Thursday, 10 March 2022

अटल जी की कविता

 अटल जी की कविता 

1)

गीत नहीं गाता हूँ

बेनक़ाब चेहरे हैं,
दाग़ बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ
लगी कुछ ऐसी नज़र
बिखरा शीशे सा शहर

अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ

पीठ मे छुरी सा चांद
राहू गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ
2)
गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात

प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ
गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी
हार नहीं मानूँगा,
रार नई ठानूँगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ 
3)

क़दम मिला कर चलना होगा 

बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा। 

Friday, 23 July 2021

दहेज प्रथा पर निबंध

Dahej pratha in hindi

दहेज और कन्‍या देकर भी लडकी वाले जीतते थे 

सबकुछ लेकर भी लडकेवाले हार जाया करते थे !!


एक कथा  में कहा गया है कि पूरी धरती को जीतने वाला एक महत्‍वाकांक्षी राजा अधिक दिन तक खुश न रह सका , क्‍यूंकि वह चिंति‍त था कि आपनी बेटी की शादी कहां करे , क्‍यूंकि इस दुनिया का प्रत्‍येक व्‍यक्ति न सिर्फ अपनी बेटियों का विवाह अपने से योग्‍य लडका ढूंढकर किया करता है , वरन् अपने बेटों को खुद से बेहतर स्थिति में भी देखना चाहता है। यही कारण है कि समय के साथ बेटे बेटियों को अधिक गुणवान बनाने के लिए हर कार्य को करने और सीखने की जबाबदेही दी जाती थी , वहीं बेटियों के विवाह के लिए गुणवान लडके के लिए अधिक से अधिक खर्च करने , यहां तक कि दहेज देने की प्रथा भी चली। इस हिसाब से दहेज एक बेटी के पिता के लिए भार नही , वरन् खुशी देने वाली राशि मानी जा सकती थी। यह क्रम आज भी बदस्‍तूर जारी है।

इस सिलसिले में अपने गांव की उस समय की घटना का उल्‍लेख कर रही हूं , जब व्‍यवहारिक तौर पर मेरा ज्ञान न के बराबर था और पुस्‍तकों में पढे गए लेख या मुद्दे ही मस्तिष्‍क में भरे होते थे। तब मैं दहेज प्रथा को समाज के लिए एक कलंक के रूप में देखा करती थी। पर विवाह तय किए जाने के वक्‍त कन्‍या पक्ष को कभी परेशान नहीं देखा। अपने सब सुखों को छोडकर पाई पाई जोडकर जमा किए गए पैसों से कन्‍या के विवाह करने के बाद माता पिता को अधिकांशत: संतुष्‍ट ही देखा करती थी , जिसे मैं उनकी मजबूरी भी समझती थी। 

पर एक प्रसंग याद है , जब एक चालीस हजार रूपए में अपनी लडकी का विवाह तय करने के बाद मैने उसके माता पिता को बहुत ही खुश पाया। उनके खुश होने की वजह तो मुझे बाद में उनकी पापाजी से हुई बात चीत से मालूम हुई। उन्‍होने पापाजी को बताया कि जिस लडके से उन्‍होने विवाह तय किया है , उसके हिस्‍से आनेवाली जमीन का मूल्‍य चार लाख होगा। वे चालीस हजार खर्च करके चार लाख का फायदा ले रहे हैं , क्‍यूंकि समय के साथ तो सारी संपत्ति उसकी बेटी की ही होगी न। शायद इसी हिसाब के अनुसार लडके की जीवनभर की कमाई को देखते हुए आज भी दहेज की रकम तय की जाती है।

और लडके की मम्‍मी की बात सुनकर तो मैं चौंक ही गयी। जैसा कि हमारे समाज में किसी भी शुभ कार्य को करने के पहले और बाद में ईश्‍वर के साथ गुरूजन और बुजुर्गों के पैर छूने की प्रथा है , लडके की मां अपने बेटे के विवाह तय करने के बाद मेरे दादाजी और दादीजी के पैर छूने आयी। पैर छूने के क्रम में उन्‍होने बताया ... ' आज मैं लडके को हार गयी हूं।' यह सुनकर मैं तो घबडा गयी , परेशान थी कि ये हार गयी हैं तो इतनी खुश होकर लडकी की प्रशंसा क्‍यूं कर रही हैं , आधे घंटे तक मैं उनकी बात गौर से सुनती गयी कि इन्‍हे किस बात की हार मिली है , पर मेरे पल्‍ले कुछ भी न पडा। 

उनके जाने के बाद भी मैं अपनी भावनाओं को रोक न सकी और उनके हार की वजह पूछा , दादीजी ने जो बताया , वह और भी रोचक था , 'लडके का विवाह तय करने को इस क्षेत्र में हारना कहा जाता है' मेरे पूछने पर उन्‍होने स्‍पष्‍ट किया कि कन्‍या की सुंदरता , गुण , परिवार और साथ में दहेज की रकम मिलकर इन्‍हें हारने को मजबूर कर दिया। इस तरह दहेज और कन्‍या देकर भी लडकी वाले जीत और सबकुछ लेकर भी लडकेवाले हार जाया करते थे ।
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Monday, 12 April 2021

झूठ नहीं बोलना सच कहना

झूठ नहीं बोलना सच कहना 

Jhoot nahi bolna sach kahna



झूठ के पांव होते ही नहीं हैं ,

कभी कहीं भी पहुंच सकता है।
पर बिना पांव के ही भला वह ,
फासला क्‍या तय कर सकता है ?


भटकते भटकते , भागते भागते ,
उसे अब तक क्‍या है मिला ?
मंजिल मिलनी तो दूर रही ,
दोनो पांव भी खोना ही पडा !!

सच अपने पैरों पर चलकर ,
बिना आहट के आती है।
निष्‍पक्षता की झोली लेकर ,
दरवाजा खटखटाती है।

न्‍याय, उदारता की इस मूरत को ,
इस कर्तब्‍य का क्‍या न मिला ?
हर युग में पूजी जाती है ,
हर वर्ग में इसे सम्‍मान मिला !!

सत्‍य पर कदम रखने वालों को,
कठिन पथ पे चलना ही पडेगा।
विघ्‍न बाधाओं पर चल चल कर,
मार्ग प्रशस्‍त करना ही पडेगा।

राम , कृष्‍ण , बुद्ध और गांधी को,
बता जीवन में क्‍या न मिला ?
आत्मिक सुख, शांति नहीं बस,
जीवन को अमरत्‍व भी मिला !!

Tuesday, 2 February 2021

सरस्‍वती पूजा पर आज तो बस पुरानी यादें ही साथ हैं !!

How to do saraswati puja ?

How to do saraswati puja ?


सरस्‍वती पूजा को लेकर सबसे पहली याद मेरी तब की है , जब मैं मुश्किल से पांच या छह वर्ष की रही होऊंगी और सरस्‍वती पूजा के उपलक्ष्‍य में शाम को स्‍टेज में हो रहे कार्यक्रम में बोलने के लिए मुझे यह कविता रटायी गयी थी ...

शाला से जब शीला आयी ,
पूछा मां से कहां मिठाई ।
मां धोती थी कपडे मैले ,
बोली आले में है ले ले।
मन की आशा मीठी थी ,
पर आले में केवल चींटी थी।
खूब मचाया उसने हल्‍ला ,
चींटी ने खाया रसगुल्‍ला।


थोडी बडी होने पर स्‍कूल में भी हमारा उपस्थित र‍हना आवश्‍यक होता , चूंकि स्‍कूलों के कार्यक्रम में थोडी देरी हो जाया करती थी , इसलिए हमारे घर की पूजा सुबह सवेरे ही हो जाती और माता सरस्‍वती को पुष्‍पांजलि देने के बाद ही हमलोग तब स्‍कूल पहुंचते , जब वहां का कार्यक्रम शुरू हो जाता था। सभी शिक्षकों को मालूम था कि हमारे घर में भी पूजा होती है , इसलिए हमें कभी भी देर से पहुंचने को लेकर डांट नहीं पडी। बचपन से ही हम भूखे प्‍यासे स्‍कूल जाते और स्‍कूल की पूजा के बाद ही प्रसाद खाते हुए सारा गांव घूमते , प्रत्‍येक गली में एक सरस्‍वती जी की स्‍थापना होती थी , हमलोग किसी भी मूर्ति के दर्शन किए बिना नहीं रह सकते थे।

ऊंची कक्षाओं के बच्‍चों को स्‍कूल के सरस्‍वती पूजा की सारी व्‍यवस्‍था खुद करनी होती थी , इस तरह वे एक कार्यक्रम का संचालन भी सीख लेते थे। चंदा एकत्रित करने से लेकर सारा बाजार और अन्‍य कार्यक्रम उन्‍हीं के जिम्‍मे होता। सहशिक्षा वाले स्‍कूल में पढ रही हम छात्राओं को सरस्‍वती पूजा के कार्यक्रम में चंदा इकट्ठा करने और पंडाल की सजावट के लिए घर से साडियां लाने से अधिक काम नहीं मिलता था , इसलिए सबका खाली दिमाग अपने पहनावे की तैयारी करता मिलता।

तब लहंगे का फैशन तो था नहीं , बहुत कम उम्र से ही सरस्‍वती पूजा में हम सभी छात्राएं साडी पहनने के लिए परेशान रहते। आज की  तरह तब महिलाओं के पास भी साडियों के ढेर नहीं हुआ करते थे , इसलिए अच्‍छी साडियां देने को किसी की मम्‍मी या चाची तैयार नहीं होती और पूजा के मौके पर साधारण साडियां पहनना हम पसंद नहीं करते थे। साडियों के लिए तो हमें जो मशक्‍कत करनी पडती , उससे कम ब्‍लाउज के लिए नहीं करनी पडती। किसी भी छात्रा को अपनी मम्‍मी और चाचियों का ब्‍लाउज नहीं आ सकता था, ब्‍लाउज के लिए हम पूरे गांव में दुबली पतली नई ब्‍याहता भाभियों को ढूंढते। तब रंगो के इतने शेड तो होते नहीं थे , हमारी साडी के रंग का ब्‍लाउज कहीं न कहीं मिल ही जाता , तो हमें चैन आता।

हमारे गांव में वसंतपंचमी के दूसरे दिन से ही मेला भी लगता है , हमारे घर में तो सबका संबंध शुरू से शहरों से रा है , इसलिए मेले को लेकर बडों को कभी उत्‍साह नहीं रहा , पर दूर दराज से पूरे गांव में सबके घर मेहमान मेला देखने के लिए पहुंच जाते हैं। अनजान लोगों से भरे भीड वाले वातावरण में हमलोगों को लेकर अभिभावक कुछ सशंकित भी रहते , पर एक सप्‍ताह तक हमलोगों का उत्‍साह बना रहता। ग्रुप बनाकर ही सही , पर मेले में आए सर्कस से लेकर झूलों तक और मिठाइयों से लेकर चाट पकौडों तक का आनंद हमलोग अवश्‍य लेते।

वर्ष 1982 में के बी वूमेन्‍स कॉलेज , हजारीबाग में ग्रेज्‍युएशन करते हुए चतुर्थ वर्ष में पहली बार सरस्‍वती पूजा के आयोजन का भार हमारे कंधे पर पडा था। इस जिम्‍मेदारी को पाकर हम दस बीस लडकियां अचानक बडे हो गए थे और पंद्रह दिनों तक काफी तैयारी के बाद हमलोगों ने सरस्‍वती पूजा के कार्यक्रम को बहुत अच्‍छे ढंग से संपन्‍न किया था। वो उत्‍साह भी आजतक नहीं भूला जाता। आज तो बस पुरानी यादें ही साथ हैं , सबों को सरस्‍वती पूजा की शुभकामनाएं !!

