लिए उसके दिमाग को खासी मशक्‍कत करनी पड रही थी।

 एक मकान से दूसरे मकान में घूमती हुई वह आखिर उस मकान में पहुच ही गयी , जिसने चार छह घंटे से उसे भ्रम में डाल रखा था। इस मकान के बारे में उसने दाई से पूछा तो वह भाव विभोर होकर कहने लगी ‘अरे , दीपू जैसा होनहार बेटा भगवान सबको दे। उसने व्‍यापार में काफी तरक्‍की की और शोहरत भी कमाया । उसने ही यह मकान बनवाया है। इस बीच पिताजी तो चल बसे , पर अपनी मां का यह काफी ख्‍याल रखता है। अभी तीन चार महीने पूर्व इसका ब्‍याह हुआ है। पत्‍नी भी बहुत अच्‍छे घर से है‘ दाई उसकी प्रशंसा में अपनी धुन में कुछ कुछ बोले जा रही थी और वह आश्‍चर्यचकित उसकी बातों को सुन रही थी। हां , उसके वैज्ञानिक मस्तिष्‍क को चुनौती देनेवाला एक मिथ्‍याभ्रम टूटकर जरूर चकनाचूर हो चुका था।




Tuesday, 7 February 2012

सच्‍चा जीवनसाथी [कहानी] - संगीता पुरी

साहित्‍य शिल्‍पी में प्रकाशित मेरे द्वारा लिखी कुछ कहानियों में आपके लिए एक और कहानी .....शाम के 4 बज चुके हैं , दिन भर काम करने के कारण थकान से शरीर टूट रहा है , इसके बावजूद टेबल पर फाइलों का अंबार लगा है। पिछले एक सप्‍ताह से दो चार छह फाइले छोडकर समय पर घर चले जाने से समस्‍या बढती हुई इस हालात तक पहुंच गयी है। यदि एक एक घंटे बढाकर काम न किया जाए तो फाइलों का यह ढेर समाप्‍त न हो सकेगा। सोंचकर मैने चपरासी को एक कप चाय के लिए आवाज लगायी और फाइले उलटने लगा। अब इस उम्र में कार्य का इतना दबाब शरीर थोडे ही बर्दाश्‍त कर सकता है , वो भी जिंदगी खुशहाल हो तो कुछ हद तक चलाया भी जा सकता है , पर साथ में पारिवारिक तनाव हों तो शरीर के साथ मन भी जबाब दे जाता है। चाय की चुस्‍की के साथ काम समाप्‍त करने के लिए मन को मजबूत बनाया।

किंतु ये फोन की घंटी काम करने दे तब तो। ऑफिस के नंबर पर भैया का फोन ,मैं चौंक पडा। ‘मुझे मालूम था , तुम ऑफिस में ही होगे। हमलोग एक जरूरी काम से दिल्‍ली आए हैं , तुम्‍हारे घर के लिए टैक्‍सी कर चुके हैं। तुम भी जल्‍द घर पहुंचो’
’क्‍यूं भैया, अचानक, कोई खास बात हो गयी क्‍या ?’ मेरी उत्‍सुकता बढ गयी थी।
’हां खास ही समझो, जॉली, हैप्‍पी और मेघना आ रहे थे, हैप्‍पी के विवाह के लिए लडकी देखने। मुझे भी साथ ले लिया , अब होटल में रहने से तो अच्‍छा है , तुम्‍हारे यहां रहा जाए’ साधिकार उन्‍होने कहा।
‘जी , आपलोग जल्‍द घर पहुंचिए , मैं भी पहुंच रहा हूं।‘ ऑफिस के फाइलों को पुन: कल पर छोडकर मैं तेजी से घर की ओर चल पडा।

भैया आ रहे थे , मेरे नहीं मानसी के , पर मेरे अपने भैया से भी बढकर थे। जिंदगी के हर मोड पर उन्‍होने मुझे अच्‍छी सलाह दी थी। उम्र में काफी बडे होने के कारण वे हमें बेटे की तरह मानते थे। उनके साले के लडके जॉली का परिचय भी हमारे लिए नया नहीं था। भैया ने हमारी श्रेया के जीवनसाथी के रूप में जॉली की ही कल्‍पना की थी। जॉली को भी श्रेया बहुत पसंद थी। श्रेया का रंग सांवला था तो क्‍या हुआ चेहरे का आत्‍मविश्‍वास , आंखों की चमक और बहुआयामी व्‍यक्तित्‍व किसी को भी खुश कर सकता था। स्‍कूल कॉलेज के जीवन में मिले सैकडों प्रमाण पत्र और मेडल इसके साक्षी थे। एक चुम्‍बकीय व्‍यक्तित्‍व था उसमें , जो बरबस किसी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता था। श्रेया को भी जॉली पसंद था , पर एक पंडित के कहने पर हमने उसकी सगाई भी न होने दी थी। उक्‍त ज्‍योतिषी का कहना था कि जॉली की जन्‍मकुंडली में वैवाहिक सुख की कमी है , विवाह के एक वर्ष के अंदर ही उसकी पत्‍नी स्‍वर्ग सिधार जाएगी। इसी भय से हमने जॉली और श्रेया को एक दूसरे से अलग कर दिया था। मेघना से विवाह हुए जॉली के चार वर्ष व्‍यतीत हो गए। एक बेटा भी है उन्‍हें , सबकुछ सामान्‍य चल रहा है उनका , उक्‍त ज्‍योतिषी पर मुझे एक बार फिर से क्रोध आया।

इस रिश्‍ते को तोडने के बाद हमारे परिवार को खुशी कहां नसीब हुई। कहां कहां नहीं भटका मैं श्रेया के लिए लडके की खोज में , पर लडकेवालों की गोरी चमडी की भूख ने मुझे कहीं भी टिकने नहीं दिया। तीन चार वर्षों की असफलता ने मुझे तोडकर रख दिया था। रवि से विवाह करते वक्‍त मैने थोडा समझौता ही किया था , इससे इंकार नहीं किया जा सकता , पर आगे चलकर यह रिश्‍ता इतना कष्‍टकर हो जाएगा , इसकी भी मैने कल्‍पना नहीं की थी। रवि बहुत ही लालची लडका था, वो किसी का सच्‍चा जीवनसाथी नहीं बन सकता था। अपना उल्‍लू सीधा करने के लिए मेरे साथ अपना व्‍यवहार अच्‍छा रखता , पर आरंभ से ही श्रेया के साथ उसका व्‍यवहार अच्‍छा नहीं रहा। समाज के भय से मैने श्रेया को समझा बुझाकर ससुराल में रहने के लिए भेज तो दिया , पर वह वहां एक महीने भी टिक न सकी।

एक दिन सुबह सुबह घंटी बजने पर दरवाजा खोलते ही श्रेया ने घर में प्रवेश किया , काला पडा चेहरा , कृशकाय शरीर , आंखों के नीचे पडे गड्ढे , बिखरे बाल और रोनी सूरत उसकी हालत बयान् कर रहे थे। बेचारी ने ससुरालवालों का जितना अन्‍याय सही था , उसका एक प्रतिशत भी हमें नहीं बताया था। श्रेया मुझसे लिपटकर रोने लगी , तो मेरी आंखों में भी आंसू आ गए। न संतान के सुखों से बढकर कोई सुख है और न उनके कष्‍टों से बढकर कोई कष्‍ट। ‘अब मैं वहां वापस कभी नहीं जाऊंगी पापा’ वह फट पडी थी।
‘क्‍या हुआ बेटे’ सब जानते और समझते हुए भी मैं पूछ रहा था। मानसी भी अब बाहर के कमरे में आ चुकी थी।
‘पापा, वे लोग मुझे बहुत तंग करते हैं , बात बात में डांट फटकार , न तो चैन से जीने देते हैं और न मरने ही। सारा दिन काम में जुते रहो , सबकी चाकरी करो , फिर भी परेशान करते हैं , लोग तो नौकरों से भी इतना बुरा व्‍यवहार नहीं करते’ उसने रोते हुए कहा।

’मैं समझ रहा हूं बेटे , तुम्‍हारी कोई गल्‍ती नहीं हो सकती। तुम तो बहुत समझदार हो , इतने दिन निभाने की कोशिश की , लेकिन वे लोग तुम्‍हारे लायक नहीं। तुम पढी लिखी समझदार हो , अपने पैरों पर खडी हो सकती हो , दूसरे का अन्‍याय सहने की तुझे कोई जरूरत नहीं।‘ मैंने उसका साथ देते हुए कहा।
’उनलोगों ने सिर्फ लालच में यहां शादी की है, ताकि समय समय पर पूंजी के बहाने एक मोटी रकम आपसे वसूल कर सके। मुझसे नौकरी करवाकर मेरे तनख्‍वाह का भी मालिक बन सके , और घर में एक मुफ्त का नौकर भी। मेरे कुछ कहने पर कहते हैं कि तेरे पापा ने अपनी काली कलूटी बेटी हमारे मत्‍थे यूं ही मढ दी , कुछ दिया भी नहीं’
’छोडो बेटे , तुम फ्रेश हो जाओ , नई जिंदगी शुरू करो , पुरानी बीती बातों को भूलना ही अच्‍छा है। मैं अब फिर तुम्‍हें उस घर में वापस नहीं भेजूंगा’

कहने को तो कितनी आसानी से कह गया था, पर भूलना क्‍या इतना आसान है ? एक परित्‍यक्‍ता को अपनी जिंदगी ढोने में समाज में कितनी मुसीबतें होती हैं , इससे अनजान तो नहीं था मैं। इन दो वर्षों में ही श्रेया की चहकती हंसी न जाने कहां खो गयी है , चेहरे का सारा रस निचोड दिया गया लगता है , आंखों की चमक गायब है , सारा आत्‍मविश्‍वास समाप्‍त हो गया है , बात बात पर उसके आंखों से आंसू गिर पडते हैं , उसकी हालत इतनी खराब है कि कोई पुराने परिचित उसे पहचान तक नहीं पाते।

एक मिष्‍टान्‍न भंडार के पास मैने गाडी खडी कर दी , पता नहीं घर में व्‍यवस्‍था हो न हो। मिठाई , दही और पनीर लेकर पुन:गाडी को स्‍टार्ट किया। हमने जॉली के छोटे भाई हैप्‍पी से श्रेया के विवाह की इच्‍छा अवश्‍य प्रकट की थी , पर वहां उनलोगों ने ही इंकार कर दिया था। जॉली और हैप्‍पी दोनो का विवाह हमारे ही रिश्‍तेदारी में हुआ था , पर कुछ दिनों बाद एक दुर्घटना में हैप्‍पी ने अपनी पत्‍नी रश्मि को खो दिया था। छह माह के पुत्र को हैप्‍पी के पास निशानी के तौर पर छोडकर वह चल बसी थी। कुछ दिन तो हैप्‍पी दूसरी विवाह के लिए ना ना करता रहा , पर बच्‍चे के सही लालन पालन के लिए अब तैयार हो गया था।

घर पहुंचकर मानसी को खुशखबरी सुनाया , भैया आनेवाले थे , उसकी खुशी का ठिकाना न था। वह तुरंत उनके स्‍वागत सत्‍कार की तैयारी में लग गयी। थोडी ही देर में सारे मेहमान पहुंच गए , बातचीत में शाम कैसे कटी , पता भी न चला। श्रेया के बारे में भी उन्‍हें हर बात का पता चल चुका था। कल शाम को हैप्‍पी के लिए लडकी देखने जाना था। हैप्‍पी के साथ साथ लडकी से खास बातचीत की जिम्‍मेदारी मुझे ही दी गयी थी। दसरे दिन मैने ऑफिस से छुट्टी ले ली। शाम लडकी के घर जाने पर मालूम हुआ कि सामान्‍य हैसियत रखनेवाले लडकी के पिता हैप्‍पी और उसके परिवार के जीवन स्‍तर को देखते हुए अपनी लडकी का रिश्‍ता करने को तैयार थे। हैप्‍पी के वैवाहिक संदर्भों या एक बेटे होने की बात उसने लडकी से छुपा ली थी , पर हमलोग विवाह तय करने से पहले उससे सारी बाते खुलकर करना चाहते थे। जब हमने लडकी को इस बारे में जानकारी दी तो उसने उसका गलत अर्थ लगाया , उसने सोंचा कि मात्र बच्‍चे को संभालने के लिए उससे विवाह किया जा रहा है। वह इस तरह के किसी समझौते के लिए तैयार नहीं थी और हमें वहां से निराश ही वापस आना पडा।

लडकी वालों के यहां से आने में देर हो गयी थी। मानसी और श्रेया ने पूरा खाना तैयार रखा था , खाना खाकर हम सब ड्राइंग रूम में बैठ गए। गुमसुम और खोयी सी रहनेवाली श्रेया खाना खाने के बाद थके होने का बहाना कर अपने कमरे में चली गयी। । जॉली तो श्रेया की हालत देखकर बहुत परेशान था , एक ओर हैप्‍पी तो , दूसरी ओर श्रेया .. दोनो की समस्‍याएं हल करने में उसका दिमाग तेज चल रहा था। आज दोनो को ही एक सच्‍चे जीवनसाथी की जरूरत थी , दोनो साथ साथ चलकर एक दूसरे की जरूरत पूरा कर सकते थे, पर इस बात को मुंह से निकालने की उसकी हिम्‍मत नहीं हो रही थी। तभी गर्मी के दिन के इस व्‍यर्थ की यात्रा और तनाव से परेशान भैया ने कहा, ’इतनी गर्मी में बेवजह आने जाने की परेशानी , लडकी के पिता को ऐसा नहीं करना चाहिए था। उसे अपनी लडकी से बात करके ही हमें बुलाना चाहिए था।‘
‘उनकी भी क्‍या गलती ? उन्‍होने सोंचा होगा कि हैप्‍पी को देखकर लडकी मान ही जाएगी।‘ मेघना उन्‍हीं लोगों के पक्ष में थी।

