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Wednesday, 6 May 2020

ये जादू भी न .. कम मजेदार कला नहीं

Jadu sikhne ka tarika in hindi

ये जादू भी न .. कम मजेदार कला नहीं

कल मुझे अलबेला खत्री जी की टिप्‍पणी मिली है , जिसमें उन्‍होने लिखा है कि मैं सभी पाठकों को ज्‍योतिषी बनाकर ही छोडूंगी। यह बात पहले भी कई पाठक कह चुके हैं। सभी पाठकों को ज्‍योतिषी बनने में भले ही कुछ समय और लगे , पर देर से ‘गत्‍यात्‍मक ज्‍योतिष’ में पदार्पण करनेवाले अलबेला खत्री जी सबसे पहले ज्‍योतिषी बन चुके हैं , क्‍यूकि कल उनके द्वारा की गयी भविष्‍यवाणी बिल्‍कुल सही हुई है। मुझसे उन्‍होने पूछा है कि मैं जादूगर तो नहीं ? तो पाठकों को मैं बताना चाहूंगी कि अपने जीवन में कुछ दिनों तक जादू दिखाने का भी चस्‍का रहा मुझे। अपने जादू दिखाने की लिस्‍ट में से सबसे आसान और सबसे कठिन जादू के ट्रिक आपके लिए पेश कर रही हूं। आप भी ऐसी जादू कर सकते हैं।

सबसे आसान जादू को दिखाने से पहले तैयारी के लिए आपको अपने रूमाल के किनारे मोडे गए हिस्‍से में सावधानीपूर्वक एक माचिस की तिली डालकर छोड देनी है। जहां दो चार दोस्‍त जमा हों , वहां आप जादू दिखाने के लिए अपने उसी रूमाल को बिछा दें। अपने किसी दोस्‍त को उस स्‍माल में एक माचिस की तिली रखने को कहें। अब माचिस को कई तह मोडते वक्‍त आप ध्‍यान देते हुए उस तिली को छुपाकर और अपनी रूमाल के किनारे छिपायी तिली को सामने रखें। अपने दोस्‍त को अपने तिली को तोडने को कहे , इसके दो नहीं , चार छह टुकडे करवा लें । जब दोस्‍त को तसल्‍ली हो जाए कि तिली अच्‍छी तरह टूट चुकी है , तब आप रूमाल को झाड दें , साबुत तिली आपके सामने होगी। आपकी जादूगिरी देखकर दोस्‍त प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे।

jadu sikhne ka tarika in hindi

हाल फिलहाल तो विज्ञान के प्रवेश से जादू के क्षेत्र में भी बहुत अधिक विकास हुआ है , पर पारंपरिक जादू में सबसे बडा जादू बच्‍चे के सर काटकर उसे जोडने का दिखाया जाता था। उसमें हाथ की अधिक सफाई की जरूरत होती थी। चादर को झाडकर बच्‍चे को सर से पांव तक ढंकते वक्‍त एक गोल तकिया और तरल लाल रंग का पैकेट अंदर भेज देना पडता था , उसके बाद बाहर के व्‍यक्ति के कहे अनुसार लडके का हर क्रिया कलाप होता था और जिस समय सर धड से अलग करने का समय होता , उससे पहले वह अपने शरीर को सिकोडकर छोटा कर लेता और सर के जगह गोल तकिया रखकर रंग के पैकेट को खोल देता । जब लोगों के अनुरोध पर उसके सर जोडने की बात होती है, वह तकिए और पैकेट को चादर में छुपाते हुए उठ खडा होता था।

जादूगर को जादू दिखाते देख हमें अचरज इसलिए होता है , क्‍यूंकि हम नहीं जानते कि उसने किस ट्रिक का इस्‍तेमाल किया है। प्राचीन काल में जब प्रकृति के निकट रहनेवाले युग में खाने पीने और रहने के अलावे न तो खर्च था और न ही महत्‍वाकांक्षा , तो यह बात मानी नहीं जा सकती कि जादूगरों ने पैसे कमाने के लालच में जनता को उनके द्वारा की जानेवाली हाथ की सफाई की जानकारी नहीं दी हो । बडा कारण यही माना जा सकता है कि यदि वे लोगों को अपने ट्रिक की जानकारी दे देतें , तो इससे लोगों के मनोरंजन का यह साधन समाप्‍त हो जाता । और जब इस कला का कोई महत्‍व ही नहीं रह जाएगा , तो फिर इसका दिनोदिन विकास भी संभव नहीं था । यही सब कारण था कि जादू की तरह ही हर कला की पीढी दर पीढी संबंधित परिवार में ही सुरक्षित रहने की परंपरा बन गयी।

वास्‍तव में , लोगों ने जब समाज बनाकर रहना शुरू किया तो पाया कि किसी एक वर्ग द्वारा उपजाए जानेवाले अनाज से सिर्फ उनके परिवार का ही नहीं , बहुतों का गुजारा हो सकता है , तो सारे लोगों का खेती में ही व्‍यस्‍त रहना आवश्‍यक नहीं। इस कारण हर क्षेत्र के विशेषज्ञों को अपनी अपनी प्रतिभा के अनुसार अलग अलग काम सौंप दिए गए और उनके खाने , पीने और अन्‍य आवश्‍यकताओं की पूर्ति करने की जिम्‍मेदारी खेतिहरों को दी गयी। इसी से समाज में इतने वर्ग बन गए और पीढी दर पीढी सभी अलग अलग प्रकार के कार्यों में जुट गए । 

खेतिहरों द्वारा सामान्‍य कलाकारों को भी पूरी मदद मिलने के कारण ही प्राचीन काल में कला का इतना विकास हो सका , वरना आज कला के क्षेत्र में बिना विशिष्‍टता के आप जुडे , तो दो वक्‍त का भोजन जुटाना भी मुश्किल है । इसके अतिरिक्‍त प्राचीन काल में सभी कलाओं , सभी क्षेत्रों के लोगों को महत्‍व देने और समाज में परस्‍पर सहयोग की भावना को जागृत करने के लिए ही विभिन्‍न तरह के कर्मकांड की व्‍यवस्‍था भी की गयी । पर इतने अच्‍छे लक्ष्‍य को ध्‍यान में रखते हुए समाज के लोगों के किए गए श्रम-विभाजन का आज हम यत्र तत्र बुरा ही परिणाम देखने को मजबूर हैं।