Wednesday, 13 May 2020

सनातन धर्म का पालन करना चाहिए

Sanatan Dharma in Hindi

सनातन धर्म का पालन करना चाहिए 

पता नही क्‍यूं , अंधविश्‍वासी स्‍वभाव नहीं होने के बावजूद प्राचीन परंपराएं मुझे बुरी नहीं लगती , धर्म मुझे बुरा नहीं लगता । क्‍यूंकि मैं मानती हूं कि विदेशी आक्रमणों के दौरान हमारी सभ्‍यता और संस्‍कृति का जितना विनाश हुआ , उससे कहीं कम इस स्‍वतंत्र भारत में धर्म के क्षेत्र में घुसकर कमाने खाने वाले चोर डाकुओं ने नहीं किया। इस कारण धर्म का जो भी रूप हमारे सामने है , हम जैसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवालों को पच ही नहीं सकता। 

पर धर्म तो धारण करने योग्‍य व्‍यवहार होता है , उससे हम कब तक दूर रह सकते हैं , आज हमें धर्म के पालन के लिए नए नियम बनाने की आवश्‍यकता है। आज हर क्षेत्र में झूठ और अन्‍याय का बोलबाला है , क्‍या हम हर क्षेत्र को ही समाप्‍त कर सकते हैं ? सबमें सुधार की आवश्‍यकता है , पर बस हम सिर्फ दोषारोपण करते रहें , तो बात सुधरनेवाली नहीं। यही कारण है कि जब भी मैं धर्म विरोधियों के आलेख देखती हूं , मैं उसमें कमेंट दिए बिना नहीं रह पाती , दो दिन पूर्व भी धर्म और ईश्‍वर के विरोध में लिखे गए एक आलेख में मैने ये कमेंट कर दिया है .............

sanatan dharm ke niyam
(सनातन धर्म के बारे में )

ईश्‍वर को किसी ने देखा नहीं .. इसलिए इसे मानने की जबरदस्‍ती किसी पर नहीं की जा सकती .. पर हजारो हजार वर्षों से बिना संविधान के .. बिना सरकार के यदि यह समाज व्‍यवस्थित ढंग से चल रहा है .. तो वह धर्म के सहारे से ही .. यदि भाग्‍य, भगवान और स्‍वर्ग नरक का भय या लालच न होता .. तो समर्थों के द्वारा असमर्थों को कब का समाप्‍त कर दिया जाता .. शरीर और दिल दोनो से कमजोर नारियों की रक्षा अभी तक धर्म के कारण ही हो सकी है .. बुद्धि , बल और व्‍यवसायिक योग्‍यता में से कुछ भी न रखनेवालों को भी रोजगार के उपाय निकालकर उनके रोजी रोटी की व्‍यवस्‍था भी धर्म के द्वारा ही की गयी थी .. गृहस्‍थों को इतने कर्मकांडों में उलझाया जाता रहा कि दीन हीनों को कभी रोजगार की कमी न हो . 

How old is Sanatan Dharma

(sanatan dharm kitna purana hai)

मनुष्य की अंतरात्मा से सम्बन्ध है इसका, इसलिए तो सनातन धर्म की उम्र नहीं बताई जा सकती। दूनिया के हर धर्म में समय समय पर साफ सफाई की आवश्‍यकता रहती थी .. पर इसका परिशोधन न कर हम अपनी परंपराओं को , अपने धर्म को गलत मानते रहे .. तो आनेवाले युग में भयंकर मार काट मचेगी .. आज ही पैसे कमाने के लिए कोई भी रास्‍ता अख्तियार करना हमें गलत नहीं लगता .. क्‍यूंकि किसी को भगवान का भय नहीं रह गया है .. जो बहुत बडे वैज्ञानिक हैं .. क्‍या उनके वश में सबकुछ है .. वे भगवान को माने न माने पकृति के नियमों को मानना ही होगा .. और मैं दावे से कहती हूं कि इस प्रकृति में कुछ भी संयोग या दुर्योग नहीं होता है .. हमारे एक एक काम का लेखा जोखा है प्रकृति के पास .. और जब हर व्‍यक्ति इस बात को समझ जाएंगे .. ये दुनिया स्‍वर्ग हो जाएगी .. मेरा दावा है !!

Tuesday, 12 May 2020

धर्म का पालन अंधविश्‍वास बिल्‍कुल भी नहीं !!

Dharm kya hai

धर्म का पालन अंधविश्‍वास बिल्‍कुल भी नहीं !!

कल मैने आप सबों को एक लेख के माध्‍यम से समझाने की कोशिश की कि किस तरह आध्‍यात्‍म , धर्म , अंधविश्‍वास और जादू टोना एक दूसरे से अलग हैं। युग के परिवर्तन के साथ ही साथ धर्म की परिभाषा बदलने लगती है। आज के विकसित समाज में भी परिवार में हर सुख या दुख के मौके की वर्षगांठ मनायी जाती है , इसके माध्‍यम से हम खुशी या दुखी होकर आपनी भावनाओं का इजहार कर पाते हैं , जिन माध्‍यमों से हमे या हमारे परिवार को सुख या दुख मिल रहा हो , उसे याद कर पाते हैं , उनके प्रति नतमस्‍तक हो पाते हैं। 

एक पूरे समाज में मनाए जानेवाले किसी त्‍यौहार का ही संकुचित रूप है ये , पर जब किसी की उपस्थिति और अनुपस्थिति पूरे समाज पर प्रभाव डाल रही हो , तो वैसे महान व्‍यक्ति का जन्‍मदिन या पुण्‍य तिथि पूरा समाज एक साथ मनाता है। यह हमारा कर्तब्‍य है , हमें मनाना चाहिए , पर इसे मनाने न मनाने से उन महान आत्‍माओं के धर्म में कोई परिवर्तन नहीं होगा। उनका काम कल्‍याण करना है , तो वे अपने धर्म के अनुरूप कल्‍याण ही करते रहेंगे। पर उन्‍हें याद कर हमें उनके गुणों से सीख लेने की प्रेरणा अवश्‍य मिल जाती है। 

प्राचीन काल के संदर्भ में हम इसी बात को देखे तो आग , जल , वायु , सूर्य से लेकर प्रकृति की अन्‍य वस्‍तुओं में एक मनुष्‍य की तुलना में कितनी गुणी अधिक शक्ति है , इसकी कल्‍पना करना भी नामुमकिन है। आग हमें जला भी सकती है , पर ऐसा विरले करती , वह हमें गर्म रखने से लेकर हमारे लिए स्‍वादिष्‍ट खाना बनाने की शक्ति रखती है। जल हमें अपने आगोश में ले सकते हैं , पर वे ऐसा नहीं करते और हमारे जीवन यापन के हर पल में सहयोग करते हैं। वायु हमें कहां से उडाकर कहां तक ले जा सकती है , पर वो ऐसा नहीं करती , हमारे प्राण को बचाए रखने के लिए ऑक्‍सीजन का इंतजाम करती है। सूर्य हमें जलाकर खाक कर सकता है , पर हमारी दिनचर्या को बनाए रखने के लिए प्रतिदिन उदय और अस्‍त होता है। ये सब इसलिए होता है , क्‍यूंकि कल्‍याण करना उनका स्‍वभाव है। 


dharm kya hai

हम प्रकृति की वस्‍तुओं के इसी स्‍वरूप की पूजा करते हैं । पूजा करने के क्रम में हम इनको सम्‍मान तो देते ही हैं , उनसे सीख भी लेते हैं कि हम अपने गुणों से संसार का कल्‍याण करेंगे। प्रकृति के एक एक कण में कुछ न कुछ खास विशेषताएं हैं , जो हमारी सेवा में तत्‍पर रहती हैं। यदि हम ढंग से प्रयोग करें , तो फूल से लेकर कांटे तक और अमृत से लेकर विष तक , सबमें किसी न किसी प्रकार का फायदा है। हर वर्ष का एक एक दिन हमने इनकी पूजा के लिए निर्धारित किया है , ताकि हम इनके गुणों को याद कर सके और इनसे सीख ले सकें। इसलिए इसे हमारे धर्म से जोडा गया है। यदि इस ढंग से सोंचा जाए कि हम इनकी पूजा नहीं करेंगे यानि इसका दुरूपयोग करेंगे , तो इनके सारे गुण अवगुण में बदल जाएंगे यानि तरह तरह की प्राकृतिक आपदाएं आएंगी , तो यह अंधविश्‍वास नहीं हकीकत ही है।


मर्द पर भी भूत आते है ?

Bhut pret ki kahani

 मर्द पर भी भूत आते है ?

लगातार कई पोस्‍टों में भूत प्रेत की चर्चा सुनकर मुझे भी एक घटना याद आ गयी , जो मैं आपलोगों को सुना ही दूं। 1975 के आसपास की बात है , घर के बगल के सब्‍जी के खेत में मेरे पापाजी कई मजदूरों से काम करवा रहे थे। मुहल्‍ले के ही सारे मजदूर थे , इसलिए वे खाना खाने अपने अपने घर चले जाते थे। ठीक 1 बजे उनको खाने की छुट्टी देकर पापाजी भी खाना खाने घर आए। खेत की सब्जियां जानवर न खा लें, यह सोंचकर मेरे पापाजी को घर में देखकर थोडी ही देर में दादी जी उस खेत का दरवाजा बंद कर आ गयी। 

अभी पापाजी खाना खा ही रहे थे कि घर के किसी बच्‍चे ने देखा कि एक मजदूर उसी बगीचे के पुआल के ढेर पर बंदर की तरह उपर चढता जा रहा है। उसके हल्‍ला मचाने के बावजूद वह उपर चढता गया और उपर चढकर डांस करने लगा। हमलोग सारे बच्‍चे जमा होकर तमाशा देखने लगे। हमलोगों का हल्‍ला सुनकर पापाजी खाना छोडकर आंगन मे आए। उससे डांटकर उतरने को कहा तो वह उतरकर आम के पेड पर बिल्‍कुल पतली टहनी पर चढ गया। आंय बांय क्‍या क्‍या बकने लगा। कभी इस पेड पर तो कभी उसपर , फिर पापाजी के डांटने पर उतरकर बगीचे के दीवार पर दौडने लगा।

bhut pret ki kahani

उसकी शरारतें देखकर सबका डर से बुरा हाल था , पता नहीं , सांप बिच्‍छू ने काट लिया या भूत प्रेत का चक्‍कर है या फिर इसका दिमाग किसी और वजह से खराब हो गया है। अभी कुछ ही दिन पहले एक मजदूर हमारा काम करते हुए पेड से गिर पडा था , एक्‍सरे में उसकी हाथ की हड्डियां टूटी दिखी थी और हमारे यहां से उसका इलाज किया ही जा रहा था और ये दूसरी मुसीबत आ गयी थी। मेरी दादी जी परेशान ईश्‍वर से प्रार्थना कर रही थी कि हमारे घर में ही सारे मजदूरों को क्‍या हो जाता है , उनकी रक्षा करें और वह बेहूदी हरकतें करता जा रहा था। 