’यहां आकर हमने कोई गल्‍ती नहीं की। हमारे सामने एक और अच्‍छा विकल्‍प उपस्थित हुआ है।‘ जॉली के मुंह से अनायास ही मन की बात निकल पडी। यह सुनकर हमलोग सभी अचंभित थे।
’कौन सा विकल्‍प ?’ भैया ने तत्‍काल पूछा।
’मेरे कहने का कोई गलत अर्थ न लगाएं, पर आज हमारे समक्ष सिर्फ हैप्‍पी की ही नहीं , श्रेया के जीवन की भी जिम्‍मेदारी है। इन दोनो के लिए दूसरे जगहों पर भटकने से तो अच्‍छा है कि दोनो को एक साथ चलने दिया जाए , यदि हैप्‍पी और श्रेया तैयार हो जाए तो‘ जॉली ने स्‍पष्‍ट कहा।
‘मुझे क्‍या आपत्ति हो सकती है , आपकी जैसी इच्‍छा’ हैप्‍पी को इस रिश्‍ते में कोई खराबी नहीं दिख रही थी , सो उसने भैया का तुरंत समर्थन कर दिया।
‘पर क्‍या श्रेया इस बात के लिए तैयार हो जाएगी’ भैया ने पूछा।

’अभी तुरंत तो नहीं, लेकिन जब वह ससुराल जाने को तैयार नहीं , तो कुछ दिनों में तो उसे तलाक लेकर दूसरे विवाह के लिए तैयार होना ही होगा।‘मानसी इतने अच्‍छे रिश्‍ते को आसानी से छोडना नहीं चाहती थी , उसे विश्‍वास था कि कुछ दिनों में वह श्रेया को मना ही लेगी।
जॉली ने हमारे सामने जो प्रस्‍ताव रखा , वह सबके हित में और सबसे बढिया विकल्‍प दिख रहा है। मैं भी दूसरी बार अब कोई भूल नहीं करना चाहता। मुझे भी मालूम है , हैप्‍पी और श्रेया एक दूसरे के सच्‍चे जीवनसाथी बन सकते हैं।

Thursday, 23 June 2011

अपने हिस्‍से का सुख (कहानी) .... संगीता पुरी

मात्र एक खबर से पूरे घर में सन्‍नाटा पसर गया था। सुबह एक्‍सीडेंट के बाद से ही सबके कान समय समय पर फोन पर होनेवाले बातचीत में ही लगे थे , इसलिए फोन रखते हुए 'मामाजी नहीं रहें' कहनेवाले पुलकित के धीमे से स्‍वर को सुनने में मां को तनिक भी देर न लगी और वह तुरंत बेहोश होकर गिर पडी। हमारे बहुत कोशिश करने पर ही वह होश में आ सकी , अपने इकलौते भाई की मौत का सदमा झेल पाना आसान तो न था। अभी उम्र ही क्‍या हुई थी , अभी नौकरी के भी दस साल बचे ही थे यानि मात्र 50 के ही थे वे। मेरे हाथ भले ही मम्‍मी को पंखा झल रहें हो , पर मन में विचारों का द्वन्‍द्व चल ही रहा था।

चार वर्ष पूर्व बोर्ड की परीक्षा पास करने के बाद मेरे समक्ष आगे की पढाई जारी रखने का कोई उपाय न था। ऐसे में मामाजी ने मुझे अपने पास शहर में बुलवाकर एक कॉलेज में मेरा नामांकन करवा दिया था। इस तरह अपनी पढाई के सिलसिले में मामाजी के परिवार से पिछले चार वर्षों से जुडी हुई थी मैं। उस घर की एक एक परेशानी से वाकिफ। वे शहर में रहते थे , बस इस बात को लेकर गांव वालों को भले ही उनसे प्रतिस्‍पर्धा रहती हो , पर वास्‍तव में उनकी स्थिति उतनी मजबूत भी नहीं थी। सरकारी नौकरी करने वाले सामान्‍य कर्मचारियों को तनख्‍वाह ही कितनी मिलती है ??

उतने में ही मामाजी तीन बच्‍चों के अपने पांच सदस्‍यीय परिवार को ही नहीं , साथ साथ नाना जी और नानी जी की जबाबदेही हमेशा संभालते आए थे। मेरे सामने ही चार वर्ष पहले नाना जी और दो वर्ष पहले नानी जी गुजर चुके थे , परिवार कुछ छोटा तो हो गया था , पर मामाजी के स्‍वास्‍थ्‍य की गडबडी तथा बच्‍चों की पढाई लिखाई के बढते भार से जीवन की गाडी खींचने में खासी परेशानी हो रही थी। महीने के अंत तक इतनी देनदारी हो जाती कि महीने का तनख्‍वाह शुरूआत के चार दिन में ही समाप्‍त हो जाता। अन्‍य आवश्‍यकताओं के लिए पूरे महीने खिचखिच होती रहती। अभी एक महीने पहले ही तो परीक्षा देकर मैं उनके यहां से वापस आयी थी।

ग्रेज्‍युएशन करने के बाद दो तीन वर्षों से बडे भैया नौकरी के लिए दिए जानेवाली परीक्षाओं में जुटे हुए थे। छह महीने के कोचिंग के फी के लिए घर में कितने दिनों तक हंगामा मचा रहा । भैया हर महीने कितने फार्म भरते और परीक्षा देने के लिए हमेशा शहर शहर भटकते ,  फिर अखबार में परीक्षाफल देखते और निराश सर झुका लेते। मामाजी इतने खर्च के व्‍यर्थ होने पर झुंझलाते। कर्मचारियों की छंटनी और रिक्तियों की कमी के इस दौर में सामान्‍य विद्यार्थियों को भला नौकरी मिल सकती है ?? व्‍यवसाय में रूचि रखनेवाले भैया को नौकरी करने की इच्‍छा भी न थी , पर व्‍यवसाय के लिए पूंजी कहां से लाते ?? मामाजी की मजबूरी वे समझते थे ,  दीदी की शादी भी तो करनी थी । दिन ब दिन तिलक दहेज की बढती मांग के कारण कहीं बात बढ भी नहीं पाती थी।

दो वर्षों से ग्रेज्‍युएशन करके बैठी दीदी अपने खाली दिमाग का शैतानी उपयोग ही कर रही थी। बात बात में भाइयों से झगड पडती।  छोटा भाई इंटर करने के बाद इंजीनियरिंग में एडमिशन लेना चाहता था , ताकि उसे भविष्‍य में कैरियर को लेकर इतना चिंतित न रहना पडे। पर आर्थिक समस्‍या यहां भी आडे आ रही थी। मामाजी की पहली प्राथमिकता दीदी की शादी थी , इस कारण इससे पहले वे कहीं भी बडा खर्च करने को तैयार न थे। छोटे भाई का भी एक वर्ष बर्वाद हो गया था , ऐसे दबाबपूर्ण वातावरण में मामाजी और बीमार रहने लगे थे , जिससे हर महीने दवाई का बोझ और बढता जा रहा था।

बढती महंगाई , मामाजी की बीमारी , दोनो भाइयों की महत्‍वाकांक्षा और दीदी की चिडचिडाहट ... ये सब घर के माहौल को बिगाडने के लिए काफी थे। अब तो किसी प्रकार घर को संभालनेवाले परिवार के एकमात्र कमानेवाले मामाजी ही नहीं रहें , तो अब घर का क्‍या हाल होगा ?? सोंचकर ही मैं परेशान थी। ऊपर नजर उठाया तो पापा खडे थे , उन्‍हें भी यह दुखद सूचना मिल चुकी थी। हमने तुरंत मामाजी के यहां निकलने का कार्यक्रम बनाया , उसके लिए पूरी तैयारी शुरू की। मां के बाद इस दुर्घटना का सर्वाधिक बुरा प्रभाव मुझपर ही पडा था , पर मां को लाचार देखते हुए मैने हिम्‍मत बनाए रखा। तीन चार घंटे का ही तो सफर था , हमें देखते ही मामीजी दहाड मारकर रो पडी। हमलोगों के पहुचने के बाद ही उनका दाह संस्‍कार हुआ। सारे क्रिया कर्म समाप्‍त होने तक लगभग सभी नजदीकी मेहमानों की मौजूदगी बनी रही , फिर धीरे धीरे सारे लोग चले गए। वहां की स्थिति को संभाले रहने की जिम्‍मेदारी मुझपर छोडकर मां भी चली गयी।

वहां रहने पर बातचीत से मालूम हुआ कि प्‍लांट में डृयूटी के दौरान ही एक एक्‍सीडेंट में मामाजी की मौत हुई थी , इसलिए कंपनी की ओर से उन्‍हें कुछ सुविधाएं मिलने की संभावना थी। कंपनी की ओर से एक बेटे को नौकरी देने के लिए ट्रेनिंग की वयवस्‍था की जानी थी , कंपनी की लापरवाही से हुए मौत के कारण परिवार को क्षतिपूर्ति के चेक भी मिलने थे। बीमा कंपनियों द्वारा भी एकमुश्‍त राशि मिलनेवाली थी और साथ में मामी जी को कुछ पेंशन भी। इसके लिए महीने दो महीने सबकी दौडधूप चलती रही , फिर धीरे धीरे सारा काम हो गया , छोटे भैया ने दो महीने की ट्रेनिंग के बाद आकर नौकरी ज्‍वाइन भी कर ली। दीदी के दहेज के लिए रूपए रख मामीजी ने बाकी रूपए बडे भैया को दे दिए। वे तो व्‍यवसाय करना ही चाहते थे , उनके मन की मुराद पूरी हो गयी। घर का माहौल सामान्‍य तौर पर ठीक ठाक देखकर मैं वापस लौट गयी।

समय समय पर मामा जी के यहां की खबर मिलती रहती थी , एक भाई व्‍यवसाय और एक नौकरी में सेट हो ही चुके थे , दहेज की वयवस्‍था हो जाने से दीदी के विवाह तय होने में देर नहीं लगी थी। हालांकि विवाह होने में अभी देर थी , पर विवाह का नाम सुनते ही मैं खुद को एक बार फिर से वहां जाने से नहीं रोक पायी। भैया का व्‍यवसाय चल पडा था , भैया की कमाई और दीदी की कुशलता से पूरे घर ही बदला बदला नजर आ रहा था। पूरे घर में हंसीखुशी का माहौल था , मामाजी सबके हिस्‍से का कष्‍ट लेकर इस दुनिया से चले गए थे। परिवार के एक एक सदस्‍य के पास पैसे थे , अभी से विवाह की तैयारी जोर शोर से हो रही थी। सबके चेहरे पर रौनक थी , सब अपने अपने हिस्‍से का सुख प्राप्‍त कर रहे थे। 

Saturday, 28 May 2011

नगों वाला सेट ...(कहानी)

बाजार जाने के लिए ज्‍योंहि मैं तैयार होकर बाहर निकली, बारिश शुरू हो चुकी थी। लौटकर बरामदे में एक कुर्सी डालकर एक पत्रिका हाथ में लेकर बारिश थमने का इंतजार करने लगी। बाजार के कई काम थे, बैंक से पैसे निकालने थे, राशन और सब्जियां भी लानी थी। कभी कभी बाजार निकल जाना मन लगाने के लिए तो अच्‍छा होता ही है, सेहत के लिए भी अच्‍छा रहता है। वास्‍तव में वक्‍त काटने के लिए घर में कोई काम भी तो नहीं , एक पत्रिका को इतनी बार पढ लेती हूं कि उसके एक एक शब्‍द रटे से लगते हैं। मैगजीन को एक ओर रखती हुई सामने नजर डाला , तो बारिश और तेज हो चुकी थी। पिछले तीन दिनों की तरह ही आज भी घर से निकल पाने की कोई संभावना नहीं दिख रही है। वो तो भला हुआ कि कुछ जरूरी सामान कई दिन पहले ही नौकर से मंगवा लिया था , नहीं तो आज खाने पीने की भी आफत हो जाती। कई दिनों से झमाझम बारिश जो हो रही है।

विजय को तो आफिस के लगातार प्रोमोशन के साथ ही साथ व्‍यस्‍तता इतनी बढती चली गयी थी कि अब घर के कार्यों के लिए या मेरा साथ देने के लिए उन्‍हें फुर्सत ही नहीं। जब भी उनकी इस व्‍यस्‍तता से मैं खीझ उठती हूं , मुझे किसी न किसी तरह मना ही लेते हैं। एक समय था , जब वे समय पर घर आया करते थे , जब तब ऑफिस से छुट्टी लेते थे , तब मैं ही अपनी घर गृहस्‍थी में उलझी रहती थी , तब विजय खीझ उठते थे मुझसे , अब उल्‍टा ही हो गया है। खैर, अब दो तीन वर्ष की ही तो बात है , सेवानिवृत्‍त होने के बाद आपस में सुख दुख बांटते हम दोनो दिन रात साथ साथ रह पाएंगे, मैने संतोष की सांस ली।

मानसून के आरंभ की ये बरसात भले ही किसानो के लिए वरदान हो , पर मुझे तो सारे कार्यों मे बाधा डालनेवाला असमय का बरसात नजर आ रहा था। तीन चार दिनों से ऐसा ही हो रहा था। सुबह नाश्‍ता के बाद विजय को विदा करती , तो बाई आ जाती। उसके बाद खाना बनाने का टाइम हो जाता। खाना खिलाकर जैसे ही विजय को ऑफिस भेजती , कभी मेरे तैयार होने से पहले ही बारिश आती , तो कभी मेरे तैयार होने के बाद। अजीब उलझन में फंस गयी हूं मैं , इस समय के अलावे कभी कहीं निकलने को समय ही नहीं मिलता, अकेले इतने बडे घर के देखरेख की जिम्‍मेदारी जो निभानी पड रही है।