10 - 15 मिनट तक डांट का कोई असर न होते देख मेरे पापाजी ने उसे प्‍यार से बुलाया। थोडी देर में वह सामने आया। पापाजी प्‍यार से उससे पूछने लगे कि तुम्‍हें क्‍या हुआ , किसी कीडे मकोडे ने काटा या कुछ और बात हुई। उसने शांत होकर कहा ‘पता नहीं मुझे क्‍या हो गया है , चाची से पूछिए न , मैने बगीचे के कितने बैगन भी तोड डाले’ , पापाजी चौंके ‘चाची से पूछिए न , बगीचे के बैगन’ , हमलोगों को बगीचे में भेजा , सचमुच बहुत से बैगन टूटे पडे थे। पापाजी को राज समझ में आ गया , उसे बैठाकर पानी पिलाया , खाना खिलाया और उसे दिनभर की छुट्टी दे दी और उसकी पत्‍नी को बुलाकर उसके साथ आराम करने को घर भेज दिया। पापाजी ने दादी जी से बैगन के बारे में पूछा तो उन्‍होने बताया कि उन्‍हे कुछ भी नहीं मालूम।

दरअसल मजदूरों को जब छुट्टी दी गयी थी , तो सारे चले गए , पर इसकी नजर बगीचे के बैगन पर थी , इसलिए यह उसी बगीचे के कुएं पर पानी पीने के बहाने रूक गया। घर ले जाने के लिए वह बैगन तोडने लगा , उसी समय दादी जी दरवाजा बंद करने गयी । उन्‍हें मोतियाबिंद के कारण धुंधला दिखाई देता था , वो मजदूर को नहीं देख पायीं , पर मजदूर ने सोंचा कि दादी जी ने बैगन तोडते उसे देख लिया है , इसलिए उसने चोरी के इल्‍जाम से बचने के लिए नाटक करना शुरू किया। माजरा समझ में आने पर हमारा तो हंसते हंसते बुरा हाल था। सचमुच यही बात थी , क्‍यूंकि दूसरे दिन वह बिल्‍कुल सामान्‍य तौर पर मजदूरी करने आ गया था।

Friday, 8 May 2020

नारी की समस्याएँ

 Nari ki samasyayen

नारी की समस्याएँ 

अधिकार और कर्तब्‍यों का आपस में एक दूसरे से अन्‍योनाश्रय संबंध है। चाहे कोई भी स्‍थान हो , कर्तब्‍यों का पालन करने वालों को सारे अधिकार स्‍वयमेव मिल जाते हैं। पर सिर्फ अच्‍छे खाते पीते परिवार की कुछ बेटियों या कुछ प्रतिशत दुलारी बहुओं की बात छोडकर हम समाज के अधिकांश नारियों की बात करें , तो यहां तो बात ही उल्‍टी है , बचपन से बूढे होने तक और मौत को गले लगाने तक ये सारे कर्तब्‍यों का पालन करती हैं , पर फिर भी इन्‍हें अधिकार से वंचित किया जाता रहा है। बहुत सारे परिवार और ऑफिसों में महिलाएं शोषण और प्रताडना की शिकार बनीं सबकुछ सहने को बाध्‍य हैं। इनकी स्थिति को सुधारने की कोशिश में स्त्रियां अक्‍सरहा पुरूष वर्ग से अपने अधिकार के लिए गुहार लगाती हैं , जो कि बिल्‍कुल अनुचित है। इस सृष्टि को आगे बढाने में स्‍त्री और पुरूष दोनो की ही बराबर भूमिका है , महिलाओं की खुशी के बिना पुरूष खुश नहीं रह सकते , फिर महिलाओं को अपने को कमजोर समझने की क्‍या आवश्‍यकता ?? उनसे अधिकारों की भीख क्‍यूं मांगने की क्‍या आवश्‍यकता ??

प्राचीन काल में बालिकाओं का विवाह बहुत ही छोटी उम्र में होता था , संयु‍क्‍त परिवार में पालन पोषण होने से कई प्रकार के माहौल से उनका दिलो दिमाग गुजरता था , पर होश संभालते ही ससुराल का माहौल सामने होता था। उनपर अपने मायके का कोई प्रभाव नहीं होता था , सुसराल के माहौल में , चाहे वहां जो भी अच्‍छाइयां हों , जो भी बुराइयां हों , वे आराम से अपना समायोजन कर लिया करती थी। पर आज स्थिति बिल्‍कुल भिन्‍न है , एकल परिवारों और देर से विवाह होने के कारण बौद्धिक विकास में मायके का माहौल गहरा असर रखता है , उसे एक सिरे से भुलाया नहीं जा सकता , इस कारण नारी के लचीलेपन में कमी आयी है। अब जहां वह खुद को थोडा परिवर्तित करना चाहती है , तो ससुराल वालों से भी थोडे परिवर्तन की उम्‍मीद रखती है। वो पढी लिखी और समझदार आज के जमाने से कदम से कदम मिलाकर चलना चाहती है , उसकी इस मानसिकता को ससुराल वालों को सहज ढंग से स्‍वीकार करना चाहिए, पर ऐसा नहीं हो पाता। समय के साथ हर क्षेत्र में परिवर्तन हुआ है , तो भला नारी के रहन सहन , सोंच विचार में परिवर्तन क्‍यूं नहीं होगा ?

nari ki samasyayen

आज पति या ससुराल वालों से समायोजन न हो पाने से वैवाहिक संबंधों के टूटने और बिखरने की दर में निरंतर बढोत्‍तरी हो रही है। ऐय्याश और लालची कुछ पतियों को छोड दिया जाए , तो बाकी मामलों में जितना दोष पतियों का नहीं होता , उससे अधिक उन्‍हें बरगलाने वाली नारी शक्ति का ही होता है। यहां तक की दहेज के लिए भी महिलाएं सास और ननदों के सहयोग से भी जलायी जाती हैं। इसके अतिरिक्‍त सिर्फ ससुराल पक्ष की माताजी ,बहनें और भाभियां निरंतर पीडिताओं को जलील करती हैं , पूरे समाज की महिलाएं भी उनके पीछे हाथ धोकर पड जाती हैं। 

इस कारण परित्‍यक्‍ताओं का जीना दूभर हो जाता है और समाज में इस प्रकार की घटनाओं को देखते हुए कोई भी नारी किसी बात का विरोध नहीं कर पाती , इसे अपनी नियति मानते हुए ससुराल में अत्‍याचारों को बर्दाश्‍त करती रहती है , विरोध की बात वह सोंच भी नहीं पाती। इस तरह अपनी बेटियों को पालने में भले ही माता पिता का नजरिया कुछ बदला हो , पर दूसरे की बेटियों के मामले में मानसिकता अभी तक थोडी भी नहीं बदली है। इस महिला दिवस पर महिलाएं प्रण लें कि दूसरों की बेटियों के कष्‍ट को भी अपना समझेंगे , उसे ताने उलाहने न देंगे , कोई महिला प्रताडित की जाए , तो उसके विरूद्ध आवाज उठाएंगे , तो ही महिला दिवस सार्थक हो सकता है। महिलाओं का साथ देकर अपना अधिकार वे स्‍वयं प्राप्‍त कर सकते हैं , भला वो पुरूषों से अपने अधिकार क्‍यूं मांगे ??



अंतर्राष्‍ट्रीय महिला दिवस पर सबों को शुभकामनाएं !!

बुरे कर्मों का फल कैसे मिलता है ?

Bure karmo ka fal kaise milta hai

बुरे कर्मों का फल कैसे मिलता है ?

ज्‍योतिष जैसे विषय से जुडे होने के कारण अपने को दुखी कहनेवाले और सुखी होने के लिए सलाह के लिए आनेवाले लोगों की मेरे पास कमी नहीं , पर मेरे विचार से ये सारे लोग दुखी नहीं होते। उनके पास जीवन के सारे सुख हैं , ये बडी बडी गाडियों में आते हैं , अच्‍छा जीवन जीते हैं , पर संतोष की कमी है , इसलिए अपने को दुखी मानते हैं। हर प्रकार के सुख , डिग्री और पद के साथ जीने की इन्‍हें बुरी आदत हो गयी है और उसमें से कोई भी कमजोरी उन्‍हें तनाव दे देती है। सिर्फ अपने कर्म पर भरोसा रखने वालों को भी आध्‍यात्मिक विश्‍वास वालों की तुलना में मैने अधिक दुखी पाया है , क्‍यूंकि हर वक्‍त कर्म से आप अपने जीवन को नहीं सुधार सकते , इस लंबे जीवन में बहुत कुछ अपने हाथ में नहीं होता , पर आध्‍यात्म पर विश्‍वास रखनेवालों को हर परिस्थिति को स्‍वीकारने और संतोष कर लेने की एक अच्‍छी आदत होती है। मैं तो बस यही मानती हूं कि अपने लक्ष्‍य के लिए जी जान से कोशिश करो , फिर भी वो नहीं मिले , तो उस वक्‍त समझौता कर लो और यह विश्‍वास रखो कि उससे बडी उपलब्धि आगे मिलनेवाली है।

कहा जाता है कि सबों का जीवन सुख और दुख का मिश्रण है। पर कभी कभी यह विचित्रता अवश्‍य देखने को मिलती है कि किसी के हिस्‍से में सिर्फ सुख ही सुख होता है और किसी के हिस्‍से में केवल कष्‍ट। यदि विज्ञान के कार्य कारण नियम के अनुसार इसका कारण ढूंढा जाए तो हमारे हिस्‍से कुछ भी नहीं लगेगा , पर आध्‍यात्‍म के अनुसार हमारा जीवन कई कई जन्‍मों के हमारे कर्म का फल है , भले ही इसका प्रमाण न हो , पर कार्य कारण नियम के अनुसार हमें मिलनेवाले हर सुख दुख का हिसाब तो इससे मिल ही जाता है। इतना ही नहीं , आध्‍यात्‍म पर विश्‍वास हमारे कर्म को नियंत्रित भी करता है और हमारे अंदर सद्गुणों का विकास कर हमें चरित्रवान भी बनाता है। आध्‍यात्‍म के इस विशंषता के आगे तर्क कहीं भी नहीं टिकता ।



अपने अभी तक के अनुभव में मैने अपने गांव की एक महिला को सबसे कष्‍टकर जीवन जीते पाया है , पर मैं ऐसा नहीं मान सकती कि उससे दुखी दुनिया में और कोई भी नहीं। पूरी दुनिया में न जाने कितनी महिलाएं और पुरूष किन किन जगहों पर घोर यातना का शिकार बने हुए हों, पर मेरी नजर में आयी तीन चार दुखियारी महिला के मध्‍य यह सबसे दुखियारी मानी जा सकती है। सामान्‍य तौर पर संपन्‍न घर में जन्‍म लेनेवाली इस महिला , जिसकी चर्चा कर रही हूं , का विवाह भी एक संपन्‍न घराने के सरकारी नौकरी कर रहे इकलौते युवक से हुआ। दो बेटियां और एक बेटे ने भी जन्‍म लेकर उनके परिवार को सुखी बनाने में कोई कसर नहीं रहने दिया, यहां तक कि दो चार वर्षों तक उनका पालन पोषण और विकास भी अच्‍छे ढंग से हुआ , पर आगे की कहानी पढकर बात समझ में आएगी कि उनके लिए यह खुशी बिल्‍कुल क्षणिक थी।

पीढियों से उनके परिवार के सारे नहीं , पर कुछ बच्‍चे एक खास प्रकार की बीमारी से ग्रस्‍त देखे जाते थे। इस बीमारी में तीन चार वर्ष की उम्र में पोलियो की तरह पहले शरीर का कोई एक अंग काम करना बंद कर देता है ,खासकर पैर , फिर धीरे धीरे पूरा शरीर ही इसके चपेट में आ जाता है। हालांकि इस दौरान भी शारिरीक विकास में कोई कमी नहीं देखी जाती है और 20 वर्ष की उम्र तक बच्‍चे बिस्‍तर में पडे पडे युवा भी हो जाते हैं, पर युवावस्‍था ही इनका अंतिम समय होता है , 20 से 22 वर्ष की उम्र के आसपास इनकी मौत हो जाती है। पर इस दौरान मानसिक विकास तो बाधित होता ही है , बोलने और समझने की शक्ति भी समाप्‍त हो जाती है। किसी भी डॉक्‍टर ने इसका कोई पुखता इलाज होने की बात नहीं कही। इस परिवार के अलावा हमारे पूरे गांव में इस प्रकार की बीमारी किसी भी परिवार में आजतक नहीं हुई , इसलिए इसे लोग जेनेटिक ही मानते हैं। हालांकि उनके परिवार में भी ये बीमारी बिल्‍कुल छिटपुट ढंग से कभी कभार ही किसी को हुई है, बाकी बच्‍चे बिल्‍कुल स्‍वस्‍थ हैं। यहां तक कि उनके परिवार की बेटियों को भी ऐसे बच्‍चे नहीं होते हैं।

पर उक्‍त महिला के दुर्भाग्‍य को हमने काफी निकट से देखा है, एक एक कर उसके तीनों बच्‍चे इस गंभीर बीमारी के शिकार हो गए। नौकरी करनेवाले अपने पति को शहर में छोडकर बच्‍चों की तीमारदारी के लिए उन्‍हें गांव में रहना पडा। जहां बच्‍चों को एक दो वर्ष संभालना ही हमें इतना भारी काम महसूस होता है , उसने निराशाजनक परिस्थितियों में 20 वर्ष की उम्र तक तीन तीन बच्‍चों को कैसे संभाला होगा , यह सोंचने वाली बात है। खैर बिस्‍तर पर पडे अपने बच्‍चों की इतने दिनों तक सेवा सुश्रुसा करने के बाद एक एक कर तीनों चल बसे , उनसे निश्चिंत हुई ही होगी कि पति की बीमारी ने फिर उसका जीना मुश्किल किया। तीन चार वर्षों तक गंभीर इलाज और कई प्रकार के ऑपरेशन के बाद उसके पति भी चल बसे। आज अपने जीवन के अंतिम दिनों में वो बिल्‍कुल अकेली है , उसके जीवन की खुशियों को जबरदस्‍ती ढूंढा जाए तो इतना अवश्‍य मिलेगा कि वो रोजी रोटी के लिए दर दर की ठोकरें खाने को मुहंताज नहीं है। उसके घर में अनाज है और हाथ में पेशन के रूपए भी , पर जीवन में उसने जो झेला और आज जो तनाव भरा जीवन काट रही है, उसे सोंचकर भी मेरे रोंगटे खडे हो जाते हैं !!

यदि हम आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो इस दुनिया में हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है।  सकारात्मक कार्यों का सकारात्मक और ऋणात्मक कार्यों का ऋणात्मक प्रभाव पड़ता है।  इनमे से कुछ को आप साफ़ साफ़ देख पाते हैं,  कुछ रहस्यमय ढंग से उपस्थित होता है। आपने किसी समय किसी के लिए कुछ अच्छा किया, उस समय तो नहीं पर बाद में आपको अच्छा फल मिल जाता है।  कभी कभी अच्छे फल एक दो पीढ़ी बाद भी मिलते हैं, और कभी कभी अगले जन्म में भी, इसलिए हमें हमेशा अच्छे कर्म ही करने चाहिए। जिस कर्म से हमारे मन और आत्मा को ख़ुशी मिलने के साथ साथ सामनेवाले के मन को भी ख़ुशी मिलती है, वह हमारा अच्छा कर्म है। जिस कर्म को अपने मन की ख़ुशी के लिए किया जाये, पर दूसरों का मन दुखी हो जाये, वह हमारा बुरा कर्म होता है।  बुरा कर्म करते वक्त खुद हमारी आत्मा हमें धिक्कारती है, पर हम इन्द्रियों को नियंत्रित न करके बुरा कर्म कर लेते हैं। इसका फल प्रकृति किसी न किसी तरह प्रकृति द्वारा हमें मिलता है। 




नारी शक्ति पर निबंध

Nari shakti par nibandh 

नारी शक्ति पर निबंध 


शारीरिक तौर पर पुरूषों से काफी कमजोर होते हुए भी महिलाएं मानसिक तौर पर बहुत ही सशक्‍त है। यह हमारा भ्रम है कि आज पढाई लिखाई के बाद महिलाएं मजबूत हुई हैं , वास्‍तव में महिलाएं हर युग में , हर क्षेत्र में मजबूत रही हैं। तभी तो एक मर्द पत्‍नी की आकस्‍मिक मृत्‍यु या अन्‍य किसी बीमारी वगैरह में खुद को ही संभाल नहीं पाता , बच्‍चों के कष्‍ट की न सोंचकर वह दूसरे विवाह के लिए तैयार हो जाता है , वहीं एक महिला ऐसी स्थिति आने पर न खुद स्‍वयं को संभालती है , खुद सारे कष्‍ट झेलकर भी बच्‍चों को भी अपने और पिता के सपने पर खरा उतारती है। वह आज की तरह पढी लिखी हो , या अनपढ , गांवों में रहती हो या शहर में , कोई अंतर नहीं पडता , वह जो भी ठान लेती है , कर दिखाती है। इनकी इस खासियत को उसकी कमजोरी बना दिया जाए , तो इसमें महिलाओं का कोई कसूर नहीं । 

नारी शक्ति क्या है

वैसे तो प्रकृति ने महिलाओं और पुरूष दोनो को एक दूसरे का पूरक बनाया है , पर वर्तमान में नहीं , किसी भी युग में कोई भी क्षेत्र महिलाओं से अछूता नहीं रहा। यदि समाज का दबाब न रहे तो अधिकांश महिला पुरूषों के बिना आराम से जीवन यापन कर सकती है , पर महिलाओं का सहारा लिए बिना अधिकांश पुरूषों का जीवन यापन मुश्किल है। यहां तक कि बलपूर्वक नारी को हासिल कर भी कोई पुरूष सुख का अनुभव नहीं कर सकता, उन्‍हें एक समर्पित नारी की ही आवश्‍यकता होती है। खासकर आनेवाली पीढी की जिम्‍मेदारी अच्‍छी तरह निभाने में महिलाओं की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता। नारी की उन्‍नति पर ही , नारी की प्रगति पर ही समाज और राष्‍ट्र को मजबूत बनाया जा सकता है। इससे स्‍पष्‍ट है कि महिलाओं के बिना ये दुनिया एक कदम भी आगे नहीं बढ सकती। 

nari shakti par nibandh


महिलाओं के इतना मजबूत होने के बावजूद प्राचीन काल से अबतक नारियों की बदतर होती दशा के कुछ कारण मुझे स्‍पष्‍ट नजर आते हैं। सबसे बडा कारण नारियों का दो वर्ग में विभाजन है , जिसमें युग या देश के अनुरूप होनेवाला हमारा जीवनस्‍तर कोई मायने नहीं रखता। जहां कुछ महिलाएं , जो हर वक्‍त पिता , पति , भाई और पुत्र की ओर से दी जानेवाली हर प्रकार की सुख सुविधा में जी रही है , घर से बाहर भी उसके कदम सुरक्षित स्‍थलों पर होते हैं , वो अपनी स्थिति से पूरी संतुष्‍ट है , नारी के रूप में अपने को पुरूषों से कम महत्‍वपूर्ण नहीं समझ पाती। वहीं दूसरी ओर कुछ महिलाएं , जो पिता , पति , भाई और पुत्र की ओर से दिए गए कष्‍टों से ही नहीं , घर से बाहर भी हर प्रकार से संघर्ष कर रही है , कदम कदम पर अपने को पुरूषों के आगे शक्तिहीन मानने को बाध्‍य है। इन दोनो वर्गों के मध्‍य तालमेल की कमी ही महिलाओं की स्थिति को कमजोर बनाता है। जबतक पीडित नारी का हम सही विश्‍लेषण नहीं कर पाएंगे , महिलाओं पर अत्‍याचार समाप्‍त नहीं होनेवाला। 

चाहे दहेज के कारण लगातार प्रताडित किया जा रहा हो या किसी अन्‍य कारण से , आंकडे ही स्‍पष्‍ट करते हैं कि महिलाएं हर युग में प्रताडना की शिकार है महिलाओं के ऊपर होनेवाले अत्‍याचार का विरोध करने के लिए हम सभी महिलाओं को मिलजुलकर सबसे समाज का भय समाप्‍त करना होगा । आखिर समाज की आधी आबादी तो हम हैं , फिर क्‍या कारण है कि जो अत्‍याचार करता है , उसे समाज में प्रतिष्‍ठा मिलती है और महिलाएं सहे तो ठीक है न सहे तो उसकी इज्‍जत जाती है , उसका दोष निकाला जाता है। उसने कैसे कपडे पहना , किस समय बाहर गयी ,कहकर न सिर्फ उसका व्‍यवहार गलत माना जाता है , यहां तक कि उसके परिवारवालों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। जिसकी गल्‍ती बडी है , उसपर बडा दोषारोपण हो और जिसकी गलती छोटी हो उसपर छोटा , पर ऐसा नहीं होता। यही कारण है कि पीडित महिलाएं अपना मुंह न खोलकर सब कुछ सहने को विवश हो जाती हैं। ऐसी हालत में स्‍वाभाविक है कि जिसने गलती की , उसकी हौसला अफजाई होगी।