कितने छोटे से क्‍वार्टर में मैने अपने जीवन का प्रारंभिक समय गुजार दिया था। जरूरत भर सामान भी उसमें नहीं आ पाता था। दो छोटे छोटे कमरों में ही अपनी आधी से अधिक जिंदगी काट दी थी मैने। सीमित मासिक तनख्‍वाह में अपनी जरूरतें पूरी करने में मैं हमेशा असमर्थ रहती थी। इसलिए तो एक आलोक के होने के बाद हमलोगों को किसी दूसरे बच्‍चे की इच्‍छा भी नहीं थी। हमलोग आलोक को पढा लिखाकर ऊंचे पद पर पहुंचाने का सपना देखते अपना जीवन काट रहे थे। पर इस सपने के अधूरे रहते ही हमारी लापरवाही से अचानक प्राची और प्रखर गर्भ में हलचल मचाने लगे थे। इस अहसास से मेरी हालत बहुत बुरी हो गयी थी, पर कोई उपाय न था और मुझे दोनों को एक ही साथ जन्‍म देना पडा था। आलोक तब पंद्रह वर्ष का हो चुका था और अपने अकेलापन को दूर होता देख प्राची और प्रखर के जन्‍म से बहुत खुश था।

लेकिन प्राची और प्रखर के जन्‍म के बाद भी हमने उसकी पढाई लिखाई में कोई बाधा न आने दी थी और उसने इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर इसी शहर में एक कंपनी ज्‍वाइन कर ली थी। कुछ ही दिनों में उसने हमलोगों से अपनी सहकर्मी अलका से प्रेम विवाह करने की स्‍वीकृति मांगी थी। अलका के व्‍यक्तित्‍व , पढाई लिखाई या पारिवारिक पृष्‍ठभूमि में कोई कमजोरी नहीं थी , जिसके कारण हमलोग इस विवाह को मंजूरी नहीं देते। सच तो यह था कि अलका को अपनी बहू के रूप में पाकर हम सब बहुत खुश थे , यही कारण था कि हमने पूरे उत्‍साह से भव्‍य आयोजन करते हुए उनका विवाह संपन्‍न कराया था।

उसने आते ही सारा घर संभाल लिया था। चाहे घर गृहस्‍थी का कोई मुद्दा हो या रसोई का काम , प्राची या प्रखर की पढाई हो या कोई और महत्‍वपूर्ण फैसला ... सबमें उसकी भूमिका अहम् होती। इसी कारण विजय , आलोक , प्राची और प्रखर उसे काफी महत्‍व देते। इस बात से मैं दुखी हो जाती , मुझे अक्‍सर महसूस होता कि इस घर में मेरा महत्‍व काफी कम हो गया है। समय पंख लगाकर उडता रहा , विजय ,आलोक और अलका को ऑफिस में प्रोमोशनो , प्रखर को व्‍यवसायिक सफलताओं और सबों के वैवाहिक सुखों के बौछार से , बच्‍चों के खिलखिलाहट से घर में रौनक आती गयी और सबके जीवनस्‍तर में काफी बढोत्‍तरी हुई। पर इससे परिवार के अन्‍य लोगों की तुलना मे वैचारिक दृष्टि से मैं काफी पीछे छूट गयी। मैं उसके बढते अधिकारों को देखकर चिंतित हो जाया करती, मुझे अपने अस्तित्‍व का भय सताने लगता था और इस भय के कारण ही मैं वैसे वैसे कार्यों में हस्‍तक्षेप करने लगी थी , जो एक मां की दृष्टि से अनुचित था।

फिर एक दिन वही हुआ , जिसका विजय को भय था। मेरे रोज रोज के उलाहने और बात बात पर हस्‍तक्षेप से तंग आकर आलोक और अलका किराए के एक फ्लैट में शिफ्ट कर गए। प्राची और प्रखर के लिए तो यह एक सदमा ही था। महीनों बाद ही वे सामान्‍य हो पाए, वैसे उनका भावनात्‍मक जुडाव तो उनके साथ अब भी बना हुआ है। उस दिन के बाद अकेलेपन से भयभीत मैं हमेशा विजय के सेवानिवृत्ति का इंतजार करती रही, ताकि मेरा समय भी आराम से कट सके। प्राची और प्रखर छुट्टियां व्‍यतीत करने भी अलका और आलोक के पास ही आते , इसलिए कभी कभार ही बेटी , बहू , दामाद , नाती , पोते मेरे पास आते थे , फिर दो चार घंटे में ही उनके लौटने का समय हो जाता और परिवार के वे सदस्‍य मुझे मेहमान से भी अधिक गैर नजर आते।

फोन की घंटी ने मुझे वर्तमान में लाकर खडा कर दिया था।

‘हलो’

’नमस्‍ते मम्‍मी’ फोन पर अलका ही थी।

’ओह बेटे, अभी मैं तुम्‍हें ही याद कर रही थी।‘

‘वाह, आपने तो मेरी उम्र ही बढा दी’

’वो कैसे?’

’कोई किसी को याद करे और वो उसी वक्‍त पहुंच जाए, तो उसकी उम्र बढ जाती है’

’अच्‍छा, तो बताओ, तुमलोग कैसे हो?’

’हमलोग तो अच्‍छे हैं, आप अपनी बताएं, पापा की तबियत कैसी है?’

’सबलोग अच्‍छे हैं’

’मम्‍मी, पापा के साथ कल बैंक में जाकर मेरा वो नगों वाला सेट निकालकर ले आइएगा, बुआजी के बेटे की शादी है, काफी दिनों से मैने उसे नहीं पहना है, कल शाम को आलोक जाकर ले आएंगे। परसों शाम की गाडी से हमें निकलना है।‘

’ठीक है, मुझे भी बाजार के कई काम निबटाने हैं। ऐसे तो ये व्‍यस्‍तता का बहाना बनाते हैं। तेरे नाम से छुट्टी ले ही लेंगे या ऑफिस से समय निकालकर थोडी देर पहले चल देंगे। मेरा भी टेंशन दूर हो गया। कई दिनों से बारिश की वजह से काम भी नहीं कर पा रही हूं।‘

बारिश अभी भी लगातार जारी थी , और उसके साथ मेरे विचारों की श्रृंखला भी। पता नहीं क्‍यूं , आज मन वर्तमान में टिक ही नहीं रहा था। किसी जगह पर कर्तब्‍यों का पालन करनेवालों को अधिकारों से तो वंचित नहीं किया जा सकता। पर सच ही कहा गया है , स्‍त्री की सबसे बडी दुश्‍मन स्‍त्री ही होती है। एक बच्‍ची को माता पिता अधिक लाड प्‍यार करें , तो बच्‍ची का भविष्‍य अंधकारमय नजर आने लगता है, बहू को अधिक प्‍यार देने का भी परिणाम घरवालों के लिए बुरा माना जाता है, यहां तक कि मां को अधिक प्‍यार मिले तो बहू के लिए अच्‍छा नहीं माना जाता है। सच तो यह है कि स्‍त्री के हक के विरूद्ध ये बातें स्‍त्री ही किया करती है। इस तरह पीढी दर पीढी किसी स्‍त्री को यह अधिकार ही नहीं मिल पाता , जिसकी वह हकदार है। लेकिन यह बात तो मेरे मन में आज आ रही थी , यही बात दस वर्ष पहले आ गयी होती , तो यह घर तो बिखरने से बच गया होता। मैने अलका को बहुत परेशान किया है , इसे तो मुझे स्‍वीकारना ही पडेगा। वो तो उन दोनों का बडप्‍पन ही है कि कुछ ही दिनों में सारी बातों को भूलकर वे हमारी गल्‍ती को माफ करते आए हैं।

बीती हुई घटनाएं मेरे दिमाग में चलचित्र की भांति घूमती रहती थी , अधिकांश जगहों पर दोष मेरा होता । मेरी आत्‍मा हमेशा मुझे धिक्‍कारा करती , क्‍या इस घर में अलका को प्राची सा अधिकार नहीं मिलना चाहिए था ? आखिर उसका दोष क्‍या था ? अचानक ही मेरे दिमाग ने अलका के दोषों पर ध्‍यान देना आरंभ किया। उसने क्‍या क्‍या गलतियां की थी ... एक , दो , तीन ........ गल्तियों से तो भगवान भी नहीं बच पाए , भला मनुष्‍य के जीवन में गल्तियां न मिले , बहुत सारी गल्तियां नजर आने लगी। अलका को जब भी इन गल्तियों के बारे में टोकती , आलोक और विजय उसका पक्ष लेकर मुझे ही चुप करवा देते। इन दोनो के प्‍यार से ही अलका का दिमाग चढ जाता था।

उन बातों को सोंचकर फिर मेरा तनाव घटने की बजाए बढ गया। हमारे बैंक के लॉकर में अलका का एकमात्र नगों वाला सेट ही तो बचा था , जो हमलोगों ने उसे उसके विवाह के लिए इतने चाव से खरीदा था। मायके से मिले सारे जेवर उसने धीरे धीरे मंगवा ही लिए थे, कभी किसी बहाने तो कभी किसी। आज यह सेट मंगवाकर मानो वह इस घर से रिश्‍ता ही तोड रही हो। आलोक भी कैसा मर्द है , अलका की सब हां में हां मिलाता है। खाली दिमाग शैतान का घर ही तो होता है, मेरे मन में इसी तरह की उलूल जुलूल बातें आती रही और मैं व्‍यथित होती रही। विजय के आते ही अलका के बारे में इधर उधर की बातें कहते हुए अपने मन की सारी भडास निकालने में जरा भी देर नहीं की। आलोक के दोषों को भी गिन गिनकर सुनाया। इन बातों से विजय भी परेशान और चिंतित हो गए। हम दोनों ने बेटे बहू के नालायक होने के गम में पलंग पर करवटें बदलते रात काटी। फिर विजय ने दूसरे दिन ऑफिस से छुट्टी ली और हमने सारा काम निबटाया और लौटते वक्‍त बैंक से बहू का नगों वाला सेट निकालकर ले आए।

शाम को ऑफिस से लौटता हुआ आलोक अकेले ही गेट से पापा , पापा पुकारता घर में घुसा , पर घर में बिल्‍कुल सन्‍नाटा था। सहमते हुए उसने ड्राइंग रूम में अपने कदम रखे। कोई और दिन होता , तो पापा उससे लिपट ही गए होते , पर आज हमलोग सोफे पर निर्विकार भाव से बैठे थे। इस शांति को देखकर किसी तूफान के होने के आशंका से उसका चेहरा भयभीत हो गया , पर इससे उसे जन्‍म देनेवाले हम मम्‍मी पापा के मन में कोई सहानुभूति नहीं थी । हमने उसे फटकारना आरंभ किया , एक के बाद एक ... अलका पर और उसपर तरह तरह के इल्‍जाम लगाते हुए, अपने शिकायतों का पुलिंदा खोलते हुए हमने जेवर का डब्‍बा उसके हाथ में दे दिया। ऑफिस से लौटते हुए थके हारे मूड पर इस अप्रत्‍याशित डॉट आलोक के क्रोध को कईगुणा भडका गया। वह इतने दिनों में अलका को नहीं समझ पाया था, ऐसी बात नहीं थी , अलका ने आजतक परिवार के मामले में सिर्फ सहयोग ही दिया था। पर अलका के पक्ष में कुछ कहने से तो वह ‘जोरू का गुलाम’ ही बनता, सो चुप रहना ही श्रेयस्‍कर था। उसके समझ में आ गया था कि लाख कोशिश कर‍के भी वह मम्‍मी और पापा को खुश नहीं रख सकता था, वह चुपचाप पल्‍टा, उसके कदम तेज गति से अपने घर की ओर चल पडे।

आलोक को उल्‍टा पांव लौटते देखने के बाद मैं अचानक होश में आयी , विजय के चेहरे पर परेशानी देख मेरी हालत खराब थी। मन ने कहा कि मैं आलोक से भी तेज गति से कदम बढाते हुए उसे लौटा लाऊं , पर कैसे ? आलोक से आंख या नजर मिलाने की शक्ति भी अब मुझमें नहीं बची थी। बहू के एक छोटे से नगों वाले सेट ने हमारे मध्‍य इतनी दूरी पैदा कर दी थी। एक बार फिर से मैने वह गल्‍ती दुहरायी है , जो अक्‍सर हमारे मध्‍य दूरियां पैदा करती है और जिसे न करने का संकल्‍प अक्‍सर करती आयी हूं। आज भी शायद अंत नहीं है , यह गल्‍ती मुझसे तबतक होती रहेगी ,जबतक मैं अलका और प्राची को बिल्‍कुल एक रूप में न देखूं।

Tuesday, 24 May 2011

नसीब अपना अपना .......

समाज की विसंगतियों पर आधारित यह पोस्‍ट पूर्व में नुक्‍कड मे भी प्रकाशित हो चुकी है .. पर अपनी रचनाओं को एक स्‍थान पर रखने के क्रम में इसे पुन: यहां प्रकाशित कर रही हूं .... प्रथम दृश्‍य
‘अब तबियत कैसी है तुम्‍हारी’ आफिस से लौटते ही बिस्‍तर पर लेटी हुई पत्‍नी पर नजर डालते हुए पति ने पूछा। ‘अभी कुछ ठीक है, बुखार तो दिनभर नहीं था , पर सर में तेज दर्द रहा’ ’तुमने आराम नहीं किया होगा, दवाइयां नहीं खायी होगी, चलो डाक्‍टर के पास चलते हैं’ ’दिनभर आराम ही तो किया है , पडोसी ने खाना बनाने को मना कर रखा था , स्‍कूल से आते ही बच्‍चों को ले गए , खाना खिलाकर भेजा , डाक्‍टर के यहां जाने की जरूरत नहीं , अभी आराम है’ ’ठीक है, आराम ही करो, मैं होटल से खाना ले आता हूं’ ’इसकी जरूरत नहीं, फ्रिज में राजमें की सब्‍जी है , थोडे चावल कूकर में डालकर सिटी लगा लेती हूं , आपलोग खा लेंगे’ ’नहीं, हमें नहीं खाना चावल, आंटी ने बहुत खिला दिया है , हल्‍की भूख ही है हमें’ बच्‍चे चावल के नाम से बिदक उठे। ’ठीक है, तो चार फुल्‍के ही सेंक दूं , आटे भी गूंधे पडे हैं फ्रिज में’ ‘नहीं मम्‍मा, रोटी खाने की भी इच्‍छा नहीं’ ’तो फिर क्‍या खाओगे’ ’बिल्‍कुल हल्‍का फुल्‍का’ ‘ब्रेड का ही कुछ बना दूं’ ’नहीं, नूडल्‍स वगैरह’ ’ठीक है, दो मिनट में तो बन जाएगा, मैगी ही बना देती हूं’ ‘अरे, क्‍या कर रही हो’ पतिदेव बाथरूम से आ चुके थे। ’कुछ भी तो नहीं बच्‍चों के लिए मैगी बना दूं’ ’अरे नहीं, तुम्‍हें परेशान होने की क्‍या जरूरत, मैं ले आता हूं होटल से , तुम आराम करो भई’ उन्‍होने हाथ पकडकर पत्‍नी को बिस्‍तर पर लिटा दिया और सबका खाना होटल से ले आए।
द्वितीय दृश्‍य
सुबह से सर में तेज दर्द है , पर मजदूरी करने जाना जरूरी था। जाते वक्‍त मुहल्‍ले की दुकान से उधार ही सही , सरदर्द की दो दवाइयां ले ली थी , सबह और दोपहर दोनो वक्‍त उस दवाई को खा लेने का ही परिणाम था कि वह आज की दिहाडी कमा चुकी थी। कुल 60 रूपए हाथ में , पति की कमाई का कोई भरोसा नहीं , सारा पैसा शराब में ही खर्च कर देता है वह। 60 रूपए में क्‍या ले , क्‍या नहीं , 4 रूपए की दवा ले ही चुकी है वह। 18 रूपए वाले चावल ले तो उसमें कंकड नहीं होता , पर बाकी काम के लिए पैसे कम पड जाएंगे । 15 रूपएवाले चावल ही ले लें , कंकड तो चुने भी जा सकते हैं। दो किलो चावल लेने भी जरूरी हैं, थोडा भात बच जाए तो बासी भात के सहारे बच्‍चे दिनभर काट लेते हैं। घर में तेल भी नहीं , दाल भी नहीं , सब्‍जी भी नहीं , ईंधन भी नहीं , 26 रूपए में क्‍या ले क्‍या नहीं। नहीं आज तेल छोड देना चाहिए , थोडे दाल ले ले , थोडे साग है बगीचे में , आलू है घर में , कोयला लेना जरूरी है और किरासन तेल भी। काफी मशक्‍कत करके वह 56 रूपए में उसने आज की सभी जरूरतें पूरी कर ही ली। आकर चूल्‍हे जलाए , चावल बीने , साग चुने। खाने के लिए चावल , दाल , साग और आलू के चोखे बनाए। दिनभर के भूखे बच्‍चे गरम गरम खाना खा ही रहे थे कि झूमते झामते पति पहुंच गया। उसका खाना भी परोसा गया , पर यह क्‍या , पहला कौर खाते ही मुंह में कंकड। पति का गुस्‍सा सातवें आसमान पर , पूरी थाली फेक दी और जड दिए चार थप्‍पड उसकी गालों पर। ‘साली खाना बनाना भी नहीं आता , आंख की जगह पत्‍थर लगे हैं क्‍या ? ‘ बेसुध पति को जवाब देकर और मार खाने की ताकत तो उसकी थी नहीं , रोकर भी समय जाया नहीं कर सकती , बच्‍चों को खिलाकर खुद भी खाना है , बरतन साफ करने हैं तबियत ठीक करने के लिए सोना भी जरूरी है , सुबह फिर मजदूरी पर भी तो जाना है।

Friday, 4 February 2011

मिथ्‍या भ्रम (कहानी) ... संगीता पुरी


‘क्‍या हुआ, ट्रेन क्‍यूं रूक गयी ?’ रानी ने उनींदी आंखों को खोलते हुए पूछा। ’अरे, तुम सो गयी क्‍या ? देखती नहीं , बोकारो आ गया।‘ बोकारो का नाम सुनते ही वह चौंककर उठी। तीन दिनों तक बैठे बैठे कमर में दर्द सा हो रहा था। कब से इंतजार कर रही थी वह , अपने गांव पहुंचने का , इंतजार करते करते तुरंत ही आंख लग गयी थी। अब मंजिल काफी नजदीक आ गयी थी। उसने अपने कपडे समेटे , मोनू को संभाला और सीट पर एक नजर डालती हुई ट्रेन से उतरने के लिए क्‍यू में खडी हो गयी।

दस वर्षों बाद वह मद्रास से वापस आ रही थी। गांव आने का कोई बहाना इतने दिनों तक नहीं मिल रहा था। गांव का मकान भी इतने दिनों से सूना पडा था। अपने अपने रोजगार के सिलसिले में सब बाहर ही जम गए थे। पर इस बार चाचाजी की जिद ने उन सबके लिए गांव का रास्‍ता खोल ही दिया था। वे अपने लडके की शादी गांव से ही करेंगे। सबके पीछे वह सामानों को लेकर ट्रेन से उतर पडी। एक टैक्‍सी ली और गांव के रास्‍ते पर बढ चली।

टैक्‍सी जितनी ही तेजी से अपने मंजिल की ओर जा रही थी , उतनी ही तेजी से वह अतीत की ओर। मद्रास के महानगरीय जीवन को जीती हुई वह अबतक जिस गांव को लगभग भूल ही चली थी , वह अचानक उसकी आंखों के सामने सजीव हो उठा था। घटनाएं चलचित्र के समान चलती जा रही थी। उछलते कूदते , उधम मचाते उनके कदम .. कभी बाग बगीचे में तो कभी खेल के मैदानों में। अपना लम्‍बा चौडा आंगन भी उन्‍हें धमाचौकडी में मदद ही कर देता था।

खेलने का कोई साधन नहीं , फिर भी खेल में इतनी विविधता। जो मन में आया, वही खेल लिया। खेल के लिए कार्यक्रम बनाने में उसकी बडी भूमिका रहती। वास्‍तविक जीवन में जो भी होते देखती , खेल के स्‍थान पर उतार लेती थी। घर के कुर्सी , बेंच , खाट और चौकी को गाडी बनाकर यात्रा का आनंद लेने का खेल बच्‍चों को खूब भाता था। कोई टिकट बेचता , कोई ड्राइवर बनता , तो कोई यात्री। रूट की तो कोई चिंता ही नहीं थी , उनकी मनमौजी गाडी कहीं से कहीं पहुंच सकती थी।

तब सरकार की ओर से परिवार नियोजन का कार्यक्रम जोरों पर था। भला उनके खेल में यह कैसे शामिल न होता। कुर्सी पर डाक्‍टर , बेंच पर उसके सहायक और खाट चौकी पर लेटे हुए मरीज । चाकू की जगह चम्‍मच , पेट काटा , आपरेशन किया , फटाफट घाव ठीक , एक के बाद एक मरीज का आपरेशन। भले ही अस्‍पताल के डाक्‍टर साहब का लक्ष्‍य पूरा न हुआ हो , पर उन्‍होने तो लक्ष्‍य से अधिक काम कर डाला था।

इसी तरह गांव में एक महायज्ञ का आयोजन हुआ। यज्ञ के कार्यक्रम को एक दिन ही देख लेना उनके लिए काफी था। अपने आंगन में यज्ञ का मंडप तैयार बीच में हवन कुंड और चारो ओर परिक्रमा के लिए जगह । मुहल्‍ले के सारे बच्‍चे हाथ जोडे हवनकुंड की परिक्रमा कर रहे थे और ‘श्रीराम , जयराम , जय जय राम, जय जय विघ्‍न हरण हनुमान’ के जयघोष से आंगन गूंज रहा था। कितना स्‍वस्‍थ माहौल था , बच्‍चे भी खुश रहते थे और अभिभावक भी।

लेकिन इसी क्रम में उसे एक बच्‍चे दीपू की याद अचानक आ गयी। जब सारे बच्‍चे खेल रहे होते , वह एक किनारे खडा उनका मुंह तक रहा होता। ‘दीपू , तुम भी आ जाओ’ उसे बुलाती , तो धीरे धीरे चलकर उनके खेल में शामिल होता। पर दीपू को शामिल करके खेलना शुरू करते ही तुरंत रानी को कुछ याद आ जाता और वह दौडकर घर के एक खास कमरे में जाती। उसका अनुमान बिल्‍कुल सही होता। दीपू की मम्‍मी उस कमरे में फरही बना रही होती। अपनी कला में पारंगत वह छोटे छोटे चावल को मिट्टी के बरतन में रखे गरम रेत में तल तलकर निकाल रही होती।

उसकी दिलचस्‍पी चावल के फरही में कम होती , इसलिए वह अंदर जाकर चने निकाल लाती। ’काकी, इन चनों को तल दो ना’ वह उनसे आग्रह करती। ’इतनी जल्‍दी तलने से ये कठोर हो जाएंगे और इन्‍हे खाने में तुम्‍हारे दांत टूट जाएंगे, थोडी देर सब्र करो।‘ वह चने में थोडे नमक , हल्‍दी और पानी डालकर उसे भीगने को रख देती। अब भला उसका खेल में मन लग सकता था। हर एक दो मिनट में अंदर आती और फिर निराश होकर बाहर आती , लेकिन कुछ ही देर में उसे सब्र का सोंधा नमकीन फल मिल जाता और चने के भुंजे को सारे बच्‍चे मिलकर खाते। इस तरह शायद ही कभी दीपू को उनके साथ खेलने का मौका मिल पाया हो।

टैक्‍सी अब उसके गांव के काफी करीब आ चुकी थी। रबी के फसल खेतों में लहलहा रहे थे। बहुत कुछ पहले जैसा ही दिखाई पड रहा था। शीघ्र ही गांव का ब्‍लाक , मिड्ल स्‍कूल , बस स्‍टैंड , गांव का बाजार , सब क्रम से आते और देखते ही देखते आंखो से ओझल भी होते जा रहे थे। थोडी ही देर में उसका मुहल्‍ला भी शुरू हो गया था। बडे पापा का मकान , रमेश की दुकान, हरिमंदिर , शिवमंदिर , सबको देखकर खुशी का ठिकाना न था।

पर एक स्‍थान पर अचानक तीनमंजिला इमारत को देखकर उसके तो होश उड गए। यह मकान पहले तो नहीं था। फिर उसे दीपू की याद आ गयी। इसी जगह तो दीपू का छोटा सा दो कमरों का खपरैल घर था , जिसके बाहरवाले छोटे से कमरे को ड्राइंग , डाइनिंग या किचन कुछ भी कहा जा सकता था तथा उसी प्रकार अंदरवाले को बेडरूम , ड्रेसिंग रूम या स्‍टोर। यहां पर इस मकान के बनने का अर्थ यही था कि दीपू के पापा ने अपनी जमीन किसी और को बेच दी, क्‍यूंकि वे लोग काफी गरीब थे और इतनी जल्‍दी उनकी सामर्थ्‍य तीनमंजिला मकान बनाने की नहीं हो सकती थी।

घर पहुंचने से ठीक पहले उसका मन बहुत चिंतित हो गया था। पता नहीं वे लोग अब किस हालत में होंगे । दीपू के पापा तो बेरोजगार थे , उसकी मम्‍मी ही दिनभर भूखी , प्‍यासी , अपने भूख को तीन चार कप चाय पीकर शांत करती हुई लोगों के घरों में फरही बनाती अपने परिवार की गाडी को खींच रही थी। बृहस्‍पतिवार को वे भी बैठ जाती थी , क्‍यूंकि गांव में इस दिन चूल्‍हे पर मिट्टी के बरतन चढाना अशुभ माना जाता है। कहते हैं , ऐसा करने से लक्ष्‍मी घर से दूर हो जाती है , धन संपत्ति की हानि होती है।

एक दिन बैठ जाना दीपू की मम्‍मी के लिए बडी हानि थी। कुछ दिनों तक उन्‍होने इसे झेला , पर बाद में एक रास्‍ता निकाल लिया। अब वे बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाती मिलती , जो उनके घर से सप्‍ताहभर की बिक्री के लिए काफी होता। ’काकी , तुम अपने घर में बृहस्‍पतिवार को मिट्टी के बर्तन क्‍यू चढाती हो ? ‘ वह अक्‍सर उनसे पूछती। उनके पास जबाब होता ‘ बेटे , मुझे घरवालों के पेट भरने की चिंता है , मेरे पास कौन सी धन संपत्ति है , जिसे बचाने के लिए मुझे नियम का पालन करना पडे’ तब उसका बाल मस्तिष्‍क उनकी इन बातों को समझने में असमर्थ था।

पर अभी उसका वयस्‍क वैज्ञानिक मस्तिष्‍क दुविधा में पड गया था। ’क्‍या जरूरत थी , दीपू के मम्‍मी को बृहस्‍पतिवार को अपने घर में फरही बनाने की , लक्ष्‍मी सदा के लिए रूठ गयी , जमीन भी बेचना पड गया , अपनी जमीन बेचने के बाद न जाने वे किस हाल में होंगी , दीपू भी न जाने कहां भटक रहा होगा’ सोंचसोंचकर उसका मन परेशान हो गया था। टैक्‍सी के रूकते ही वे लोग घर के अंदर गए , परसों ही शादी थी , लगभग सारे रिश्‍तेदार आ चुके थे , इसलिए काफी चहल पहल थी। मिलने जुलने और बातचीत के सिलसिले में तीन चार घंटे कैसे व्‍यतीत हो गए , पता भी न चला।