प्राचीन काल में महिलाओं के घर के अंदर सीमित होने से उनके प्रताडित होने की भी कोई सीमा थी , अभी भी घर के अंदर एक सीमा में ही सही , उनको प्रताडित किए जाने में महिलाओं की ही भागेदारी होती है। पढाई लिखाई और कैरियर से जुडने के बाद महिलाओं की प्रताडना का दायरा भी असीमित होता जा रहा है। पर अधिकांश समय महिलाओं को इसलिए ही प्रताडित किया जाता है , क्‍यूंकि महिलाओं को कमजोर समझा जाता है और महिलाओं को इसलिए कमजोर माना जाता है , क्‍यूंकि वे एकजुट नहीं हैं । वे स्‍वयं एक दूसरे की खामियां निकालने में लगी होती हैं और एक दो ही सही, पर पुरूष निरंकुश होकर पूरे पुरूष वर्ग को बदनाम करते जा रहे हैं। आइए, आज हम महिलाएं मिलकर प्रण लें कि किसी भी महिला को प्रताडना से बचाने के लिए , उसके हक के लिए हम एकजुट हो जाएं , क्‍यूंकि आज जो समस्‍या कहीं और दिखाई देती है, वो किसी भी क्षण हमारे साथ घट सकती है, हमारे खुद के साथ, अपनी मित्र के साथ, अपनी बहन या बेटी के साथ, क्‍यूं न हम समाज से ही इस समस्‍या को ही दूर करें।

माँ के लिए सुविचार

Maa par suvichar 

माँ के लिए सुविचार 

मॉ शब्‍द को सुनते ही सबसे पहले परंपरागत स्‍वरूपवाली उस मॉ की छवि ऑखो में कौंधती है , जिसके दो चार नहीं , पांच छह से आठ दस बच्‍चे तक होते थे , पर उन्‍हें पालने में उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती थी। हमारे यहां 90 के दशक तक संयुक्‍त परिवार की बहुलता थी। अपने सारे बच्‍चों की देखभाल के साथ ही साथ उन्‍हें अपनी पूरी युवावस्‍था ससुराल के माहौल में अपने को खपाते हुए सास श्‍वसुर के आदेशों के साथ ही साथ ननद देवरों के नखरों को सहनें में भी काटना पडता था।

दिनभर संयुक्‍त परिवार की बडी रसोई के बडे बडे बरतनों में खाना बनाने में व्‍यस्‍त रहने के बाद जब खाने का वक्‍त होता , अपने प्‍लेट में बचा खुचा खाना लेकर भी वह संतुष्‍ट बनीं रहती, पर बच्‍चों की देखभाल में कोई कसर नहीं छोडती थी। पर युवावस्‍था के समाप्‍त होते ही और वृद्धावस्‍था के काफी पहले ही पहले ही उनके आराम का समय आरंभ हो जाता था। या तो बेटियां बडी होकर उनका काम आसान कर देती थी या फिर बहूएं आकर। तब एक मालकिन की तरह ही उनके आदेशों निर्देशों का पालन होने लगता था और वह घर की प्रमुख बन जाया करती थी। अपनी सास की जगह उसे स्‍वयमेव मिल जाया करती थी।

maa par suvichar

पर आज मां का वह चेहरा लुप्‍त हो गया है। आज की आधुनिक स्‍वरूपवाली मां , जो अधिकांशत: एकल परिवार में ही रहना पसंद कर रही हैं , के मात्र एक या दो ही बच्‍चे होते हैं , पर उन्‍हें पालने में उन्‍हें काफी मशक्‍कत करनी पडती है। आज की महत्‍वाकांक्षी मां अपने हर बच्‍चे को सुपर बच्‍चा बनाने की होड में लगी है। इसलिए बच्‍चों को भी नियमों और अनुशासन तले दिनभर व्‍यस्‍तता में ही गुजारना पडता है। आज के युग में हर क्षेत्र में प्रतियोगिता को देखते हुए आधुनिक मां की यह कार्यशैली भी स्‍वाभाविक है , पर आज की मॉ एक और बात के लिए मानसि‍क तौर पर तैयार हो गयी है। अपने बच्‍चे के भविष्‍य के निर्माण के साथ ही साथ यह मां अपना भविष्‍य भी सुरक्षित रखने की पूरी कोशिश में रहती है , ताकि वृद्धावस्‍था में उन्‍हे अपने संतान के आश्रित नहीं रहना पडे यानि अब अपने ही बच्‍चे पर उसका भरोसा नहीं रह गया है।

मात्र 20 वर्ष के अंदर भारतीय मध्‍यम वर्गीय समाज में यह बडा परिवर्तन आया है , जिसका सबसे बडी शिकार रही हैं वे माएं , जिनका जन्‍म 50 या 60 के दशक में हुआ है और 70 या 80 के दशक में मां बनीं हैं। उन्‍होने अपनी युवावस्‍था में जिन परंपराओं का निर्वाह किया , वृद्धावस्‍था में अचानक से ही गायब पाया है। इन मांओं में से जिन्‍हें अपने पति का सान्निध्‍य प्राप्‍त है या जो शारीरिक , मानसिक या आर्थिक रूप से मजबूत हैं , उनकी राह तो थोडी आसान है , पर बाकी के कष्‍ट का हम अनुमान भी नहीं लगा सकते। संयुक्‍त परिवार मुश्किल से बचे हैं ,विवाह के बाद बहूएं परिवार में रहना नहीं पसंद करने लगी हैं। सास की मजबूरी हो , तो वह बहू के घर में रह सकतीं हैं , पर वहां उसके अनुभवों की कोई पूछ नही है , वह एक बोझ बनकर ही परिवार में रहने को बाध्‍य है , अपने ही बेटे बहू के घर में उसकी हालत बद से भी बदतर है। कहा जाता है कि प्रकृति को भूलने की आदत नहीं होती है , जो जैसे कर्म करता है , चाहे भला हो या बुरा , वैसा ही फल उसे प्राप्‍त होता है , एक कहावत भी है ‘जैसी करनी वैसी भरनी’ यदि यह बात सही है , तो प्रकृति इन मांओं के साथ क्‍यो अन्‍याय कर रही हैं ?

मातृ दिवस मनाने का  दिवस नहीं, माँ के प्रति अपने कर्तव्यों को स्वीकार करने का दिवस है।  यदि आपके सामने आपकी माँ है तो आप भाग्यशाली हो, जिस दिन वे नहीं रहेंगी, आप खुद को अभागे से महसूस करोगे।

माँ और बच्चों दोनों को मातृ दिवस की अनंत शुभकामनाएँ ! 

माँ के लिए दो शब्द

Maa ke liye do shabd

माँ के लिए दो शब्द

दुनिया का सबसे खूबसूरत शब्‍द, सबसे प्‍यारा शब्‍द है मां। किसी एक महिला के मां बनते ही पूरा घर ही रिश्‍तों से सराबोर हो जाता है। कोई नानी तो कोई दादी , कोई मौसी तो कोई बुआ , कोई चाचा तो कोई मामा , कोई भैया तो कोई दीदी , नए नए रिश्‍ते को महसूस कराती हुई पूरे घर में उत्‍सवी माहौल तैयार करती है एक मां। लेकिन इसमें सबसे बडा और बिल्‍कुल पवित्र होता है अपने बच्‍चे के साथ मां का रिश्‍ता। यह गजब का अहसास है , इसे शब्‍दों में बांध पाना बहुत ही मुश्किल है।

प्रसवपीडा से कमजोर हो चुकी एक महिला सालभर बाद ही सामान्‍य हो पाती है। मां बनने के बाद बच्‍चे की अच्‍छी देखभाल के बाद अपने लिए बिल्‍कुल ही समय नहीं निकाल पाती है। बच्‍चा स्‍वस्‍थ और सानंद हो , तब तो गनीमत है ,पर यदि कुछ गडबड हुई , जो आमतौर पर होती ही है, बच्‍चे की तबियत के अनुसार उसे खाना मिलता है , बच्‍चे की नींद के साथ ही वह सो पाती है , बच्‍चे की तबियत खराब हो , तो रातरातभर जागकर काटना पडता है , परंतु इसका उसपर कोई प्रभाव नहीं पडता , मातृत्‍व का सुखद अहसास उसके सारे दुख हर लेता है।

maa ke liye do shabd

परंपरागत ज्‍योतिष में मां का स्‍थान चतुर्थ भाव में है। यह भाव हर प्रकार की चल और अचल संपत्ति और स्‍थायित्‍व से संबंध रखता है। यह भाव सुख शांति देने से भी संबंधित है। हर प्रकार की चल और अचल संपत्ति का अर्जन अपनी सुख सुविधा और शांति के लिए ही लोग करते हैं । भले ही उम्र के विभिन्‍न पडावों में सुख शांति के लिए लोगों को हर प्रकार की संपत्ति को अर्जित करना आवश्‍यक हो जाए , पर एक बालक के लिए तो मां की गोद में ही सर्वाधिक सुख शांति मिल सकती है , किसी प्रकार की संपत्ति का उसके लिए कोई अर्थ नहीं।

यूं तो एक बच्‍चा सबसे पहले ओठों की स‍हायता से ही उच्‍चारण करना सीखता है , इस दृष्टि से प फ ब भ और म का उच्‍चारण सबसे पहले कर सकता है। पर बाकी सभी रिश्‍तों को उच्‍चारित करने में उसे इन शब्‍दों का दो दो बार उच्‍चारण करना पडता है , जो उसके लिए थोडा कठिन होता है , जैसे पापा , बाबा , लेकिन मां शब्‍द को उच्‍चारित करने में उसे थोडी भी मेहनत नहीं होती है , एक बार में ही झटके से बच्‍चे के मुंह से मां निकल जाता है यानि मां का उच्‍चारण भी सबसे आसान।

मां शब्‍द के उच्‍चारण की ही तरह मां के साथ रिश्‍ते को निभा पाना भी बहुत ही आसान होता है। शायद ही कोई रिश्‍ता हो , जिसे निभाने में आप सतर्क न रहते हों , हिसाब किताब न रखते हों , पर मां की बात ही कुछ और है। आप अपनी ओर से बडी बडी गलती करते चले जाएं , माफी मांगने की भी दरकार नहीं , अपनी ममता का आंचल फैलाए अपने बच्‍चे की बेहतरी की कामना मन में लिए बच्‍चे के प्रति अपने कर्तब्‍य पथ पर वह आगे बढती रहेगी।

पर कभी कभी मां का एक और रूप सामने आ जाता है , बच्‍चे को मारते पीटते या डांट फटकार लगाते वक्‍त प्रेम की प्रतिमूर्ति के क्रोध को देखकर बडा अजूबा सा लगता है। पर यह एक मां की मजबूरी होती है , उसे दिल पर पत्‍थर रखकर अपना वह रोल भी अदा करना पडता है। इस रोल को अदा करने के लिए उसे अंदर काफी दर्द झेलना पडता है , पर बच्‍चे के बेहतर भविष्‍य के लिए वह यह दर्द भी पी जाती है।

पर हम उनकी इस सख्‍ती , इस कठोरता को याद रखकर अपने मन में उनके लिए गलत धारणा भी बना लेते हैं। साथ ही कर्तब्‍यों के मार्ग पर चलती आ रही मांओं को अधिकारों से वंचित कर देते हैं। जब उन्‍हें हमारी जरूरत होती है , तो हम वहां पर अनुपस्थित होते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि कोई हमारे साथ भी यही व्‍यवहार करे तो हमें कैसा लगेगा ?