अब थोडी ही देर में रस्‍मों की शुरूआत होने वाली थी। चूंकि घर में रानी ही सबसे बडी लडकी थी , उसे ही गांव के सभी घरों में औरतों को रस्‍म में सम्मिलित होने के लिए न्‍योता दे आने की जबाबदेही मिली। वह दाई के साथ इस काम को करने के लिए निकली। सबों के घर तो जाने पहचाने थे , पर सारे लोगों में से कुछ आसानी से पहचान में आ रहे थे , तो कुछ को पहचानने के लिए उसके दिमाग को खासी मशक्‍कत करनी पड रही थी।

एक मकान से दूसरे मकान में घूमती हुई वह आखिर उस मकान में पहुच ही गयी, जिसने चार छह घंटे से उसे भ्रम में डाल रखा था। इस मकान के बारे में उसने दाई से पूछा तो वह भाव विभोर होकर कहने लगी ‘अरे , दीपू जैसा होनहार बेटा भगवान सबको दे। उसने व्‍यापार में काफी तरक्‍की की और शोहरत भी कमाया। उसने ही यह मकान बनवाया है। इस बीच पिताजी तो चल बसे , पर अपनी मां का यह काफी ख्‍याल रखता है। अभी तीन चार महीने पूर्व इसका ब्‍याह हुआ है।

पत्‍नी भी बहुत अच्‍छे घर से है‘ दाई उसकी प्रशंसा में अपनी धुन में कुछ कुछ बोले जा रही थी और वह आश्‍चर्यचकित उसकी बातों को सुन रही थी। हां, उसके वैज्ञानिक मस्तिष्‍क को चुनौती देनेवाला एक मिथ्‍याभ्रम टूटकर जरूर चकनाचूर हो चुका था।

Sunday, 30 January 2011

सिक्‍के का दूसरा पहलू

एक झूठ के बाद पढें मेरी अगली कहानी ... सिक्‍के का दूसरा पहलू


आज इस व्‍हील चेयर पर बैठे हुए मुझे एक महीने हो गए थे। अपने पति से दूर बच्‍चों के सान्निध्‍य में कोई असहाय इतना सुखी हो सकता है , यह मेरी कल्‍पना से परे था। बच्‍चों ने सुबह से रात्रि तक मेरी हर जरूरत पूरी की थी। मैं चाहती थी कि थोडी देर और सो जाऊं , ताकि बच्‍चे कुछ देर आराम कर सके , पर नींद क्‍या दुखी लोगों का साथ दे सकती है ? वह तो सुबह के चार बजते ही मुझे छोडकर चल देती। नींद के बाद बिछोने में पडे रहना मेरी आदत न थी और आहट न होने देने की कोशिश में धीरे धीरे गुसलखाने की ओर बढती , पर व्‍हील चेयर की थोडी भी आहट बच्‍चों के कान में पड ही जाती और वे मां की सेवा की खातिर तेजी से दौडे आते , और मुझे स्‍वयं उठ जाने के लिए फिर मीठी सी झिडकी मिलती।


स्‍कूल जाने से पहले वे मेरे सारे काम समाप्‍त कर और मेरी सारी जरूरतों की चीजों को सहेजकर जाते , ताकि जरूरत पडने पर वह वस्‍तु उचित स्‍थान पर मिल जाए। स्‍कूल से आकर भी बच्‍चे मेरी सारी समस्‍याओं को सुनते और समाधान करते, रसोई के सारे कार्य और घर गृहस्‍थी के कार्य तो उनके हिस्‍से में थे ही। एक महीने से मैं अपनी लाचार हालतमें दोनो बच्‍चों के क्रियाकलापों को ही देख रही थी। क्‍यूंकि मेरे दोनो पैरों में प्‍लास्‍टर था और मैं उठने बैठने से भी लाचार हो गयी थी। ये तो व्‍हील चेयर की ही मेहरबानी थी कि घर के सभी हिस्‍सों में घूम घूमकर अपने शरीर के साथ ही साथ मन और दिमाग को भी चलायमान करने में मैं समर्थ हो पा रही थी , अन्‍यथा मेरी और भी बुरी हालत होती।

आज सिद्धांत के आने की प्रतीक्षा में बैठी बरामदे में बैठी जाडे के मीठी धूप का आनंद ले रही हूं। दोनो बच्‍चे ऋचा और ऋषभ पापा को लेने स्‍टेशन गए हुए हैं। दिल्‍ली से आनेवाली गाडी तो तीन बजे उसके शहर पहुंच जाती है , इस हिसाब से साढे तीन बजे उसे घर पहुंच जाना चाहिए था , पर अभी तो ढाई ही बजे हैं , इस तरह पूरे एक घंटे देर है , फिर गाडी का भी एकाध घंटे देर आना कोई नई बात नहीं , इस तरह पूरे दो घंटे का इंतजार करना पड सकता है मुझे। दो घंटे की देरी सोंचकर ही मेरे चेहरे पर उदासी छा गयी। इतना इंतजार करना व्‍हील चेयर पर बैठे किसी भी व्‍यक्ति के लिए बहुत मुश्किल है। यदि मैं अच्‍छी हालत में होती , तो रसोई में जाकर सिद्धांत का पसंदीदा व्‍यंजन ही बना लेती। वैसे वे खाने पीने के इतने शौकीन भी नहीं कि उनकी याद में थोडा समय रसोई में भी काटा जा सके।



कुछ सोंचकर मैं अंदर गयी और बुनाई का सामान लेकर बाहर आयी। इस एक महीने में बुनाई ही मेरी सच्‍ची सहेली बन गयी है। जब भी मन नहीं लग रहा होता है , बुनाई हाथ में आ जाती है। इस एक महीने में मैंने कितने ही स्‍वेटर बना डाले हैं। बेटे के लिए बन रहे स्‍वेटर में मेरे हाथ तेजी से चलने लगे। मुझे याद आया, सिद्धांत का ऐसा इंतजार मैंने कभी नहीं किया है। अबतक उनके घर में पहुंचने मात्र की खबर से ही मेरी स्‍वतंत्रता में खलल दिखाई पडती थी, चाहे मैं अपने मायके में होऊं , ससुराल में या फिर अपने घर पर।


ऐसी बात नहीं थी कि उनमें कोई अवगुण था या उनके चरित्र में कोई गडबडी थी , बात बस इतनी सी थी कि अभी तक उनके विचारों से मेरे विचारों का तालमेल नहीं हो सका था। सच तो यह है कि मैं ही अभी तक उन्‍हें कोसती आ रही थी, उन्‍हें जाहिल, गंवार या नीचले स्‍तर का समझती आ रही थी। पता नहीं , किस ढंग से माता पिता ने उनका पालन पोषण किया था , न खाने पीने का ढंग , न ही पहनने ओढने का सलीका , न घूमने फिरने या पिक्‍चर देखने की चाहत और न ही पत्‍नी या बच्‍चों को कोई उपहार देने का शौक। बात बात पर पैसे के महत्‍व को समझाता , आधुनिकता से संबंधित हर खर्च को फिजूलखर्ची समझता और हर प्रकार के खाते में पैसे जमा करने की चिंता में मेरे हर खर्च पर टोकाटोकी करनेकी आदत .. ऐसे पति से मुझे सामंजस्‍य बनाना होगा , मैंने सपने में भी नहीं सोंचा था।

हर कुंवारे दिल की तरह मेरे भी कुछ सपने थे। कोई राजकुमार मेरा पति होगा , जो मुझे जमीन पर पांव भी न धरने देगा, मेरे नाज नखरों को बर्दाश्‍त करेगा। मुझे नई नई जगहों पर घुमाएगा, फिराएगा, मैं नए स्‍टाइल के रंग बिरंगे कपडों और गहनों से सुसज्जित रहा करूंगी। मैने कुछ गलत भी तो नहीं सोंचा था , बचपन से ही पिताजी को मां की हर इच्‍छा पूरी करते पाया था। मां के मुंह से कुछ निकलने भर की देर होती , चाहे वो कपडे गहने हों, सौंदर्य प्रसाधन हों या घर गृहस्‍थी का समान, पापा को उसे खरीदने में थोडी भी देर नहीं होती। यहां तक कि मम्‍मी की हर इच्‍छा पापा इशारे सेसमझ जाते। बाजार में आयी नई से नई चीज भी हमारे घर में मौजूद रहती। पापा सिर्फ मम्‍मी की ही नहीं, हम दोनो भाई बहनों की भी इच्‍छा पूरी करते। शहर के स्‍तरीय स्‍कूल में हमारी शिक्षा पूरी हो रही थी और मम्‍मी पापा के सपने हमारे लिए बहुत ऊंचे थे। बेटा अफसर बनेगा और बेटी राज करेगी। पर्व, त्‍यौहार और छुट्टियों में हम सभी घूमते फिरते , बाजार करते , पिक्‍चर देखते और होटल से खाना खाकर ही घर लौटते थे। मम्‍मी के भाग्‍य से पडोसिनों को ईर्ष्‍या होती थी।

पापा की कमाई भी बहुत अधिक थी , ऐसी बात नहीं थी। वे भी एक बडे व्‍यवसायी नहीं , ईमानदार सरकारी अफसर ही थे। पर नौकरी करनेवालों को तनख्‍वाह तो इतनी मिल ही जाती है कि नियोजित परिवार आराम से गुजर बसर कर सके। परिवार के किन्‍हीं अन्‍य लोगों का दायित्‍व पापा पर नहीं था। दादाजी का पेंशन दादा जी और दादी जी के गांव में गुजारे के लिए काफी था। हमारे लिए गांव से भी आवश्‍यकता के बहुत सामान आ जाया करते थे। पापा और मम्‍मी दोनो ही खाओ पीओ और मौज करो’ के सिद्धांत पर विश्‍वास रखते थे। उनके विचारों का पूरा प्रभाव हम दोनों भाई बहनों पर भी पडा थी। हम दोनो खाने पीने के शौकीन नित्‍य नए नए व्‍यंजनों की फरमाइश करते और जो घर पर नहीं बन पाता , उसे खाने होटल में चल दिया करते थे। इसी प्रकार हम पहनने ओढने के लिए नए डिजाइन और फैशन के कपडों का चुनाव करते और मम्‍मी पापा उन कपडों को खरीदते हुए उनके चुनाव की प्रशंसा करते। छुट्टियों में भी हम लोग बडे उत्‍साह से घुमने फिरने का कार्यक्रम बनाते और इसमें भी उनका पूरा सहयोग मिलता। ऐसी हालत में हमलोग पढाई में कब सामान्‍य से अतिसामान्‍य होते चले गए , इसका किसी को ध्‍यान भी नहीं रहा , विशेष की तो महत्‍वाकांक्षा भी नहीं थी। सिर्फ अच्‍छे स्‍कूल में एडमिशन करवाकर और समय पर फी देकर मम्‍मी पापा अपने कर्तब्‍यों की इतिश्री समझते रहे।

जैसे ही मैंने बी ए की परीक्षा दी , मेरे विवाह की चर्चा जोर शोर से शुरू हुई। शीघ्र ही एक घर वर पापा को पसंद आ गया और मेरी शादी पक्‍की हो गयी। पढाई लिखाई के क्षेत्र में आगे कुछ कर पाने की क्षमता तो मुझमें थी नहीं, शीघ्र ही विवाह के लिए तैयार हो गयी और एक माह के अंदर दुल्‍हन बनकर ससुराल आ गयी। सिद्धांत भी उसी की तरह अपने घर का इकलौता था , विवाह में दोनो परिवार का उत्‍साह देखने लायक था। विवाह के कुछ दिनों बाद जब रिश्‍तेदारों की भीड छंट गयी , तो मैं सिद्धांत के साथ शहर आ गयी थी। पिताजी ने घर गृहस्‍थी बसाने के लिए जो भी उपहार दिए थे , सब मेरे साथ ही आ गए थे। पापा ने मेरी शादी में पूरा पी एफ खाली कर दिया गया था। जिस बेटी का पालन पोषण इतने नखरों के साथ किया गया था , उसके कपडे, गहने और गृहस्‍थी का अन्‍य सामान भी तो आधुनिकतम होने ही चाहिए। अपनी बन्‍नों की शादी में उन्‍होने कोई कसर नहीं छोडी थी। आखिर लडका भी तो उन्‍हें सर्वगुणसंपन्‍न मिला था। मम्‍मी और पापाजी की नजरों में पढा लिखा , सुंदर, शिष्‍ट , शालीन , चरित्रवान ,, सरकारी नौकरी करता हुआ अपने परिवार का इकलौता लडका था सिद्धांत।

विवाह के बाद बाजार से नई नई चीजें लाकर अपनी घर गृहस्‍थी को संवारने में मुझे बडा आनंद आता , पर शाम को घर आते ही सिद्धांत उन चीजों की प्रशंसा न कर व्‍यर्थ पैसे न बर्वाद करने की सलाह देते नजर आते। इससे कई दिनों तक मेरा मन उखडा रहता , पर आदतन फिर उत्‍साहित होकर बाजार करती और फिर नसीहत शुरू। कितनी कठिनाई से मैंने अपनी इस आदत पर काबू पाया था। उसके बाद तो बाजार में दिखाई पडनेवाली हर खूबसूरत वस्‍तु को देखकर सिर्फ मन मसोसकर ही रह जाती हूं। किसी पडोसन के घर नई टी वी , नए डिजाइन का फ्रिज या वाशिंग मशीन आया है , फोन लग गया है ... इस तरह की किसी भी चर्चा से सिद्धांत को सख्‍त नफरत है। इसमें से कुछ दिखावे की चीज है और कुछ शरीर को आलसी बनाने वाली। कभी कभी तो मैं रो ही पडती थी , पता नहीं लाड प्‍यार से पालन पोषण का यह चिन्‍ह था या मेरी उथली मानसिकता का।