मातृ दिवस मनाने का  दिवस नहीं, माँ के प्रति अपने कर्तव्यों को स्वीकार करने का दिवस है।  यदि आपके सामने आपकी माँ है तो आप भाग्यशाली हो, जिस दिन वे नहीं रहेंगी, आप खुद को अभागे से महसूस करोगे।

माँ और बच्चों दोनों को मातृ दिवस की अनंत शुभकामनाएँ !

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माँ के लिए सुविचार

  


Thursday, 7 May 2020

हर दिमाग के बीज को एक विशाल वृक्ष बनाने में हर कोई मदद करे !!

Achi achi gyan ki baatein

हर दिमाग के बीज को एक विशाल वृक्ष बनाने में हर कोई मदद करे !!

बीज तो हर दिमाग में होते हैं , पर समय पर ही उनकी देखभाल हो पाती है , अंकुरण हो पाता है , विकास के क्रम में उन्‍हें हर प्रकार का वातावरण मिल पाता है और वह छोटा सा बीज एक विशाल वृक्ष बन पाता है। आज के सामाजिक राजनीतिक हालत में अनेको दिमाग के बीज दिमाग में ही सोए पडे रह जाते हैं और अनेको प्रकृति की मार से मौत के मुंह में भी चले जाते हैं। मैं आशा करती हूं कि हर दिमाग के बीज को एक विशाल वृक्ष बनाने में हर कोई मदद करे , ताकि हमारे चारो ओर विशाल ही विशाल वृक्ष नजर आए , सभी अपनी अपनी विशेषताओं की घनी पत्तियों से छांव , सुगंधित पुष्‍पों से वातावरण में सुगंध और मीठे फलों से लोगों को असीम तृप्ति प्रदान करे।

प्रकृति के सहयोग प्राप्‍त होने से बहुत लोग मेहनत और आवश्‍यकता से बहुत अधिक प्राप्‍त कर रहे होते हैं , इन्‍हें अपने सामर्थ्‍य का उपयोग दूसरों की असमर्थता को दूर करने में करना चाहिए , क्‍यूंकि प्रकृति पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता कि आज वो आपका साथ दे रही है और संयोग से आपके काम बनते जा रहे हैं , तो कल भी आपकी यही स्थिति होगी। कभी भी आपको किसी और की आवश्‍यकता पड सकती है। किसी की मदद करते समय इस बात का भी ध्‍यान रखें कि उसे बार बार मदद करने की आवश्‍यकता न पडे , उसे इस प्रकार की मदद करें  कि आनेवाले दिनों में वो इतना मजबूत हो सके कि वो पुन: दो चार लोगों की मद कर उन्‍हें भी इस लायक बना सके कि वो दूसरों की मदद कर सके।

achi achi gyan ki baatein

मेरे ख्‍याल से हमारी जीवनशैली ऐसी होनी चाहिए कि वह आनेवाली पीढी को शारीरिक , आर्थिक , मानसिक , नैतिक और आध्‍यात्मिक दृष्टि से अधिक से अधिक मजबूत बनाती चली जाए। इनमें किसी का भी महत्‍व आनेवाले समय में कम नहीं होता है। इनकी मजबूती हमें हर परिस्थिति में खुशी से जीना सीखा देती है, जो मस्तिष्‍क में किसी प्रकार का तनाव कम करने में सहायक है।



धर्म और ज्‍योतिष को यूं बदनाम न करो बाबा

Baba ki kahani 

धर्म और ज्‍योतिष को यूं बदनाम न करो बाबा

दुनिया भर के खासकर भारत में गली गली , मुहल्‍ले मुहल्‍ले विचरण करने वाले बाबाओं , तुम अपने शहर में न जाने कितने अपराध करते हो , पर काफी दिनों तक पुलिस की लापरवाही या उनसे मिलीभगत से तुम पकडे नहीं जाते , इस उत्‍साह से बडी बडी गलतियां करने लगते हो , फिर जब तुमपर शिकंजे कसे जाने लगते हैं , तो शहर से भागना और पुलिस से बचना ही तुम्‍हारा एक लक्ष्‍य हो जाता है , बचने का सबसे बडा रास्‍ता तुम्‍हें बाबाजी बनने में दिखाई देता है , बडी मूंछ और दाढी के कारण लोगों के लिए तुम्‍हारे चेहरे को पहचानना काफी मुश्किल हो जाता है , बाबा का रूप धारण कर लेने से जनता की आस्‍था का भी तुम नाजायज फायदा उठा लेते हो , यदि किसी की आस्‍था तुमपर नहीं बन रही होती , तो डराना और धमकाना तो तुम्‍हारा स्‍वभाव है, इसलिए इस राह में चलकर आराम से अपनी महत्‍वाकांक्षा के अनुरूप पैसे का इंतजाम तो तुम कर लेते हो !

बाबा बनने के बाद तो तुम्‍हारा जीवन और रंगीन बन जाता है , श्‍मशान सिद्ध कर चुके हो तुम , यह कहकर भक्‍तों के सम्‍मुख भी शराब पीने से तुम कोई परहेज नहीं करते , कमाख्‍या मंदिर में सिद्धि प्राप्‍त कर चुके हो , इसलिए मांस से भी कोई परहेज की आवश्‍यकता नहीं , महिलाओं को मां मानते हो , इसलिए उनसे घिरे होने में भी तुम्‍हें दिक्‍कत नहीं ,  कन्‍याओं से सेवा करवाकर तुम उनकी मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद दे देते हो , हत्‍या और लूटपाट के पाप के साथ तुम लोगों के कल्‍याण का दावा कर लेते हो , महात्‍मा होने के बावजूद भविष्‍यवाणी करने का रिस्‍क नहीं लेते , उपाय की पूरी व्‍यवस्‍था कर देते हो , एक शहर में तुम्‍हें रहना नहीं , इसलिए साख बनाए रखने की कोई चिंता नहीं , लोगों से पैसों की बरसात करवा लेते हो तुम , इस तरह अपराधी के नाम से भी जो सुख सुविधा नहीं मिलती , वो बाबा बनकर तुम्‍हें मिल जाती है !

baba ki kahani

तुमसे नाम पूछा जाता है तो अपने को हिंदुस्‍तानी बताते हो , गांव , जिला या प्रदेश पूछा जाता है तो हिंदुस्‍तान कहते हो , मानो हम सब देशद्रोही हैं और तुम सच्‍चे देशभक्‍त , महान आत्‍माओं के जन्‍म से लेकर मृत्‍यु तक की हर घटना इतिहास में दर्ज होती है , अपना नाम , अपना गांव , अपना प्रदेश क्‍यूं छिपाते हो , वहीं से तो स्‍पष्‍ट हो जाता है कि तुम अपने जीवन का कोई भाग छुपा रहे हो , तुम इतिहास की किताबों में अपना नाम क्‍यूं नहीं दर्ज करवाना चाहते ,  अपने भयानक सच को सामने न लाकर अपने बाबा के स्‍वरूप को सामने रखकर तुम जनता के आस्‍था के साथ खिलवाड करते हो , उनके मनोवैज्ञानिक कमजोरी का नाजायज फायदा उठाते हो , अपने स्‍वार्थ में अंधे होकर कुछ भी करो तुम , पर धर्म और ज्‍योतिष को यूं बदनाम न करो बाबा , मेरी प्रार्थना है तुमसे !


हम सार्थक ढंग से बाबा अम्बेदकर जयंती मनाना सकते हैं !!!!!

Ambedkar ke vichar

हम सार्थक ढंग से बाबा अम्बेदकर जयंती मनाना सकते हैं !!!!!

हमारे देश में प्राचीन काल से जो दर्शन मौजूद है इसकी सबसे बडी शक्ति इसका लचीलापन है। कुछ भी विचार , जो ईश्वर, समाज या राजनीति से सम्बन्धित है, इसके दर्शन का अंग बन सकता है। सभी महापुरूषों के विचारों को सुनना , अमल करना यहां के लोगों का स्‍वभाव है। सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में तो हमारे देश ने सभी के अनुभवों से सीख ली ही है , धार्मिक क्षेत्र में भी देखा जाए तो हाल के सालों में न जाने कितने बाबाओं , कितनी माताओं को यहां के लोगों ने भगवान बना डाला है। सिर्फ आस्तिक ही नहीं , नास्तिक दर्शन भी आसानी से हिन्दू धर्म का अंग बन सकतें हैं यानि अपने अपने विचारों और भावनाओं के साथ हर प्रकार के लोगों का यहां स्‍वागत होता रहा है , उनके अनुसार समाज में परिवर्तन आता रहा है।

वैसे तो हमारे पास इतिहास का अवतारवाद का सिद्धांत हैं, जिसके अनुसार इतिहास एक दैवी योजना के तहत् चलता है। मानव जाति को हर प्रकार का कष्‍ट झेलते हुए उस समय तक निरंतर बने रहना होता है जब तक कोई अवतार न हो। पर अम्बेदकर का मानना था कि यदि समय की सही मांग को पहचानने वाले ज्ञान चक्षु हों, उसे सही मार्ग दिखाने का साहस एवं शौर्य हो तो एक महापुरूष द्वारा भी किसी भी युग का उद्धार हो सकता है। दैवी या सामाजिक शक्तियों को मानना और झेलना हमारी मजबूरी है , पर मनुष्य इतिहास के निर्माण का एक साधन है। डॉक्टर अम्बेदकर इस मामले में दूरदर्शी माने जा सकते हैं कि वे समझते थे कि समाज के लोगो के बीच जितनी सं‍तुलित आर्थिक स्थिति होगी, उतना ही देश में विकास हो सकता है। ऐसे में जल्‍द ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन सकता है। पर उनकी सोच का मतलब परिवर्तित हो गया , उन्‍हें संपूर्ण राष्‍ट्र का ना मान कर सिर्फ दलितों और पिछडो का मसीहा बना दिया।

ambedkar ke vichar


ऐसा इसलिए क्‍योंकि अम्बेदकर ने भारत की जाति व्‍यवस्‍था को समझने के लिए अधिक श्रम और समय दिया । उनके हिसाब से आदिम समाज घुमन्तु कबीलों में बँटा समाज था, बाद में कुछ लोग गाँवों मे बस गए, किन्तु कुछ लोग घुमंतु बने रहे । कालांतर में एक समझौते के तहत किसी हमले की हालत में छितरे लोग, बसे लोगों के सुरक्षा कवच का काम और बसे हुए लोग उन्हे रहने को सीमा पर जगह और अपने मृत पशु देने लगें। भारत में यही छितरे लोग अछूत बन गए। प्राचीन वैदिक संस्कृति बलि की संस्कृति थी, नरमेध, अश्वमेध और गोमेध आदि यज्ञों में नर, अश्व, गो आदि की बलियां होती थीं और सब मिल कर सारा मांस आपस में बाँट लेते थे।