पर दो वर्षों के अंतराल में मेरे दोनो बच्‍चों ने जन्‍म लेकर मेरी गोद खुशियों से भर दी थी। मेरे तो हर्ष का ठिकाना ही न था , सिद्धांत भी बडे उत्‍साहित थे। गर्भवती हालत में तो उन्‍होने मेरी देखभाल अच्‍छे से की ही , छोटे बच्‍चों की देख रेख में भी उन्‍होने मेरा पूरा हाथ बंटाया। इस कारण बच्‍चे तो खूबसूरत और तंदुरूस्‍त हुए ही , मेरा अपना स्‍वास्‍थ्‍य भी काफी अच्‍छा रहा। पर फिर भी वे मेरे दिल से अपने लिए कडुवाहट न निकाल सके। बच्‍चें की पढाई लिखाई पर भी पूरा ध्‍यान सिद्धांत ने ही दिया। शहर के सबसे अच्‍छे स्‍कूल में बच्‍चों का दाखिला और हर वर्ष कक्षा में अच्‍छे स्‍थान लाने का श्रेय सिद्धांत को ही जाता है। ऑफिस से आने के बाद दो घंटे बच्‍चों के साथ बैठकर उनकी समस्‍या सुलझाना वे नहीं भूलते। इसी कारण शाम को कहीं घूमने फिरने का भी कोई कार्यक्रम नहीं बन पाता। प्रारंभ में कभी कोई दंपत्ति घूमने आ भी जाते थे , पर धीरे धीरे उन्‍होने ये सिलसिला बंद ही कर दिया है। मनोरंजन , फिल्‍म , पर्यटन ... ये सब इनके लिए महत्‍वहीन है। बच्‍चों पर भी पिता के विचारों का पूरा प्रभाव है , यह सोंचकर मेरा क्षुब्‍ध और आशंकित रहा करना जायज भी था।

मुझे याद आया , एक शाम बच्‍चों ने जब नाश्‍ता मांगा था , मैंने फटाफट एक व्‍यंजन बनाया था। बच्‍चे खा ही रहे थे कि ये भी पहुंच गए थे। इनका हिस्‍सा भी निकालकर रख दिया था। बच्‍चों ने इतने चाव से नाश्‍ता किया कि मैं खुश ही हो गयी थी , मैने उनकी ओर भी प्‍लेट बढा दिया था और खुद भी खाने बैठ गयी थी। खाते हुए भी सिद्धांत की मुखमुद्रा गंभीर बनी रही , तो प्रशंसा सुनने की इच्‍छा से मैं पूछ बैठी .. ‘नाश्‍ता कैसा है ?’उन्‍होने उदासीनता पूर्वक जबाब दिया, ‘अच्‍छा है , पर बच्‍चों को ऐसी तली भूनी चीजें मत खिलाओ। उन्‍हें दूध में बनी या उबली चीजें ही खिलाया करो। इनका स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहेगा।‘ यह सुनकर मुझपर तो मानो वज्रपात ही हो गया था। जरूर इनकी कंजूसी की भावना ने ही ऐसा जबाब दिया है , मुझे याद आया , जब यह व्‍यंजन बनाना मैंने अपनी सहेली के यहां सीखा था , दूसरे ही दिन घर में इसे बनाने की इच्‍छा प्रकट की थी , मां ने अनुमति भी दे दी थी , पहली ही बार यह इतना स्‍वादिष्‍ट बना था , परिवार में सबने एक साथ बैठकर इस व्‍यंजन का मजा लिया था और यहां इसी व्‍यंजन को बनाने पर उन्‍होने प्रशंसा में एक शब्‍द भी नहीं कहा। उसके बाद मैंने कोई विशेष व्‍यंजन बनाना तक छोड दिया था।

मैंने फिर से घडी पर नजर डाला , साढे तीन बज गए थे। अभी तक उन लोगों के नहीं पहुंचने का अर्थ यह था कि गाडी थोडी लेट ही होगी। उस दिन मैं कितनी खुश थी , जब सिद्धांत ने उसे बताया था कि वह एक महीने के लिए ट्रेनिंग पर बाहर जा रहा है। मैंने सोंचा था , कुछ दिन तो अपने ढंग से जीने को मिलेंगे। सुबह 8 बजे उन्‍हें रवाना होना था , खुशी खुशी उनके जाने की तैयारी में लग गयी। कुछ सूखे नाश्‍ते साथ में पैक भी कर दिए थे और बढिया खाना खिलाकर उन्‍हें विदा किया था। कभी कभार तो ऐसा मौका मिलता है , वैसे तो घर के एक एक काम में इनकी निगाह रहती है ,हर बात में टोकाटोकी की आदत। आज रविवार था , बच्‍चे अपने कमरे में पढ रहे थे। उन्‍हें स्‍टेशन से छोडकर आयी तो घर में बिल्‍कुल शांति थी। एक महीने मैं अपने ढंग से घर चलाऊंगी , रसोई में जाकर सारे डब्‍बों को चेक किया , समाप्‍त हुए सामानों की लिस्‍ट तैयार की , पूरे महीने का मीनू तैयार किया , घूमने फिरने का कार्यक्रम बनाया , आज मेरा उत्‍साह देखते ही बनता था।

इस तरह के मौकों को मैं कभी भी बर्वाद नहीं करती थी। मेरे जीवन में पहली बार ऐसा मौका विवाह से पहले ही आया था। पंद्रह दिनों के लिए मममी और पापा हम दोनो भाई बहनों को छोडकर बाहर चले गए थे , हमारी परीक्षा का समय था , इसलिए छोडना उनकी मजबूरी थी। पढने की चिंता तो मम्‍मी और पापा को थी , हमने तो पुस्‍तकों को हाथ भी नहीं लगाया। कॉलेज की क्‍लासेज एटेंड करने के अलावे सारा दिन टी वी पर प्रोग्राम या फिल्‍में देखतें , शहर के मशहूर जगहों पर घुमते फिरते और कभी होटल तो कभी घर पर ही बनाकर नए नए व्‍यंजनों का आनंद लेते। हम दोनों ने सारे राशन और पैसे पंद्रह दिनों में ही खत्‍म कर दिए थे। फिर कभी कभी ऐसा मौका जीवन में आता रहा। सुखद कल्‍पना में खोयी, काम में व्‍यस्‍त कपडे लेकर गुसलखाने में जाने के लिए आंगन की सीढियां उतर ही रही थी कि मेरा पांव फिसल गया और मैं विचित्र ढंग से गिर पडी।



चीख सुनकर दोनो बच्‍चे दौडे हुए आए , गाडी मंगवाई और मुझे लेकर अस्‍पताल पहुंचे। दोनो पैरों में फैक्‍चर होने के कारण प्‍लास्‍टर के अलावे कोई उपाय न था। कई दिनों तक अस्‍पताल में रहने के बाद ही मैं वापस घर आयी। मैं तो भावना शून्‍य हो गयी थी। इस दौरान बच्‍चों से कई बार पापा को बुलाने को कहा , पर बच्‍चे पापा की ट्रेनिंग में कोई खलल नहीं डालना चाहते थे। उन्‍होने अपनी पढाई के साथ साथ घर की अन्‍य व्‍यवस्‍था किस प्रकार की , कम से कम मेरी समझ के तो परे था। 17 वर्ष की बेटी और 15 वर्ष के बेटे के क्रियाकलापों से तो मैं दंग ही रह गयी थी। मम्‍मी पापा जब हमें छोडकर गए थे तो मेरी उम्र 21 वर्ष और भैया की 19 वर्ष की थी , पर हममें कितना बचपना था और इन दोनो बच्‍चों का बडप्‍पन , दायित्‍व का बोध .. निश्‍चय ही सिद्धांत के लालन पालन के ढंग का परिणाम था। पहले की बात होती , तो मैं इस बात से कुढ ही जाती , पर इन एक महीने में मुझे पति की हर सीख का अर्थ समझ में आ गया था।

पति के व्‍यवहार से जब भी मैं क्षुब्‍ध होती , मन का बोझ हल्‍का करने के लिए अलका के पास पहुंच जाया करती थी। वह मेरी बचपन की एकमात्र सहेली थी , जो हमारे ही शहर में रहती थी , इस कारण उससे अभी तक मेरा संपर्क बना हुआ था। उम्र में एक होने के बावजूद वह विचारों से परिपक्‍व थी और हमेशा सही राय दिया करती थी। सिद्धांत की सारी शिकायतें सुनने के बाद भी वह स्थि‍रता से एक ही जबाब देती ... ‘शालू , तुम सिक्‍के के एक ही पहलू को देखा करती हो, जब तुम्‍हारे पति में कोई कमजोरी नहीं, तो व्‍यर्थ परेशान
रहती हो। अपने परिवार के लिए समर्पित पति पर व्‍यर्थ का दोषारोपण करती हो। अगर वो पैसे जमा करता है , तो तुम्‍ही लोगों के लिए न। जिस दिन तुम्‍हें सिक्‍के का दूसरा पहलू दिखाई पडेगा, तुम्‍हारे जीवन में सुख ही सुख होगा।‘ पर उस समय मेरी समझ में अलका की कोई बात नहीं आ सकी थी। भला तिल तिल कर मरने के बाद भी सुख नसीब होता है क्‍या ? तब मुझे क्‍या पता था कि सिक्‍के के दूसरे पहलू के दर्शन के लिए उनकी अनुपस्थिति में इतनी विषम परिस्थितियां उपस्थित हो जाएंगी।

अचानक ऑटो की आवाज सुनकर मेरी तंद्रा भंग हुई। तीनो ऑटो से उतरकर तेजी से मेरी ओर बढे। सिद्धांत को बच्‍चों से ही सारी बाते मालूम हो चुकी थी, सहानुभूति जताते हुए बोले .. ‘इतनी बडी बात हो गयी और तुमलोगों ने मुझे खबर भी नहीं की।‘ ’बच्‍चों ने मेरी बात नहीं मानी, मैने उन्‍हें आपको खबर करने को कहा था।‘ मैने शांत होकर कहा। ’बच्‍चे तुम्‍हारी बात कहां से मानेंगे, कभी मैने मानने ही नहीं दिया।‘ बरामदे में पडी कुर्सी पर बैठते हुए उन्‍होने बच्‍चों की ओर देखा। ’अच्‍छा किया , जो आपने उन्‍हें मेरी बात मानने नहीं दी , मेरी बात मानकर बच्‍चे बर्वाद ही हो जाते। मैने सोंचा भी नहीं था कि आपके पालन पोषण का ढंग इन्‍हें इतना परिपक्‍व बना देगा। इनके एक महीने के क्रियाकलाप से न सिर्फ मैं , वरन् मुझे देखने के लिए यहां आने जाने वाले हर व्‍यक्ति प्रभावित हुए है। इन्‍होने मुझे कोई दबाब न देते हुए मेरे इलाज से लेकर घर गृहस्‍थी तक का काम कुशलता पूर्वक संभाला है, इसका श्रेय सिर्फ आपको जाता है, पर मैने आपको हमेशा गलत समझा, इसका मुझे अफसोस है‘ मेरा स्‍वर भर्रा गया। ’अब बस भी करो मम्‍मी, सुबह का भूला शाम को वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते।‘ मेरे द्वारा अपनी गल्‍ती स्‍वीकार किए जाने से बेटी ऋचा आज बहुत खुश थी। ‘उसे तो पाया कहते हैं’ दीदी की हर बात की टांग खींचने वाले ऋषभ ने शैतानी से कहा। और फिर तीनो हंस पडे। उन तीनों की हंसी में आज पहली बार मैं भी शामिल हो गयी।

Friday, 21 January 2011

एक झूठ ( कहानी ) ..... संगीता पुरी


जब ब्‍लॉग जगत में आयी थी तो मैने सिर्फ 'गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष' नाम का अपना ब्‍लॉग बनाया था और उसमें  ज्‍योतिषीय लेख ही  पोस्‍ट किया करती थी। डायरी में कुछ पुरानी कहानियां लिखी पडी थी , ज्‍योतिषीय ब्‍लॉग में उसे पोस्‍ट करना अच्‍छा नहीं लगा। एक दिन साहित्‍य शिल्‍पी पर निगाह पडी तो उन्‍हें ही अपनी सारी कहानियां प्रकाशित होने के लिए भेजती गयी। 'गत्‍यात्‍मक चिंतन' बनाने के बाद कई बार इच्‍छा हुई कि मैं अपनी कहानियों को इसमें पोस्‍ट कर दूं , पर किसी न किसी कारणवश टालती रही। आज मेरे जीवन की पहली कहानी ' एक झूठ' आप सबों के समक्ष प्रस्‍तुत है .....

अनेक प्रकार की चिन्ताओं में डूबी, मन के उथल पुथल को शांत करने की असफल चेष्टा में वह उस रास्ते में चलती ही जा रही थी, जो उसके लिए नितांत अपरिचित था। इस रास्ते में चलते लोग, रास्ते के दोनो ओर बनी गगन चुंबी इमारतें , यत्र तत्र दिखाई देते पुराने घने ऊँचे-ऊँचे वृक्ष, अपरिमित रोशनी देते स्ट्रीट लाइट के बडे बडे खम्भे सभी अपरिचित होते हुए भी उसके कदमों को रोकने में असमर्थ थे। यूं तो वह इस शहर में पहले भी आ चुकी थी, पर वह इस शहर का कौन सा हिस्सा था , उसे बिल्कुल भी याद न था। शीत ऋतु की इस प्यारी सी गोधूलि बेला का रूप देखकर वह तो दंग ही रह गयी थी। इस बेला में गाँव में जहां सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा रहता है , मनुष्य तो मनुष्य पशुपक्षी और अन्य जीव जंतु भी अपने अपने घर में दुबके पडे होते हैं , यहां दीपावली की सी रौनक नजर आ रही थी। 


रोशनी की ओर जैसे ही उसके कदम बढे , उसने अपने आपको एक खूबसूरत सजे धजे बाजार में पाया। बाजार में फैला प्रकाश इस बेला मे भी लोगों को काम करने का संदेश दे रहा था। हर ओर ग्राहको की भीड थी। कई राशन खरीद रहे थे , तो कई सब्जियां , कई बरतन तो कई खिलौने , कई कपडे तो कई गहनें। कुछ औरतें सौंदर्य प्रसाधन खरीदनें में व्यस्त थी। लेकिन इस भीड भरे वातावरण में उसे सिर्फ अपनी ही चिंता थी। वह करे तो करे क्या? जाए तो जाए कहां? कुछ न सोच पाने के बावजूद वह चलती ही जा रही थी। उसके कदम एक पल को भी रूके न थे। उसने अनुमान किया, मेले से बस स्टैंड और बस स्टैंड से इस बाजार तक आने में उसने चार पांच किमी की दूरी तय कर ली थी। उसके कदम बोझिल हो गए थे, पर एक आध घंटे विश्राम के लिए वह कोई भी जगह निश्चित नहीं कर पा रही थी। ऐसी वैसी जगह बैठ जाए, तो लोगों की संदेहात्मक दृष्टि का सामना करना पड सकता है। इसी से बचने के लिए वह चेहरे पर भय की भी रेखा आने नहीं देना चाहती थी, पर परेशानी के भाव चेहरे पर बार बार उपस्थि‍त होकर उसके आत्म‍विश्वास को कम करने का पूरा प्रयास कर रहे थे। 

अत्यधिक जिद का क्या नतीजा होता है, यह आज ही उसने जाना था। बचपन से अभी तक माता पिता और अन्ये परिवार जनों द्वारा मिलनेवाला लाड-प्यार इसे इस हद तक जिददी बना देगा, किसी ने सोचा भी न था। मनमौजी बच्चे भी समय के साथ साथ सुधर ही जाते हैं , ऐसी ही सोच के कारण माता पिता ने उसे फटकारा भी न था। यही कारण है कि उसकी जिद की प्रवृत्ति बढती ही जा रही थी। उसे याद है, उसके माता पिता ने कितनी ही बार उसे समझाया था ‘ बेटे , तुम लडकी हो। हमारा समाज लडके और लडकियों को भेदभाव वाली नजर से देखता है। तुम अपनी आदतें सुधार लो। यह जिदद करने की तुम्हारी आदत अच्छी नहीं।‘ किन्तु उसके दिमाग में तो बचपन से बैठायी गयी बातें ही गूंजती रहती थी ‘तुम मेरे लिए बेटा से कम नहीं हो’ पिताजी बचपन में ये बातें गर्व से कहा करते, जब वह लडकियों की तरह गुडियों और घरौंदो से न खेलकर लडको की तरह ही बंदूको एवं मशीनरी सामग्रियों को तोडकर खेला करती थी। उस समय तो पिताजी उसकी पीठ थपथपाकर कहा करते थे ‘ यह हमारा नाम रोशन करेगी’ पिताजी की इसी शाबाशी के कारण ही तो उसने अपने को कभी लडकी समझा ही नहीं। वह बडे होने के बाद भी लडको की तरह ही खेल में व्यस्त रहती।


उसके साथ पिताजी के इस व्यवहार का कारण भी स्पष्ट था। पिताजी और माँ के विवाह के तुरंत बाद ही माँ के गर्भ में आए उसे तीन माह भी नहीं हुए थे कि माँ की तबियत असामान्य हो गयी थी। बहुत मुश्किल से दवाइयों, टानिको, फल मेवों और छह महीने के उचित देखभाल के बाद ही मां की जान बची थी और बडे आपरेशन से ही उसका जन्म हो पाया था। जन्म के बाद भी कई तरह की उलझनें उपस्थित हो गयी थी, जिसके कारण डाक्टर ने दूसरा बच्चा न होने के लिए मां और पिताजी को सख्त हिदायत दे दी थी। उसके जन्म के पांच छ: महीनें बाद ही मां सामान्य हो सकी थी। उस समय तक पिताजी ने उसकी देख रेख में कोई कसर नहीं छोडी थी। यूं तो उसके लिए बाई की भी व्यवस्था की गयी थी पर अपने को संतुष्ट करने के लिए पिताजी बहुत से काम खुद ही किया करते थे। इसके लिए उन्हें आफिस से भी इतनी छुटिटयां लेनी पडी थी कि उनकी नौकरी पर भी संकट आ गया था, पर शीघ्र ही न सिर्फ नौकरी ही बची, वरन बहुत जल्द प्रोमोशन के साथ अपने गांव में ही स्थानांतरण भी हो गया। इस दैवी कृपा का सारा श्रेय उसे ही दिया गया और एक वर्ष तक इतने कष्ट देने के बावजूद उसे ’लक्ष्मी’ संबोधन से संयुक्त किया गया। लेकिन पुत्र न हो पाने की कसक ने भरतीय मानसिकता से संयुक्त मां पिताजी को उसे बेटे की तरह पालने को मजबूर कर दिया और वह बेटी होते हुए भी बेटा बन गयी। 

लेकिन गाँव के माहौल में जहां लडकियाँ थोडी बडी होने के बाद ही घरेलू बनकर कामकाज करना आरंभ कर देतीं हैं, पढाई के साथ साथ अपने को सिलाई, बुनाई, कढाई, पेण्टिंग्स एवं अन्यं स्त्रियोचित कलाओं में दक्ष बनाने की चेष्टा में लग जाती हैं, छठी कक्षा में पहुंचने और 10 वर्ष की उम्र पार करने के बाद भी कन्या सुलभ चेष्टाओं को उसमें न विकसित होता देख उसकी मां परेशान थी। जब वह अपने को लडकी मानने को तैयार ही नहीं होती, तो मां प्यार से उसे कई तरह की बातें समझाना शुरू करती, पर उसके कानों में जूं भी न रेंगती थी।


सचिन तेंदुलकर की वह फैन थी। पिछले ही वर्ष उसके इस शहर में आने की सूचना उसकी कक्षा के अन्य छात्रों को मिली। जिस गेस्ट हाउस में उसके ठहरने का इंतजाम हुआ था, उसके एक कर्मचारी उसकी दोस्त के नजदीकी रिश्तेदार थे। कक्षा की कई छात्राओं ने सचिन से मिलने का प्रोग्राम बनाया। वह कहां पीछे रहनेवाली थी, झट उसमें शामिल हो गयी। 10 बजे उसके स्कूल की घंटी बजती थी। उसी समय गांव से शहर जाने के लिए एक बस खुलती थी। शाम 4 बजे उसका स्कू्ल बंद होता था, उसी समय शहर से बस गांव पहुंच जाती थी। गांव का सरकारी स्कूल था, बच्चों के लिए एक दो दिनों तक अनुपस्थित रहना आम बात थी। उस दिन नियत समय पर सभी जमा हुई, गांव से शहर पहुंची, बस स्टैंड से गेस्ट हाउस। कल्पना तो थी कि सचिन से ढेर सारी बातें करेंगी, पर सिर्फ आटोग्राफ से ही संतुष्ट होना पडा। वापस बस में पहुंची, फिर गांव, घर बस्ता लेकर इस प्रकार आयी मानो स्कू्ल से ही वापस आयी हो। पर मां को पता नहीं कैसे खबर लग चुकी थी, उन्होने समझाना शुरू किया और वह आदतन एक कान से सुनती और दूसरे कान से निकालती चली गयी। आज जब उसे शहर से गांव वापस जाने के लिए बस नहीं मिली , तब उसे पता चला कि उसने गांव से शहर वापस आकर कितनी बडी गलती की है। और कुछ सहेलियां रहती, तो कोई उपाय भी हो सकता था, पर अकेले एक लडकी………………।


आज लडकी होने के अहसास मात्र से मन में उपजा भय सारे वातावरण को डरावना बना रहा था। हुआ यूं कि कल उसकी दो तीन सहेलियां शहर में लगे मेले को देखने आयी थी। उन्होने मेले की इतनी तारीफ की कि उसका मन भी मेले को देखने के लिए उत्कंठित हो उठा। उसने कई सहेलियों को पूछा, पर उसका साथ देने को कोई भी तैयार नहीं हुई। शहर जाना और वहां से लौटना तो बिल्कुल ही आसान है, पिछली बार उसने यह महसूस किया था, इसलिए आज सुबह स्कूल में अपना बस्ता सहेलियों को सौंपकर वह झट से शहर जाने वाली बस में बैठ गयी थी। लडकियों ने उसे अकेले शहर जाने से मना भी किया, पर उसके दिमाग में जो बातें आ गयी, उसे पूरा करने की जिद ने उसे शहर जानेवाली बस में अकेले ही बैठा दिया। पाकेट खर्च के दो सौ रूपए उसके पास थे, जो मेले देखने के लिए काफी थे। लौटती बस में वापस आने के लिए जब वह स्टैंरड पहुंची, तो मालूम हुआ, बस बारात के लिए बुकिंग में चली गयी है। गांव के लिए और कोई दूसरी गाडी नहीं थी, यह जानकर उसके पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गयी। 

एक परिचित सा चेहरा नजर आते ही उसकी विचारों की तंद्रा भंग हुई। परेशानी के कारण वह उन्हें पहचान भी नहीं पा रही थी, पर उन्हें बार बार अपनी ओर देखता देख अपने दिमाग पर जोर डाला। अचानक ही उसे याद आया, उसने हाथ जोड नमस्ते की और कहा ‘आप जायसवाल जी हैं न। मै घनश्यासमदास जी की पुत्री किरण’ ‘हां हां’ उन्होने अभिवादन का जवाब देते हुए पूछा ‘तुम यहां कैसे?’ शाम के साढे सात बजे थोडे परिचित व्यक्ति को देखकर उसके खुशी की सीमा न रही। इतनी देर में तो उसने बाजार का कई चक्कर लगा लिया था। उसने जल्दी जल्दी अपनी सारी कहानी सुना दी। जायसवालजी के चेहरे पर जाने कितने भाव चढते उतरते नजर आए, जो कि उसकी समझ से परे थे। उन्होने स्कूटर स्टार्ट की, उसे बैठाया और अपने घर की ओर चले। सारे रास्ते उन्होने कोई बातचीत भी नहीं की। शायद उसके कारनामों से उन्हें दुख पहुंचा हो, पर उसे इसकी कोई परवाह नहीं थी। ये उसे अपने घर ले जा रहे हैं, वहां उनके घरवालों के साथ उसे रात बिताने को जगह मिल जाएगी, सुबह ही वह वापस अपने घर चली जाएगी, उसकी अपनी सारी परेशानी छूमंतर हो गयी। 


उसे अब चिंता थी तो सिर्फ अपने मां पिताजी की। जब उसकी सहेलियां उसका बस्ता ले जाकर उन्हें देंगी और कहेंगी कि वह मेला देखने अकेले ही गयी है, मां पिताजी को मालूम होगा कि बस आज लौटकर वापस नहीं आएगी, तो वे कहां ढूढेंगे उसे? मां पिताजी के बारे में सोंचते ही वह परेशान हो गयी। गांव में फोन की सुविधा होती तो फोन ही कर देती उन्हें। मां पिताजी रात कैसे व्यतीत कर पाएंगे, वह तो उनके यहां जाकर आराम से खा पीकर सो जाएगी। मन ही मन माफी मांगकर उसने अपने आप को शांत किया। पश्चाताप के आंसू गालों पर लुढक पडें। 

छोटा छोटा परिचय भी कभी कभी कितना काम आता है, वह आज ही महसूस कर रही थी। ये जायसवालजी पिताजी के किसी दोस्त के रिश्तेदार थे। उन्होने अपने रिश्ते दार से पिताजी की कुछ कविताएं मांगकर पढी थी। वे पिताजी के लेखन से काफी प्रभावित हुए थे। बाद में उन्होने अखबार में प्रकाशित पिताजी की कविताओं को काट काटकर संकलित भी किया था। एक बार फुर्सत में वे पिताजी से मिलने उसके घर पर भी आए थे। उस दिन जब वह स्कूल से घर लौटी थी, बैठक में ही इनको पाया था। पिताजी ने उनका उससे परिचय करवाया था। फिर चाय नाश्ते वगैरह लेकर एक दो बार बैठक में वह पहुंची तो नजर उनके गंभीर चेहरे पर पडी थी। चेहरे में वही गांभीर्य आज भी नजर आ रहा था, जबकि उम्र 35 के अंदर की ही थी। वे इसी शहर में रहते थे। अचानक स्कूटर बंद हुआ और वह उतर गयी। उन्होने स्कूटर गैरेज में रखा और सीढियों से अपने फलैट की ओर बढें।