पर बुद्ध के मानवीय धर्म का समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा.. बड़ी संख्या में राजाओं और आम जन ने ब्राह्मण धर्म को ठुकरा कर बुद्ध के सच्चे धर्म को अपना लिया.। ब्राह्मण संघर्षशील हो गए, देश में लगातार बौद्धो को हटाकर ब्राह्मण धर्म को पुनर्स्थापित किया जाने लगा। पर जनमामस में अहिंसा का भाव बैठ गया था जो कृषि आधारित समाज के लिये उपयोगी भी था। बौद्ध हिंसा के विरोधी होने के बावजूद ऐसे जानवर का मांस खा लेते थे जिसे उनके लिये मारा न गया हो। बौद्धो से भी दो कदम आगे निकलने के लिए ब्राह्मणों ने गोवध को सबसे बड़ा पाप घोषित कर दिया और गोमांस खाने वाले को अस्पृश्य , ऐसे में ब्राह्मण गोभक्षक से गोरक्षक बन गये। प्राचीन समझौते के तहत मृत जानवरों को ठिकाने लगाने का काम कर रहे छितरे लोगों के लिए मृत जानवरों का मांस खाना मजबूरी थी , इसलिए ये अस्पृश्य हो गये, इसकी शुरुआत अम्‍बेदकर ४०० ई. के आस पास का तय करते हैं।

अम्‍बेदकर आर्थिक सुधार का मॉडल नीचे से ऊपर की ओर रखना चाहते थे , वे सामाजिक ढांचे में दलितों को सम्मानजनक स्थान दिलाना चाहते थे। वे हिंदू समाज के आंतरिक सुधार को लेकर बहुत चिंतित थे। 1930 में गांधी जी द्वारा दलितों को हरिजन कहा जाना भी उन्‍हें अपमानजनक महसूस हुआ , न सिर्फ इसलिये कि दक्षिण भारत में मन्दिरों की देवदासियों के अवैध सन्तानो को हरिजन कहा जाता था, बल्कि इसलिये भी इस शब्द से दलित हिन्दू समाज की मुख्य धारा से अलग थलग दिखायी पडते थे। हिंदू या अन्‍य सम्प्रदायों से उनका कोई विद्वेष नहीं था। अम्बेदकर ने जब धर्म परिवर्तन का फैसला लिया तो उनको मनाने कई धर्माचार्य पहुंचे लेकिन अम्बेदकर ने सबको ठुकरा कर बौद्ध धर्म चुना था। शायद अम्बेदकर के मन में ये बात थी कि जिन दलितों ने अतीत में इस्लाम, इसाई और सिख धर्म अपनाया था समाजिक-आर्थिक रुप से उनमें कोई खास बदलाव नहीं आय़ा। जब एक हिंदू धर्माचार्य अम्बेदकर के पास हिंदू धर्म में ही बने रहने का आग्रह कर रहे थे तो अम्बेदकर ने उनसे पूछा कि क्या हिंदू समाज, शंकराचार्य के पद पर एक दलित को स्वीकार कर लेगा ?

इन दिनों महापुरूषों की जयंती भी जाति के आधार पर ही मनाई जाती है। बाबा अम्‍बेदकर भले ही संविधान के जरिये सबकी बराबरी की वकालत करते रहे मगर आज उनके नाम पर कोई भी राजनीति करने से नहीं चूक रहा। दलित अगर एकजुट हो किसी के पक्ष में मतदान कर दे तो सत्ता मिलनी तय है, पार्टियां दलितों का मसीहा क्‍यूं न बने ? सभी पार्टी अम्बेदकर के विचारों को ही पूरा करने का दंभ भरती है। इनके नाम पर सिर्फ जयंती मनाने , जुलूस निकालने या संस्‍थाओं , पुरस्‍कारों के नाम रखने और आरक्षण की राजनीति करने से कोई लाभ नहीं। दलितों के लिए हर प्रकार की सुविधाएं और उनकी आनेवाली पीढियों की प्रतिभाओं को विकास का सर्वोत्तम प्रबन्ध करके ही हम सार्थक ढंग से बाबा अम्बेदकर जयंती मना सकते हैं। तभी समाज में समता और समरसता बनी रह सकती है।



फिर वह बाबा मेरे पिताजी के पैरों पर गिर पडा .. मुझे बचा लो !!

Baba ki kahani

फिर वह बाबा मेरे पिताजी के पैरों पर गिर पडा .. मुझे बचा लो !!

'आपलोगों ने सुना या नहीं , कालीचरण लौट गया है' आंगन में आते ही 'खबर कागज' ने समाचार सुनाया। हमेशा की तरह हमलोगों के लिए यह एक सनसनीखेज खबर थी , इसी प्रकार की खबर सुनाने के लिए ही तो हमलोगों ने मुहल्‍ले के उस व्‍यक्ति को 'खबर कागज' की पदवी दी थी। हमलोग सब चौंक पडे 'कहां है अभी वो' 'अभी वह फलाने गांव में है , दो चार घंटे में यहां पहुंच जाएगा , 'बाबा' बना कालीचरण उस गांव में भिक्षा के लिए आया था , लोगों ने उसे पहचान लिया है , उसे लेने के लिए लोग चले गए हैं' हमलोगों को सूचित कर वे दूसरों के घर चल पडे , गांव में इस प्रकार के खबर के बाद उनकी व्‍यस्‍तता बढनी ही थी। कालीचरण के लौटने की खबर से पूरे गांव में खुशी की लहर थी।

हमलोगों के लिए यह खबर तो बिल्‍कुल खास थी , क्‍यूंकि हमारे बिल्‍कुल बगल में हमारे गोशाले से सटा हुआ कालीचरण के परिवार में उसके माता पिता , दो भाई और एक बहन रहते थे। गांव गांव में हर तरह की बिजली की चक्‍की के आने से उनलोगों की रोजी रोटी की समस्‍या खडी हो गयी थी , क्‍यूंकि उन्‍हीं की जाति के लोगों के यहां के कोल्‍हू में गांव भर के तेल की पेराई होती थी। कुछ दिनों तक तंगी झेलने से उसके पिताजी हताश और निराश थे , पर उसकी मां ने रोजी रोटी का एक साधन निकाल लिया था। गृहस्‍थों के घरों से धान खरीदकर उससे चावल बनवाकर बाजार में बेचने का कार्य शुरू किया। बहुत मेहनत करने के बावजूद महाजनों को ब्‍याज देने के बाद खाने पीने की व्‍यवस्‍था मात्र ही हल हो सकी थी , फिर भी उसने दोनो बेटो से मजदूरी न करवाकर स्‍कूल में नाम लिखवा दिया था। धीरे धीरे दोनो बेटे मैट्रिक पास कर गए थे और पढे लिखे और सभ्‍य शालीन अपने पुत्रों को देखकर मां की खुशी का ठिकाना न था।

baba ki kahani


शादी भी हो गयी और बच्‍चे भी ,  पर किसी प्रकार की नौकरी पा लेने की उनकी आशा निराशा में ही बदल गयी। सरकार के द्वारा दिए जाने वाले रिजर्वेशन का फायदा भी ऐसे लोगों को नहीं मिलना उसके औचित्‍य पर एक बडा प्रश्‍न खडा करता है। मैट्रिक पास करने से कुछ नहीं होता , अंत में उन्‍हें मजदूरी करने को बाध्‍य होना पडा। दिमाग चला चुके उनके बेटों के लिए इतनी शारिरीक मेहनत बर्दाश्‍त के बाहर था , उन्‍हें अक्‍सर चिडचिडाहट होती और कभी कभार झगडे झंझट की आवाज हमारे कानों में भी पडती। एक दिन बात कुछ अधिक ही बढ गयी , गुस्‍से से कालीचरण घर से निकला , तो लौटकर वापस ही नहीं आया। बरसात का दिन था , सभी नदी नाले में तेज पानी का बहाव , कहीं कूदकर जान ही दे दी हो , पर ये बात परिवार वालों को संतोष देता रहा कि शायद 'कालीचरण' बाबा बन गया हो। इस बात के दस वर्ष पूरे हो गए थे। कालीचरण के जाने से दुखी बाल और दाढी न बनाने के प्रण से उसके पिताजी का रूप भी बाबाजी का ही हो गया था।

सचमुच दो बजे को उस बाबा को उसके घर लाया गया। उस गांव के लोगों को बाबा भले ही कालीचरण लग रहा हो , पर हमारे गांववालों को उसके चेहरे में फर्क दिखा। कारण पूछने पर उसने बताया कि दीक्षा के दौरान उसे कई योनियों में परिवर्तित किया गया है , इसलिए उसका रूप कुछ अलग है। इस बात से गांववालों की पूरी सहानुभूति उसे मिल गयी। उसके दर्शन के लिए गांववालों का तांता लग गया। क्‍या गांववाले , क्‍या परिवार वाले , क्‍या बहन , क्‍या पत्‍नी ... सबने मान लिया था कि वह कालीचरण ही है। पर योनि परिवर्तन की बात कुछ पढे लिखे लोगों को नहीं जंच रही थी , खासकर उसकी इसी बात को सुनकर मेरे‍ पिताजी मान चुके थे कि यह कालीचरण नहीं कोई ठग है। पर इतने लोगों के बीच में एक की सही बात को भी कौन सुनेगा , यही सोंचकर उसके पोल के खुद खुलने का इंतजार कर रहे थे।


बाबा जी की पूरी सेवा हो रही थी , बहन तेल मालिश कर रही थी , तो भाई नहला रहा था। मां और पत्‍नी उसे स्‍वादिष्‍ट खाने खिलाए जा रही थी। यहां तक तो ठीक था , उस घर में कोई बडी संपत्ति तो नहीं थी , कालीचरण का रूप धरे उस बाबाजी के द्वारा लूटे जाने का भय होता। पर एक अबला स्‍त्री कहीं उसके धोखे में आ जाए , पापाजी को यही चिंता सता रही थी। पर एकबारगी विरोध भी नहीं किया जा सकता था , सो कोई उपाय निकालने की दिशा में वे चिंतन कर रहे थे। उसी वक्‍त मुहल्‍ले के तीन व्‍यक्ति हमारे आंगन में आ गए , एक ने पापाजी से पूछा कि क्‍या उन्‍हे विश्‍वास है कि वह बाबा कालीचरन ही है।

मेरे पापाजी ने 'ना' में सर हिलाया , उनमें से एक व्‍यक्ति के लिए इतना ही काफी था , वे तेजी से कालीचरन के आंगन में पहुंचे और पूछा 'क्‍या तुम कालीचरण हो'
उसका 'हां' कहना था कि गाल में एक चांटा।
'सामने किसका घर है'
'फलाने का' गाल में दूसरा चांटा।
'ये कौन है'
'फलाने हैं' गाल में तीसरा चांटा।
'मुझे माफ कर दो , उनलोगो ने जबरदस्‍ती किया , मैने नहीं कहा कि मैं कालीचरण हूं' तुरंत उसने दया की भीख मांगनी शुरू की और वो चांटे पर चांटा लगाए जा रहे थे। हल्‍ला गुल्‍ला सुनकर पापाजी वहां पहुंचे और उस सज्‍जन को डांटना शुरू किया.. 'गांव में आए मेहमान के साथ ऐसा व्‍यवहार करते हैं क्‍या'
'मेहमान है तो मेहमान की तरह रहे , यहां सबको बेवकूफ क्‍यूं बना रहा है' वो गुस्‍से से तमतमाए था और पूरा गांव तमाशा देख रहा था। उसके रौद्र रूप को देखकर वो बाबा बहुत भयभीत था , मेरे पापाजी के हमदर्दी भरे शब्‍द को सुनकर वह उनके पैरों पर वह गिर पडा 'मुझे बचा लो' । फिर पापाजी ने सबको शांत किया और मौका देखते ही वह बाबा सिर पर पैर रखकर भागा।



विश्‍वास और श्रद्धा नहीं ... बौद्ध धर्म की नीव बुद्धि है !!

Gautam buddha ke vichar

विश्‍वास और श्रद्धा नहीं ... बौद्ध धर्म की नीव बुद्धि है !!

बौद्ध धर्म एक अनीश्‍वरवादी धर्म है, इसके अनुसार कर्म ही जीवन में सुख और दुख लाता है। भारत ही एक ऐसा अद्भूत देश है जहां ईश्वर के बिना भी धर्म चल जाता है। ईश्वर के बिना भी बौद्ध धर्म को सद्धर्म माना गया है। दुनिया के प्रत्येक धर्मों का आधार विश्वास और श्रद्धा है जबकि बौद्ध धर्म की नीव बुद्धि है, यह इस धर्म और गौतम बुद्ध के प्रति आकर्षित करता है। सभी धर्म अपना दर्शन सुख से आरम्भ करते हैं जो कि सर्वसाधारण की समझ से कोसों दूर होता है। महात्मा बुद्ध अपना दर्शन दुःख की खोज से आरम्भ तो करते हैं पर परिणति सुख पर ही होती है। बौद्ध धर्म का आधार वाक्य है ‘सोचो, विचारो, अनुभव करो जब परम श्रेयस् तुम्हारे अनुभव में आ जाये तो श्रद्धा या विश्वास करना नहीं होगा स्वतः हो जाएगा।’

बौद्ध धर्म के चार तीर्थ स्थल हैं- लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर। लुम्बिनी  नेपाल में , बोधगया बिहार में , सारनाथ काशी के पास और कुशीनगर गोरखपुर के पास है। बौद्ध धर्म एक धर्म ही नहीं पूरा दर्शन है। महात्मा बुद्ध ने इसकी स्‍थापना की, इन्‍हें गौतम बुद्ध, सिद्धार्थ, तथागत और बोधिसत्व भी कहा जाता है। उनके गुज़रने के अगले पाँच शताब्दियों में यह पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फ़ैला और बाद में मध्य, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी जम्बू महाद्वीप में भी फ़ैल गया। बौद्ध धर्म दुनिया का चौथा बडा धर्म माना गया है , क्‍योंकि इसे पैंतीस करोड़ से अधिक लोग मानते हैं। "अज्ञानता की नींद"से जागने वाले ,  जिन्होने सालों के ध्यान के बाद यथार्थता का सत्य भाव पहचाना हो , वे "बुद्ध" कहलाते हैं ।

gautam buddha ke vichar

बौद्ध धर्म के हिसाब से पहला आर्य सत्य दुःख है। जन्म दुःख है, जरा दुःख है, व्याधि दुःख है, मृत्यु दुःख है, अप्रिय का मिलना दुःख है, प्रिय का बिछुड़ना दुःख है, इच्छित वस्तु का न मिलना दुःख है। दुःख समुदय नाम का दूसरा आर्य सत्य तृष्णा है, सांसारिक उपभोगों की तृष्णा, स्वर्गलोक में जाने की तृष्णा और आत्महत्या करके संसार से लुप्त हो जाने की तृष्णा, इन तीन तृष्णाओं से मनुष्य अनेक तरह का पापाचरण करता है और दुःख भोगता है। तीसरा आर्य सत्य दुःखनिरोध है। तृष्णा का निरोध करने से निर्वाण की प्राप्ति होती है, देहदंड या कामोपभोग से मोक्षलाभ होने का नहीं। चौथा आर्य सत्य दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् है। यह दुःख निरोधगामिनी प्रतिपद् नामक आर्य सत्य भावना करने योग्य है। इसी आर्य सत्य को अष्टांगिक मार्ग कहते हैं। वे अष्टांग ये हैं :- 1. सम्यक्‌ दृष्टि, 2. सम्यक्‌ संकल्प, 3. सम्यक्‌ वचन, 4. सम्यक्‌ कर्मांत, 5. सम्यक्‌ आजीव, 6. सम्यक्‌ व्यायाम, 7. सम्यक्‌ स्मृति, 8. सम्यक्‌ समाधि। दुःख का निरोध इसी अष्टांगिक मार्ग पर चलने से होता है। पहला अंत अत्यंतहीन, ग्राम्य, निकृष्टजनों के योग्य, अनार्य्य और अनर्थकारी है। दूसरा अंत है शरीर को दंड देकर दुःख उठाना। इन दोनों को त्याग कर मध्यमा प्रतिपदा का मार्ग ग्रहण करना चाहिए। यह मध्यमा प्रतिपदा चक्षुदायिनी और ज्ञानप्रदायिनी है।


कलिंग के युद्ध के बाद अशोक ने व्यक्ति गत रूप से बौद्ध धर्म अपना लिया था , अशोक के शासनकाल में ही बौद्ध भिक्षु विभिन्नी देशों में भेजे गये, जिनमें अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा गया । अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए धर्मयात्राओं का प्रारम्भ किया , राजकीय पदाधिकारियों और धर्म महापात्रों की नियुक्ति की, दिव्य रूपों का प्रदर्शन तथा धर्म श्रावण एवं धर्मोपदेश की व्यवस्था की लोकाचारिता के कार्य, धर्मलिपियों का खुदवाना तथा विदेशों में धर्म प्रचार को प्रचारक भेजने आदि काम किए। इस तरह विभिन्न् धार्मिक सम्प्रदायों के बीच द्वेषभाव को मिटाकर धर्म की एकता स्थापित करने में अशोक ने महत्‍वपूर्ण भूमिका निभायी।



Wednesday, 6 May 2020

प्रकृति की पूजा सबसे बड़ी पूजा है

prakriti hame kya sikh deti hai

प्रकृति की पूजा सबसे बड़ी  पूजा है 

कल मैने आप सबों को एक लेख के माध्‍यम से समझाने की कोशिश की कि किस तरह आध्‍यात्‍म , धर्म , अंधविश्‍वास और जादू टोना एक दूसरे से अलग हैं। युग के परिवर्तन के साथ ही साथ धर्म की परिभाषा बदलने लगती है। आज के विकसित समाज में भी परिवार में हर सुख या दुख के मौके की वर्षगांठ मनायी जाती है , इसके माध्‍यम से हम खुशी या दुखी होकर आपनी भावनाओं का इजहार कर पाते हैं , जिन माध्‍यमों से हमे या हमारे परिवार को सुख या दुख मिल रहा हो , उसे याद कर पाते हैं , उनके प्रति नतमस्‍तक हो पाते हैं। एक पूरे समाज में मनाए जानेवाले किसी त्‍यौहार का ही संकुचित रूप है ये , पर जब किसी की उपस्थिति और अनुपस्थिति पूरे समाज पर प्रभाव डाल रही हो , तो वैसे महान व्‍यक्ति का जन्‍मदिन या पुण्‍य तिथि पूरा समाज एक साथ मनाता है। यह हमारा कर्तब्‍य है , हमें मनाना चाहिए , पर इसे मनाने न मनाने से उन महान आत्‍माओं के धर्म में कोई परिवर्तन नहीं होगा। उनका काम कल्‍याण करना है , तो वे अपने धर्म के अनुरूप कल्‍याण ही करते रहेंगे। पर उन्‍हें याद कर हमें उनके गुणों से सीख लेने की प्रेरणा अवश्‍य मिल जाती है।

प्राचीन काल के संदर्भ में हम इसी बात को देखे तो आग , जल , वायु , सूर्य से लेकर प्रकृति की अन्‍य वस्‍तुओं में एक मनुष्‍य की तुलना में कितनी गुणी अधिक शक्ति है , इसकी कल्‍पना करना भी नामुमकिन है। आग हमें जला भी सकती है , पर ऐसा विरले करती , वह हमें गर्म रखने से लेकर हमारे लिए स्‍वादिष्‍ट खाना बनाने की शक्ति रखती है। जल हमें अपने आगोश में ले सकते हैं , पर वे ऐसा नहीं करते और हमारे जीवन यापन के हर पल में सहयोग करते हैं। वायु हमें कहां से उडाकर कहां तक ले जा सकती है , पर वो ऐसा नहीं करती , हमारे प्राण को बचाए रखने के लिए ऑक्‍सीजन का इंतजाम करती है। सूर्य हमें जलाकर खाक कर सकता है , पर हमारी दिनचर्या को बनाए रखने के लिए प्रतिदिन उदय और अस्‍त होता है। ये सब इसलिए होता है , क्‍यूंकि कल्‍याण करना उनका स्‍वभाव है।

prakriti hame kya sikh deti hai

हम प्रकृति की वस्‍तुओं के इसी स्‍वरूप की पूजा करते हैं । पूजा करने के क्रम में हम इनको सम्‍मान तो देते ही हैं , उनसे सीख भी लेते हैं कि हम अपने गुणों से संसार का कल्‍याण करेंगे। प्रकृति के एक एक कण में कुछ न कुछ खास विशेषताएं हैं , जो हमारी सेवा में तत्‍पर रहती हैं। यदि हम ढंग से प्रयोग करें , तो फूल से लेकर कांटे तक और अमृत से लेकर विष तक , सबमें किसी न किसी प्रकार का फायदा है। हर वर्ष का एक एक दिन हमने इनकी पूजा के लिए निर्धारित किया है , ताकि हम इनके गुणों को याद कर सके और इनसे सीख ले सकें। इसलिए इसे हमारे धर्म से जोडा गया है। यदि इस ढंग से सोंचा जाए कि हम इनकी पूजा नहीं करेंगे यानि इसका दुरूपयोग करेंगे , तो इनके सारे गुण अवगुण में बदल जाएंगे यानि तरह तरह की प्राकृतिक आपदाएं आएंगी , तो यह अंधविश्‍वास नहीं हकीकत ही है।