छोटे शहरों में भी आजकल जगह की कमी के कारण मकान मालिकों ने पैसे कमाने का एक अच्छा तरीका ढूंढ निकाला है। वे एक बडी इमारत में एक एक कमरे रसोई और बाथरूम को अलग अलग करते हुए फलैट बनाकर किराए पर लगा देते हैं। इससे उन्हें एक अच्छी रकम किराए के रूप में मिल जाती है। तीनमंजिला तीस फलैटों वाली इमारत थी ये। सबसे उपरी मंजिल पर सीढियां खत्म होते ही जायसवाल जी का दरवाजा आ गया। उन्होने जेब से चाबी निकाला और दरवाजा खोलने लगे। देखते ही उसके होश उड गए। ‘घर पर और कोई नहीं है क्या’ उसके मुंह से अनायास ही ये शब्द निकले। अंदर आने के बाद उन्होने कहा ‘पांच वर्ष पहले ही मेरी शादी हुई थी, पर तीन चार महीने बाद ही पत्नी मायके चली गयी। कुछ ही दिनों में मेरा उससे तलाक हो गया।‘ कारण पूछने पर उन्होने स्पष्ट कहा ‘उसे मेरे चरित्र पर संदेह था’ उसकी नजर घडी पर पडी। 8 बज रहे थे। वे बाजार से लाए सामानों को लेकर रसोई में चले गए। चाय बनाया और एक प्‍याला उसे भी थमा दी। शाम से ही वह इतनी परेशान थी कि चाय उसे अमृत की तरह लग रहा था, पर जायसवाल जी के घर में किसी और को न देखकर उसका मन पुन: अशांत हो गया। ये क्या, 'आकाश से गिरे खजूर पर अटके' वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। उसका मन हुआ, जाकर कुछ मदद करे उनकी, पर हिम्मत रसोई में जाने की न हुई। अकेले उनके साथ रात कैसे व्यतीत करेगी, सोच सोचकर मन परेशान था।


वैसे तो उसकी उम्र काफी कम थी, अभी अभी उसने अपना तेरहवाँ जन्मदिन मनाया था, पर मां पिताजी और परिवार जनों के प्यार दुलार और खिलाने पिलाने की विशेष व्‍यवस्था से उसके स्वस्थ शरीर में इतना निखार आ गया था कि देखनेवालों को उसकी उम्र का सही अंदाजा भी नहीं लग सकता था। अपनी सारी सहेलियों की तुलना में वह काफी बडी दिखाई देती थी। इधर एक दो वर्षों में शरीर की बढोत्तरी के साथ साथ दिमाग में भी बहुत सारी बातें आ गयीं थीं। कुछ पिक्चर, कुछ घटनाएं, कुछ सखी-सहेलियो और कुछ कहानियों से युवावस्था, सेक्स, स्त्री-पुरूष संबंधों के बारे में काफी कुछ समझ में आ गया था। हालांकि जायसवाल जी उसके सामने काफी बुजुर्ग थे और उसने उनकी आंखो में ऐसा कुछ भी नहीं देखा था कि उन पर शक किया जाए, पर उनकी पत्नी, उसने इनके चरित्र पर शक क्यो किया, फिर इतने दिनो से ये क्वारें क्यो बैठे हैं, मन में ऊल-जुलूल बाते घूम रही थी। कई घटनाओं में एकांत मिलने पर मर्दों को सीमाओं का उल्लंघन करते उसने पाया था। मर्दों की उम्र के बारे में भी कहना बहुत मुश्किल है, क्योंकि गांव के एक अंकल, जिनकी उम्र किसी भी हालत में 35 से कम की नहीं होगी, उसके साथ पढनेवाली लडकियों को इस निगाह से देखते हें कि उन लोगों ने उस रास्ते से गुजरना ही छोड दिया है। दिन तो फिर भी किसी के साथ व्यतीत किया जा सकता है, पर रात इस एक कमरेवाले स्थान में एक अजनबी पुरूष के साथ………..उसे मां की समझायी हुई बातें याद आने लगीं। लडकियों की सबसे कीमती चीज का अर्थ अब समझ में आ गया था। इज्जत खोने के बाद सही में जिंदगी नर्क ही हो जाती होगी, वह क्या करे अब? कैसे बचाए अपने आपको? 

उसने खिडकी से बाहर देखा। चारो ओर की बत्तियां बुझनी शुरू हो गयी थी। सामने झिलमिल करती एक बडी सी इमारत नजर आयी, चारो ओर रोशनी बिखेरती, यह तो कोई सिनेमाहाल नजर आ रहा है, उसने सोचा। सामने ही चमकदार अक्षरों में लिखा था ‘नीलकमल’ उसे जाना पहचाना सा महसूस हुआ। अरे, इसी सिनेमाहाल के बगल में तो एक चाचाजी रहते हैं। दो साल पहले एक स्कूल में प्रवेश के लिए परीक्षा देने जब वह शहर आयी थी, तो उनके घर में ही तो ठहरी थी। चाचाजी तो बहुत मिलनसार किस्म के थे ही और उनके बेटे बंटी और बेटी पिंकी सब दो दिनों में ही तो उनके दोस्त बन गए थे। उसका मन खुशी से झूम उठा। वह वहीं चली जाएगी। वहां वह आराम से रात व्यतीत कर सकेगी। उसे वहां कोई परेशानी भी नहीं होगी। उसने रसोई में जाकर जायसवालजी से कहा ‘मै अपने एक संबंधी, जो बगल में ही रहते हैं, के यहां जा रही हूं। वहां से सुबह अपने गांव चली जाउंगी।‘ मै छोड आउं‘ उन्होने पूछा। ‘नहीं, नहीं, मैं आराम से चली जाउंगी’ उसने निश्चिंत होकर कहा। वह बाहर निकलकर तेजी से चलती हुई उस सिनेमाहाल के मेन गेट पर पहुंच गयी। 


इवनिंग शो तुरंत ही छूटा था और नाइट शो की शुरूआत होने ही वाली थी। इसलिए उतनी रात गए भी सडक पर अच्छी चहल पहल थी और इसलिए उसे किंचित मात्र को भी भय नहीं हुआ। हाल के मेन गेट पर पहुंच जाने के बाद उसे चाचाजी के यहां जाने का रास्ता भी आसानी से मिल गया। गेट पर पहुंचते ही वह खुशी से पिंकी पिंकी चिल्लाने का दुस्साहस कर बैठी। पर यह क्या? एक मोटे और नाटे व्यक्ति ने दरवाजा खोला। ‘क्या है रे!‘ उस मोटे व्यक्ति ने पूछा। उसकी तो जबान ही नहीं खुल रही थी, पर हिम्मत जुटाकर पूछा ‘पिंकी है’ ‘यहां कोई पिंकी नहीं रहती। मै यहां छह महीनों से रह रहा हूं।‘ उसने जवाब दिया। बगल में चंदा आंटी रहती थी, उसे याद आया, उसने घंटी बजायी, अंकल आण्टी बाहर निकले। ‘आण्टी मै किरण, कल्याणपुर से आयी हूं। पिंकी की बहन’ आण्टीं ने दिमाग पर जोर डाला, पर दो वर्षों का अंतराल, मात्र एकाध घंटे की भेंट और उसके कद काठी में आया परिवर्तन , वह पहचान न सकी। ‘मै अकेली हूं। कृपया रात गुजारने की जगह दे दो’ उसने फिर विनती की। अंकल ने कहा ‘अरे चलो! घर बंद करो। शरीफ घर की लडकियां इतनी रात गए बाहर रहती हैं क्या? आजकल बदमाश लडकियों का गिरोह शहर आया हुआ है। शरीफ बनकर घरों में घुसकर चोरियां, डकैतियां करवाती हैं’ खट के साथ दरवाजा बंद हुआ, जिसकी चोट दिल और दिमाग दोनो को ही लगी। थकहारकर उसने वापस अपने कदम जायसवाल जी के फलैट की ओर बढाए। रात्रि के साढे नौ बज चुके थे। रास्ता अब सुनसान हो चुका था। सन्नाटा ही सन्नाटा नजर आ रहा था। अभी के हालात में सबसे सुरक्षित स्थान जायसवालजी का फलैट ही था, पर वहां भी तो………………….

सोच सोच कर दिमाग और चलचलकर पांव थक गए थे। मेले में भी तो उसने कम शरारतें नहीं की थी। जिन जिन चीजों की प्रशंसा उसने अपनी सहेलियों से सुनी थी, सबकुछ देखा, खाया और आनंद लिया था। अब उसके शरीर को आराम की सख्त जरूरत थी, पर उस फलैट में भी उसे आराम नसीब होगा या नहीं, सोच कर मन परेशान था। इस भवंर से निकलने का रास्ता ढूंढने में उसका दिमाग तेजी से काम कर रहा था, पर कोई उपाय नजर ही नहीं आ रहा था। उसका दिल हुआ, जोर जोर से रोए, पर उसके आंसू पोछनेवाला भी कोई नहीं था। क्या ही अच्छा होता, अगर पिताजी यहां पहुंच गए होते। पिताजी की उपस्थिति में किसी की हिम्मत नहीं थी उसे नजर उठाकर भी देखने की। आज उसे पिताजी की बेइंतहा याद आ रही थी। काश, उसे ढूंढते हुए पिताजी यहां पहुंच जाते।


हां पिताजी, आजतक छोटी मोटी समस्या्ओं से ही उन्होने ही मुक्ति दिलायी है। ‘पिताजी तो पहुंच ही सकते हैं’, उसने सोंचा और उसके चेहरे पर चमक आ गयी। उसके कदम तेजी से जायसवाल जी के फलैट की ओर बढे। हाथों ने घंटी बजायी। दरवाजा खुला। जायसवालजी के आंखों में कई प्रश्न तैर रहे थे। ‘मेरे रिश्तेदार ने डेरा बदल लिया है। पर मैने वहां जाकर बहुत अच्छा किया। मुझे ढूंढते हुए पिताजी वहां पहुंच गए हैं। मुझे देखकर काफी खुश हुए। उनके पडोस में पिताजी का खाना बन रहा है। पिताजी जब पिछली बार यहां आए थे, तब उन्होने पिताजी की कविताएं सुनी थी। आज भी वहां ऐसी ही चर्चा चल रही है। पिताजी को मैने आपके फलैट के बारे में बता दिया है। उन्होनें मुझे यहां भेज दिया । वे यह जानकर बहुत खुश हुए कि मै आपके पास सुरक्षित पहुंच गयी।‘ इतना सारा झूठ एक सांस में अच्छी तरह बोलने के बाद उसके चेहरे का सारा तनाव दूर हो गया। उसने इतनी सफाई से झूठ बोला था कि जायसवाल जी भी अविश्वास न कर सके। उन्होंनें दो प्लेट में खाना निकाला। खुद भी खाए, उसे भी खिलाया। खाना खाने के बाद उसने एक लिहाफ मांगा और सोफे पर ही निश्चिंति से लुढक गयी।  

सुबह जब नींद खुलेगी, मालूम होगा, जायसवाल जी ने रात भर पिताजी का इंतजार किया है। दैनिक क्रियाकर्मो से निवृत होकर वह जल्द ही बाहर आटो पकडेगी और बस स्टैंड पहुंच जाएगी। मात्र एक झूठ से उसके दिमाग की सारी हलचल समाप्त हो गयी थी और दिमाग के अंदर बैठ गयी थी एक सबक, अब वह बडे बुजुर्गों के सीख का आदर करेगी। अपने घर सकुशल पहुंचने की कल्पना मात्र से उसकी सारी थकावट दूर हो गयी और वह कब नींद के आगोश में समा गयी, उसे मालूम भी न हो सका। 

Friday, 5 March 2010

आज आप साहित्‍य शिल्‍पी में प्रकाशित मेरी नई कहानी 'कलियुग का पागल बाबा' पढें !!

आज मेरी एक कहानी 'कलियुग का पागल बाबा' साहित्‍य शिल्‍पी में प्रकाशित की गयी है। इस कहानी में एक ज्ञानी पुरूष को वर्तमान परिस्थितियों से जूझते हुए दिखाया गया है। इसको पढकर डॉ अरविंद मिश्रा जी ने मुझे मेल किया ....

आपकी कहनी साहित्य शिल्पी पर पढी -
मेरा कमेन्ट वहां पोस्ट नहीं हो पा रहा है -
बहुत  अच्छी कहानी !संगीता जी कहानी बहुत अच्छी लिख लेती हैं -यह तो उनके  खुद के व्यक्तित्व के द्वंद्व की कहानी है ! 
पेज का दाहिना हाशिया लेखके भाग पर आ गया है -उनसे बोले!


मैं उतना ज्ञानी कहां , इसपर मेरा जबाब था ....

धन्‍यवाद .. सैकडों वर्षों से कितने लोगों के व्‍यक्तित्‍व में यह
द्वन्‍द्व रहा होगा .. दो पीढियों से मैं अपने ही घर में देख रही हूं ..
और आगे भी चलता रहेगा शायद .. मैने ये कहानी तब लिखी थी .. जब ज्‍योतिष
में मेरा पदार्पण नहीं हुआ था .. पिताजी द्वारा कई प्रकार की चर्चा किए
जाने से दिमाग में ये बात आ गयी थी .. और ये कहानी बन पडी थी। बस
प्रकाशित करने से पहले इसका अंतिम वाक्‍य लिखकर कहानी को सकारात्‍मक मोड
दिया गया है !



इस कहानी के साथ ही साहित्‍य शिल्‍पी में मेरी सात कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं .....


कलियुग का पागल बाबा 
सिक्‍के का दूसरा पहलू 
दूसरी हार
थम गया तूफान 
मिथ्‍या भ्रम
पहला विरोध
एक झूठ 

ब्‍लॉग में से विजेट्स को हटाने का जो काम शुरू किया था , वो अभी भी जारी है। इसलिए कुछ अन्‍य महत्‍वपूर्ण आलेखों के लिंक्स इसी पोस्‍ट में डालकर इस पोस्‍ट का लिंक साइडबार में लगाने की इच्‍छा है , इसी क्रम में 'मां पर प्रकाशित मेरे दोनो आलेखों को देखें ....
 
दुनिया का सबसे आसान शब्‍द है मां  
प्रकृति इन मांओं के साथ अन्‍याय क्‍यूं कर रही हैं 


'फलित ज्‍योतिष : सच या झूठ' में प्रकाशित मेरे आलेख....




क्‍या है गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष